Edited By Sarita Thapa,Updated: 19 Jul, 2026 02:24 PM

तात्पर्य : यहां पर भगवान ने स्पष्ट कहा है कि भक्ति में उच्च तथा निम्न जाति के लोगों का भेद नहीं होता। भौतिक जीवन में ऐसा विभाजन होता है किन्तु भगवान की दिव्य भक्ति में लगे व्यक्ति पर यह लागू नहीं होता।
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपिु स्यु: पापयोनय:।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्।।9.32।।
अनुवाद : हे पार्थ, जो लोग मेरी शरण ग्रहण करते हैं वे भले ही निम्नजन्मा स्त्री, वैश्य (व्यापारी) तथा शूद्र (श्रमिक) क्यों न हों, वे परमधाम को प्राप्त करते हैं।
तात्पर्य : यहां पर भगवान ने स्पष्ट कहा है कि भक्ति में उच्च तथा निम्न जाति के लोगों का भेद नहीं होता। भौतिक जीवन में ऐसा विभाजन होता है किन्तु भगवान की दिव्य भक्ति में लगे व्यक्ति पर यह लागू नहीं होता। सभी परमधाम के अधिकारी हैं।

श्रीमद् भागवत में (2.4.18) कथन है कि अधम योनि चांडाल तक भी शुद्ध भक्त के संसर्ग से शुद्ध हो जाते हैं। अत: भक्ति तथा शुद्ध भक्त द्वारा पथप्रदर्शन इतने प्रबल हैं कि वहां ऊंच-नीच का भेद नहीं रह जाता और कोई भी इसे ग्रहण कर सकता है। शुद्ध भक्त की शरण ग्रहण करके सामान्य से सामान्य व्यक्ति शुद्ध हो सकता है। प्रकृति के विभिन्न गुणों के अनुसार मनुष्य को सात्विक (ब्राह्मण), रजोगुणी (क्षत्रिय) तथा तामसी (वैश्य तथा शूद्र) कहा जाता है। इनसे भी निम्न पुरुष चांडाल कहलाते हैं और वे पापी कुलों में जन्म लेते हैं।
सामान्य रूप से उच्च कुल वाले इन निम्न कुल में जन्म लेने वालों की संगति नहीं करते किन्तु भक्तियोग इतना प्रबल होता है कि भगवद्भक्त समस्त निम्र कुल वाले व्यक्तियों को जीवन की परम सिद्धि प्राप्त करा सकते हैं। यह तभी संभव है जब कोई कृष्ण की शरण में जाए। जैसा कि व्यापाश्रित्य शब्द से सूचित है, मनुष्य को पूर्णतया कृष्ण की शरण ग्रहण करनी चाहिए, तब वह बड़े से बड़े ज्ञानी और योगी से भी महान बन सकता है।

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