Edited By Sarita Thapa,Updated: 25 Sep, 2026 01:40 PM

कहते हैं कि पूर्णिमा की रात के चांद की रोशनी केवल आकाश को ही नहीं, बल्कि हमारे जीवन और मन को भी सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है। हिंदू धर्म में हर पूर्णिमा तिथि को बहुत विशेष माना गया है।
Bhadrapada Purnima Date 2026 : कहते हैं कि पूर्णिमा की रात के चांद की रोशनी केवल आकाश को ही नहीं, बल्कि हमारे जीवन और मन को भी सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है। हिंदू धर्म में हर पूर्णिमा तिथि को बहुत विशेष माना गया है। ऐसे में अभी भादों का महीना चल रहा है और इस दौरान आती है भाद्रपद पूर्णिमा। कहा जाता है कि इस दिन के अवसर पर पाठ-पूजा करना, दान करना, व्रत करना और पवित्र नदियों में स्नान करना बेहद ही शुभ माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं हर साल भाद्रपद मास की पूर्णिमा के बाद ही पितृ पक्ष की शुरूआत होती है और इसी पूर्णिमा तिथि पर पूर्णिमा श्राद्ध भी माना जाता है। इन सभी चीज़ों के चलते इस दिन का महत्व और भी ज्यादा बढ़ जाता है। तो आइए जानते हैं भाद्रपद पूर्णिमा के शुभ मुहूर्त, महत्व और पूजा विधि के बारे में-
भाद्रपद पूर्णिमा का शुभ मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि का आरंभ 25 सितंबर दिन शुक्रवार को रात 11 बजकर 06 मिनट पर होगा और इसका समापन 26 सितंबर दिन शनिवार को रात 10 बजकर 18 मिनट पर होगा। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार देखा जाएं तो भाद्रपद पूर्णिमा का 26 सितंबर दिन शनिवार को रखा जाएगा। बात करें इस दिन के पूर्णिमा चंद्रोदय की तो 26 सितंबर को चंद्रोदय शाम 05 बजकर 59 मिनट पर होगा। ऐसे में जो लोग इस दिन व्रत कर रहे हैं वे रात में चंद्रोदय के बाद चंद्र देव की पूजा करके उन्हें अर्घ्य अर्पित कर सकते हैं।
भाद्रपद पूर्णिमा का महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार, भाद्रपद पूर्णिमा का दिन पूजा-पाठ, स्नान, दान और भगवान विष्णु की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। पूर्णिमा की तिथि को मन की शांति और सकारात्मक ऊर्जा से भी जोड़कर देखा जाता है। इस दिन सत्यनारायण भगवान की पूजा, चंद्रमा को अर्घ्य और जरूरतमंदों को सामर्थ्य के अनुसार दान करने की परंपरा है। खास बात यह है कि भाद्रपद पूर्णिमा के बाद पितृ पक्ष की शुरुआत होती है, इसलिए यह तिथि धार्मिक दृष्टि से और भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।

भाद्रपद पूर्णिमा पूजा विधि
सबसे पहले सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठें और संभव हो तो किसी पवित्र नदी में स्नान कर करें। अगर ऐसा संभव न हो तो नहाने के पानी में गंगाजल मिलकर स्नान करें। फिर साफ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।
फिर मंदिर को साफ-सफाई करें और उत्तर-पूर्व कोने में एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति स्थापित करें।
फिर भगवान विष्णु का पंचामृत से अभिषेक करें और पीला चंदन, केसर, फल, फूल, अक्षत, धूप-दीप, और तुलसी दल आदि अर्पित करें और माता लक्ष्मी को सिंदूर और लाल फूल अर्पित करें।
इसके बाद दीपक जलाएं और फल और मिठाई का भोग अर्पित करें और पाठ-पूजा करके कथा का श्रवण करें या स्वयं उसका पाठ करें।
अंत में आरती करने के बाद शाम के समय चंद्रोदय के बाद तांबे या चांदी के लोटे में जल, कच्चा दूध, सफेद फूल और अक्षत डालकर चंद्रदेव को अर्घ्य दें।

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