Veer Savarkar Jayanti: पढ़ें, अखंड भारत के वास्तुकार और प्रखर राष्ट्रभक्त विनायक दामोदर सावरकर की गौरवगाथा

Edited By Updated: 28 May, 2026 04:08 PM

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Veer Savarkar Jayanti 2026: विनायक दामोदर सावरकर के अदम्य साहस, 'अभिनव भारत' की स्थापना, काला पानी की सजा और उनके हिंदुत्व के सिद्धांतों के बारे में विस्तार से जानें।

Veer Savarkar Jayanti 2026: अदम्य साहस, प्रखर राष्ट्रचेतना और अटूट संकल्प के प्रतीक क्रांतिकारी वीर सावरकर का जन्म 28 मई, 1883 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के भगूर गांव में हुआ था। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में उनका नाम उन महान क्रांतिकारियों में लिया जाता है, जिन्होंने अपने विचारों, लेखनी और संघर्ष के माध्यम से राष्ट्रभक्ति की नई चेतना जागृत की।

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उनका पूरा नाम विनायक दामोदर सावरकर था। उनके पिता दामोदर पंत सावरकर और माता राधाबाई धार्मिक एवं संस्कारवान थे। बाल्यकाल में ही माता-पिता का निधन हो जाने से उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, किंतु विपरीत परिस्थितियों ने उनके व्यक्तित्व को और अधिक दृढ़ बना दिया।

बचपन से ही उनमें नेतृत्व क्षमता, संगठन कौशल और राष्ट्रप्रेम की भावना दिखाई देने लगी थी। युवावस्था में उन्होंने ‘मित्र मेला’ नामक संगठन की स्थापना की, जो आगे चलकर ‘अभिनव भारत’ के रूप में विकसित हुआ। इसका उद्देश्य सशस्त्र क्रांति के माध्यम से भारत को स्वतंत्र कराना था।

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सन् 1901 में उनका विवाह यमुनाबाई के साथ हुआ। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए वह इंग्लैंड गए, जहां उन्होंने ‘इंडिया हाऊस’ में रहकर भारतीय छात्रों को स्वतंत्रता आंदोलन के लिए प्रेरित किया।

वर्ष 1907 में उन्होंने लंदन में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की स्वर्ण जयंती मनाई और इसी दौरान अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ लिखी। इस पुस्तक में उन्होंने 1857 के विद्रोह को भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सिद्ध किया। यह पुस्तक क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणास्रोत बनी, जबकि ब्रिटिश सरकार ने इसे प्रतिबंधित कर दिया।

अंग्रेजी सरकार उनकी लोकप्रियता और प्रभाव से इतनी भयभीत थी कि 1910 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। भारत लाते समय उन्होंने समुद्र में कूदकर भागने का साहसिक प्रयास किया, किंतु पुन: पकड़ लिए गए।

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बाद में ब्रिटिश अदालत ने उन्हें 2 आजीवन कारावास की कठोर सजा सुनाकर अंडमान-निकोबार की कुख्यात सैल्युलर जेल भेज दिया। उन्हें अमानवीय यातनाएं दी गईं, कठोर श्रम कराया गया, किंतु उनका मनोबल कभी नहीं टूटा। उन्होंने जेल की दीवारों पर कविताएं लिखीं और उन्हें कंठस्थ कर लिया। यह उनकी अदम्य मानसिक शक्ति और राष्ट्रभक्ति का अद्वितीय उदाहरण है।

वह केवल क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि समाज सुधारक और प्रखर चिंतक भी थे। उन्होंने छुआछूत, जाति-भेद और सामाजिक असमानता का विरोध किया तथा सामाजिक समरसता पर बल दिया।

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उनका मानना था कि राष्ट्रीय एकता तभी मजबूत हो सकती है, जब समाज में समानता और भाईचारे की भावना हो। वह हिंदुत्व के सिद्धांत के प्रमुख प्रवर्तकों में माने जाते हैं। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘हिंदुत्व’ में भारत को सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में परिभाषित किया गया है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी वह सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहे और अपने विचारों से समाज को दिशा देते रहे। 26 फरवरी, 1966 को उन्होंने स्वेच्छा से अन्न-जल त्याग कर ‘आत्मार्पण’ के माध्यम से देह त्याग किया।  

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