Vamana Jayanti 2026 : एकादशी से अगले दिन मनाई जाएगी वामन जयंती, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Edited By Updated: 20 Sep, 2026 09:22 AM

vamana jayanti 2026

भगवान विष्णु ने जब-जब धर्म की रक्षा और अधर्म के अंत के लिए अवतार लिया, तब उनकी हर लीला अपने आप में बेहद खास रही है। इन्हीं दिव्य अवतारों में से एक हैं भगवान वामन, जिन्हें श्रीहरि का पांचवां अवतार माना जाता है और इन्हे त्रेता युग का पहला अवतार भी...

Vamana Jayanti 2026 : भगवान विष्णु ने जब-जब धर्म की रक्षा और अधर्म के अंत के लिए अवतार लिया, तब उनकी हर लीला अपने आप में बेहद खास रही है। इन्हीं दिव्य अवतारों में से एक हैं भगवान वामन, जिन्हें श्रीहरि का पांचवां अवतार माना जाता है और इन्हे त्रेता युग का पहला अवतार भी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं और पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु का वामन अवतार बटुक ब्राह्म रूप में था जो उन्होंने राजा बलि के अभिमान का अंत करने के लिया था। हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि पर वामन जयंती का पर्व मनाया जाता है। तो आइए जानते हैं वामन जयंती के शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में- 

वामन जयंती शुभ मुहूर्त 

हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि का आरंभ 22 सितंबर दिन मंगलवार को रात 9 बजकर 43 मिनट पर होगा और इसका समापन 23 सितंबर दिन बुधवार को रात 10 बजकर 50 मिनट पर होगा। वहीं बात करें श्रवण नक्षत्र की तो इसका आरंभ 22 सितंबर को सुबह 7 बजकर 6 मिनट होगा और इसका समापन 23 सितंबर की सुबह 9 बजकर 9 मिनट पर होगा। ऐसे में देखा जाए तो वामन जयंती 23 सितंबर दिन बुधवार को मनाई जाएगी।

वामन जयंती पूजा विधि 

वामन जयंती के दिन भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की पूजा किस तरह की जाती है। इस दिन प्रातःकाल दैनिक कार्यों और स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान वामन की श्रद्धापूर्वक पूजा करें। परंपरा के अनुसार पंचोपचार या षोडशोपचार विधि से पूजा-अर्चना की जा सकती है। पूजा के लिए भगवान वामन की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। यदि आपके पास भगवान वामन की प्रतिमा है, तो दक्षिणावर्ती शंख में गाय का दूध लेकर अभिषेक करने की परंपरा बताई जाती है। वहीं, यदि तस्वीर हो तो सामान्य रूप से पूजा-अर्चना की जा सकती है। पूजा पूरी होने के बाद भगवान वामन की आरती जरूर करें। धार्मिक परंपरा में भगवान वामन के समक्ष 52 पेड़े और 52 रुपये की दक्षिणा रखें। पूजा और भोग के बाद किसी ब्राह्मण को दही, चावल, चीनी तथा दक्षिणा श्रद्धापूर्वक दान करके व्रत का पारण करें। 
 

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