राजा का प्रस्ताव ठुकराकर जानें कैसे दार्शनिक ने सिखाया स्वतंत्रता का असली अर्थ

Edited By Updated: 17 May, 2026 12:02 PM

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चीन के एक दार्शनिक नदी के किनारे मस्ती में बैठे थे। तभी वहां से राजा दरबारियों के साथ गुजरे। उन्होंने दार्शनिक को देखा और उनसे बातचीत की। राजा उनके ज्ञान और विद्वता से बहुत प्रभावित हुए।

Inspirational Story : चीन के एक दार्शनिक नदी के किनारे मस्ती में बैठे थे। तभी वहां से राजा दरबारियों के साथ गुजरे। उन्होंने दार्शनिक को देखा और उनसे बातचीत की। राजा उनके ज्ञान और विद्वता से बहुत प्रभावित हुए। महल पहुंचते ही राजा ने दूत भेज कर उनको निमंत्रण भिजवाया।

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जब दार्शनिक राजमहल पहुंचे तो राजा ने कहा, “मैं आपके व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हूं, अत: मैं आपको इस राज्य के प्रधानमंत्री का पद देना चाहता हूं। दार्शनिक राजा की बात बड़े ध्यान से सुन रहे थे, साथ ही राजा के कक्ष में रखी इधर-उधर की चीजों पर नजर भी दौड़ा रहे थे। अचानक ही दार्शनिक की दृष्टि राजा के कक्ष में कछुए की मूर्ति पर पड़ी। दार्शनिक ने कहा, “राजन, मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूं।” राजा ने कहा, “पूछिए।”

दार्शनिक ने कहा, “आपके इस कक्ष में जो यह कछुए की मूर्ति रखी है, अगर इसमें प्राणों का संचार हो जाए तो क्या यह कछुआ आपके महल में रहना पसंद करेगा?”

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राजा ने कहा, “नहीं, यह तो पानी का जीव है, पानी में ही रहना चाहेगा।” 

दार्शनिक ने कहा, “तो क्या मैं इस कछुए से भी ज्यादा मूर्ख हूं, जो अपना आजादी व खुशहाली भरा जीवन छोड़कर यहां आपके महल में परतंत्रता और जिम्मेदारियों के कांटों का ताज पहन कर जीने को तैयार हो जाऊंगा? 

बंधन में बांधने वाला यह प्रधानमंत्री पद मुझे नहीं चाहिए।” दार्शनिक के विचार सुनकर राजा ने कहा, “आप विचारों से ही नहीं आचरण से भी पूर्ण दार्शनिक हैं।”

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