श्रील भक्ति विबुध बोधायन गोस्वामी महाराज- ...तो उतनी जल्दी श्रीकृष्ण के प्रेम में जाएंगे

Edited By Niyati Bhandari,Updated: 14 Apr, 2022 09:09 AM

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​​​​​​​श्रील भक्ति विबुध बोधायन गोस्वामी महाराज भी सारे विश्व में हरिनाम संकीर्तन का प्रचार कर रहे हैं। वे श्री ब्रह्म माध्व गौड़ीय सारस्वत संप्रदाय से जुड़े हुए हैं। आज से 536 वर्ष

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श्रील भक्ति विबुध बोधायन गोस्वामी महाराज भी सारे विश्व में हरिनाम संकीर्तन का प्रचार कर रहे हैं। वे श्री ब्रह्म माध्व गौड़ीय सारस्वत संप्रदाय से जुड़े हुए हैं। आज से 536 वर्ष पूर्व भगवान श्री नंद नंदन कृष्ण ने भी श्री चैतन्य महाप्रभु रूप में आकर इसी संप्रदाय को स्वीकार करके कलयुग में धर्म हरिनाम संकीर्तन को प्रचलित किया। श्री गोपीनाथ गौड़ीय मठ के वर्तमान आचार्य श्रील भक्ति विबुध बोधायन गोस्वामी महाराज जी इस समय जालंधर आए हुए हैं। कुंडली टीवी के एडिटर नरेश कुमार ने उनसे भेंट की और कुछ आध्यात्मिक साक्षात्कार किया। पेश है कुछ मुख्य अंश-

वैष्णव संप्रदाय का आरंभ कब हुआ ?
जब से ये धरती है तभी से वैष्णव संप्रदाय है। ब्रह्म खुद वैष्णव थे, हमारे संप्रदाय का नाम ही तब ब्रह्म संप्रदाय था।

आपके परिवार वाले मां काली के उपासक थे, फिर आपने अपना पंथ परिवर्तन क्यों किया ?
महाराज ने कहा हमारे नाना श्री मदन मोहन श्रील भक्ति सिद्धांत सरस्वती महाराज जी के शिष्य थे। उनका प्रभाव था मुझ पर। माता काली तो वैष्णव हैं, माता काली ने हमको इसी मार्ग पर छोड़ दिया। ये मार्ग सबसे प्राचीन और उत्तम मार्ग है। जो ब्रह्मा जी हैं वो भी वैष्णव थे, उनके बेटे चतुर कुमार और नारद जी तो श्रेष्ठ वैष्णव थे। भगवान शिव को तो सबसे श्रेष्ठ वैष्णव माना गया है। काली हमारी कुल देवी थी, उन्होंने ही मेरे लिए ये मार्ग चुना।

महाराज जी आपने कहा मां काली वैष्णव हैं लेकिन वैष्णव तो लहसुन प्याज तक नहीं खाते ? मां काली को तो सारा भोग ही अवैष्णव लगता है जैसे मांस-मदिरा आदि
उन्होंने कहा हमारा सारा परिवार मां काली का भक्त होते हुए भी वैष्णव पद्धति पर चलता था क्योंकि श्रील भक्ति सिद्धांत सरस्वती महाराज जी को सारा परिवार फॉलो करता था। काली पूजा के बाद भी केवल फलों का भोग मां को अर्पित किया जाता था और वो प्रसाद सभी में बांटा जाता था।

महाराज जी ऐसा कौन से शास्त्र में लिखा है लहसुन प्याज नहीं खाना चाहिए ?
पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार मलब ऋषि ने गौ मेघ यज्ञ किया था। जिससे बूढ़ी गाय जवान हो सके। गाय का मांस हवन में डाला गया। उनकी पत्नी ने गाय के मांस का एक टुकड़ा छुपा कर रख लिया। जब यज्ञ समाप्त हुआ गाय उठी तो तो वो जवान हो चुकी थी लेकिन उसका पेट एक तरफ से दबा हुआ था। ऋषि चिंतित हो गए की मेरी वजह से जो भी गाय पैदा होगी उनका पेट दबा हुआ होगा। 
तभी उनकी पत्नी ने बताया की उन्होंने एक टुकड़ा गाय का मांस छुपाकर रख लिया था। जब वे मांस के टुकड़े के पास गए तो देखा मांस से प्याज, हड्डी से लहसुन और खून से मसूर दाल बनी हुई थी।

घर-परिवार में रहकर भजन करना श्रेष्ठ है, फिर महाप्रभु जी ने क्यों अपनी पत्नी और माता का त्याग किया 
कलयुग में ऐसा ही है क्योंकि महाप्रभु जी गृहस्थों को गृहस्थी में रहकर शिक्षा दे रहे थे लेकिन जब देखा लोग सिरियस नहीं हैं इतना ध्यान नहीं दे रहे हैं तो उस समय उन्होंने गृहस्थ को त्यागने का निर्णय किया। 

आपने ब्रह्मचर्य क्यों धारण किया ?
गुरु का आदेश था कि तुम आ जाओ तो हमने ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया। 

तो इसमें आपकी इच्छा नहीं थी, गुरु की इच्छा के अधीन होकर आपने अपने जीवन का इतना बड़ा निर्णय ले लिया
इच्छा नहीं था, ऐसा बोला नहीं जा सकता। बचपन से ही हम संन्यास लेना चाह रहे थे। विचार ऐसा था इस दुनिया में फंसना बहुत मुश्किल था। मंदिर में आकर रहना ऐसा सोचा नहीं था। घर में रहने का विचार था लेकिन गुरु जी ने कहा शादी नहीं करोगे तो यहां आकर रह सकते हो।

गीता में श्रीकृष्ण ने स्वयं को जगत गुरु कहा है, फिर संसारिक गुरु बनाने की क्या आवश्यकता है ?
हम सबके पास अनर्थ है। जब तक हमारे पास अनर्थ रहेगा तब तक भगवान हमारे साथ आ नहीं सकते। तभी तो इस संसार में व्यक्ति का जन्म हुआ है।

अनर्थ क्या है महाराज जी कृपया हमें विस्तार से बताएं ?
4 तरह का अनर्थ है। स्वरूप अनर्थ, दुनिया का लालच, अक्षय तृष्णा, अपराध, दुर्बलता हमें पता है ये चीज़ नहीं करना चाहिए वो नहीं करना चाहिए फिर भी हम करते हैं। ये 4 जब तक हैं तब तक भगवान हमें मिल नहीं सकते इसलिए अपने शुद्ध भक्तों के माध्यम से गुरु को प्राप्त किया जा सकता है।

अपने लिए गुरु खोजने से पहले कौन-कौन सी बातों का ध्यान रखना चाहिए
महाराज जी ने कहा गुरु को परखने वाली निगाह किसी के पास नहीं होती इसलिए नारद मुनि जी ऐसा ही शिक्षा दिया की पहले श्रीकृष्ण को दिल से पुकारो तो कृष्ण हमारे लिए कौन से गुरु अच्छे होंगे हमें उनसे मिलवा देंगे। 

व्यक्ति में ऐसे कौन से गुण होने चाहिए जिस से श्रीराधाकृष्ण की कृपा प्राप्त हो सके
गुरु शरणागति पहला गुण है। दिल से पुकारना चाहिए श्रीकृष्ण को वो हमें हमारे गुरु से अवश्य मिलवा देंगे।

कृष्ण भगवान को मानने वाले लोगों के जीवन में बड़ा दुख देखा गया है जैसे की मीराबाई। उन्हें तो भक्त शिरोमणि कहा गया है, फिर भी उन्हें जहर का प्याला तक पीना पड़ा ऐसा क्यों ?
हमारी आंखो से दिखता है उनका जीवन बहुत दुखदायी है, ये संसार ही दुखों का भंवर है लेकिन अंदर से उन्हें कृष्ण भक्ति में बहुत सुख प्राप्त हुआ। वो राजा की पुत्री और पत्नी थी, उन्होंने इन सुखों को छोड़कर कृष्ण प्रेम में ही आनंद प्राप्त किया। हमारे शास्त्र कहते हैं भक्ति मार्ग में आप जितने भी कष्टों का सामना करेंगे, उतनी जल्दी श्रीकृष्ण के प्रेम में जाएंगे। 

एकादशी व्रत को सबसे श्रेष्ठ क्यों कहा गया है, जबकि अन्य व्रतों का पालन करने से भी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं
संसार में जितने भी तीर्थ हैं उनमें दर्शन का और जितनी भी नदियां हैं उनमें स्नान का जो फल मिलता है। वे केवल एकादशी व्रत करने से प्राप्त होता है। एकादशी का जन्म भगवान के शरीर से हुआ है। एकादशी व्रत का मुख्य लक्ष्य है भक्ति करना।

बहुत सुना है 84 लाख योनियां हैं वो क्या-क्या हैं और ये कहा लिखा है की 84 लाख योनि हैं ?
पद्म पुराण में कहा गया है ऐसा ही चक्र बना हुआ है। जब तक भक्ति की शक्ति नहीं है तब तक इस चक्र में ही घूमना पड़ता है। जलज नव लक्षाणी, स्थावर लक्ष विम्शति, कृमयो रूद्र संख्यक:

अर्थात जलचर 9 लाख, स्थावर अर्थात पेड़-पौधे 20 लाख, सरीसृप, कृमि अर्थात कीड़े-मकोड़े 11 लाख, पक्षी/नभचर 10 लाख, स्थलीय/थलचर 30 लाख और शेष 4 लाख मानवीय नस्ल के। कुल 84 लाख मानव जन्म में भगवान ने बुद्धि और स्वतंत्रता दी है, जो नास्तिक है वो आस्तिक भी हो सकता है। भगवान का भजन करें या न करें ये हम पर निर्भर करता है। 

श्री चैतन्य महाप्रभु श्री राधा कृष्ण का सम्मिलित रुप है, ये सच है या केवल लोक भ्रम है ?
श्रीकृष्ण चैतन्य चरित अमृत ग्रंथ में महाप्रभु जी का संपूर्ण जीवन विस्तार से वर्णित किया गया है। 

क्या मान्य ग्रंथ है श्रीकृष्ण चैतन्य चरितामृत क्योंकि आम लोगों को तो इस ग्रंथ का ज्ञान ही नहीं है ?
श्रील भक्ति सिद्धांत सरस्वती गोस्वामी कहते हैं यह वेद-वेदांत सब खो भी दें लेकिन ये किताब बच जाए तो सब कुछ हमारे पास रहेगा।

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