इस दिन रखा जाएगा विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी का व्रत, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Edited By Updated: 28 Sep, 2026 12:56 PM

vighnaraja sankashti chaturthi 2026

सनातन धर्म में गणेश जी की पूजा का विशेष स्थान है। किसी भी शुभ काम की शुरुआत करने से  पहले देवों के देव महादेव के पुत्र गणेश जी का स्मरण किया जाता है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली संकष्टी चतुर्थी को विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना...

Vighnaraja Sankashti Chaturthi 2026 : सनातन धर्म में गणेश जी की पूजा का विशेष स्थान है। किसी भी शुभ काम की शुरुआत करने से  पहले देवों के देव महादेव के पुत्र गणेश जी का स्मरण किया जाता है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली संकष्टी चतुर्थी को विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि इस दिन सच्चे मन से और पूरे विधि-विधान के साथ गणेश जी की पूजा करने और व्रत रखने से जीवन में आने वाली सारी परेशानियों से छुटकारा मिलता है और मन की हर मनोकामना पूरी होती है। तो आइए जानते हैं विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी के शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में-

Vighnaraja Sankashti Chaturthi 2026

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी व्रत 2026 शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार, आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का आरंभ 29 सितंबर को शाम 5 बजकर 9 मिनट पर होगा और इसका समापन 30 सितंबर को दोपहर 2 बजकर 55 मिनट पर होगा। संकष्टी के दिन चंद्रोदय रात 8 बजकर 20 मिनट पर होगा। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 53 मिनट से सुबह 5 बजकर 41 मिनट तक रहेगा। अभिजित मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 5 मिनट से दोपहर 12 बजकर 53 मिनट तक रहेगा। उदया तिथि के अनुसार, विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी का व्रत 29 सितंबर को रखा जाएगा। 

Vighnaraja Sankashti Chaturthi 2026

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी व्रत पूजा विधि 

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी वाले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ-सुथरे वस्त्र पहनें। इसके बाद हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।

इसके बाद घर के मंदिर की सफाई करें। एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।

बप्पा को रोली, चंदन, अक्षत और फूल अर्पित करें और उन्हें मोदक, बेसन के लड्डू या तिल-गुड़ का भोग लगाएं।

विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा सुनें या पढ़ें। इसके बाद उनकी आरती करें और धूप-दीप दिखाएं।

रात को चांद निकलने के बाद एक चांदी या तांबे के लोटे में जल, थोड़ा सा दूध, रोली और अक्षत मिलाएं। चंद्रमा को अर्घ्य दें और अपने परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें। इसके बाद ही व्रत का पारण करें।

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