Vat Savitri Vrat Katha : वट सावित्री व्रत पर पढ़ें ये कथा, अखंड सौभाग्य और सुखी दांपत्य का मिलेगा आशीर्वाद

Edited By Updated: 15 May, 2026 02:23 PM

vat savitri vrat katha

हिंदू धर्म में वट सावीत्रि व्रत एक उपवास नहीं, बल्कि अटूट विश्वास, समर्पण और उस महा-चमत्कार की कहानी है, जिसने मृत्यु के विधान को भी बदल दिया। इस व्रत के जरिए पता लगता है कि कैसे एक पत्नी का प्रेम और संकल्प साक्षात यमराज को भी झुकने पर मजबूर कर सकता...

Vat Savitri Vrat Katha : हिंदू धर्म में वट सावीत्रि व्रत एक उपवास नहीं, बल्कि अटूट विश्वास, समर्पण और उस महा-चमत्कार की कहानी है, जिसने मृत्यु के विधान को भी बदल दिया। इस व्रत के जरिए पता लगता है कि कैसे एक पत्नी का प्रेम और संकल्प साक्षात यमराज को भी झुकने पर मजबूर कर सकता है। अगर आप भी अपनी अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं, तो सावित्री और सत्यवान की यह दिव्य कथा आपको अंत तक ज़रूर पढ़नी चाहिए।  तो आइए जानते हैं वट सावित्री व्रत की कथा के बारे में-

Vat Savitri Vrat Katha

वट सावित्री व्रत कथा
प्राचीन काल की बात है। मद्र देश के राजा अश्वपति उनकी कोई संतान नहीं थी। उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए देवी सावित्री की कठोर तपस्या की। प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें एक तेजस्वी कन्या का वरदान दिया, जिसका नाम सावित्री रखा गया। सावित्री जब बड़ी हुईं तो अत्यंत रूपवान और गुणवती थीं। उनके विवाह हेतु सत्यवान नामक युवक को चुना गया, जो शाल्व देश के राजा द्युमत्सेन के पुत्र थे। सत्यवान बहुत धर्मात्मा थे, लेकिन उनका राज्य छिन गया था और उनके माता-पिता नेत्रहीन थे, जिसके कारण वे जंगल में एक पर्णकुटी में रहते थे।

जब सावित्री के विवाह की बात चली, तो देवर्षि नारद ने राजा अश्वपति को बताया कि सत्यवान अल्पायु हैं और विवाह के ठीक एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु हो जाएगी। यह सुनकर राजा बहुत चिंतित हुए और उन्होंने सावित्री से किसी अन्य से विवाह करने का आग्रह किया। लेकिन सावित्री अपने निश्चय पर अटल रहीं और उन्होंने कहा कि वे सत्यवान को ही अपना पति मान चुकी हैं और उसी से विवाह करेंगी। अंततः दोनों का विवाह हो गया। सत्यवान अपने माता-पिता के साथ वन में रहते थे। विवाह के बाद सावित्री भी उनके साथ में रहने लगीं।

Vat Savitri Vrat Katha

समय बीतता गया और वो दिन आ गया, जब सत्यवान की मृत्यु निश्चित थी। उस दिन सत्यवान लकड़ियां काटने जंगल गया और सावित्री भी उसके साथ चल दी। पेड़ पर चढ़ते ही सत्यवान के सिर में असहज दर्द हुआ और वह सावित्री की गोद में लेट गया। तभी सावित्री ने देखा कि सामने साक्षात यमराज खड़े हैं। यमराज ने सत्यवान के प्राण लिए और दक्षिण दिशा की ओर चल दिए। सावित्री हार मानने वालों में से नहीं थी। वह यमराज के पीछे-पीछे चलने लगी। यमराज ने उसे बहुत रोका कहा कि "पुत्री, लौट जाओ! यह सृष्टि का नियम है। लेकिन सावित्री ने अपनी बुद्धिमानी और धर्म की बातों से यमराज को प्रसन्न कर दिया।

यमराज ने कहा- सत्यवान के प्राणों के अलावा कोई भी तीन वरदान मांग लो। सावित्री ने चतुराई से पहले दो वरदानों में अपने ससुर की आंखों की रोशनी और उनका खोया हुआ राज्य मांग लिया। और तीसरे वरदान में उसने मांगा- सौ पुत्रों की माता बनने का सौभाग्य। यमराज ने बिना सोचे-समझे कह दिया- "तथास्तु!" तभी सावित्री ने विनम्रता से कहा- "हे प्रभु! पति के बिना मैं मां कैसे बन सकती हूं? आपने ही मुझे पुत्रवती होने का वरदान दिया है, तो आपको मेरे पति के प्राण लौटाने ही होंगे। यमराज अपनी ही बातों में बंध गए। सावित्री की पतिभक्ति और बुद्धिमानी देखकर यमराज मुस्कुराए और सत्यवान के प्राण लौटा दिए। और उस समय सत्यवान वट वृक्ष यानि बरगद के पेड़ नीचे लेटा था। तभी से सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए वट वृक्ष की पूजा करती हैं और सावित्री की इस कथा को सुनती हैं।

Vat Savitri Vrat Katha

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