Ikkis Review: जंग के बाद की खामोशी और एक शहीद की अधूरी कहानी

Edited By Updated: 01 Jan, 2026 11:02 AM

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यहां पढ़ें कैसी है फिल्म इक्कीस

फिल्म: इक्कीस(Ikkis)
डायरेक्टर: श्रीराम राघवन (Sriram Raghavan)
कास्ट: अगस्त्य नंदा (Agastya Nanda), धर्मेंद्र (Dharmendra), जयदीप अहलावत (Jaideep Ahlawat), सिमर भाटिया (Simar Bhatia)
रेटिंग: 4 स्टार

Ikkis: हिंदी सिनेमा में देशभक्ति और वॉर ड्रामा फिल्मों को पसंद करने वालों का एक बड़ा वर्ग है। वहीं कई देशभक्ति फिल्में ऐसी भी हैं जिन्होंने हिंदी सिनेमा में एक बड़ी पहचान बनाई है और पूरे विश्व में लोकप्रिय हुई हैं। इसी बीच एक और ऐसे सितारे को फिल्म इक्कीस के जरिए दुनिया के सामने उजागर किया गया है जिसकी बहादुरी के किस्से अब तक छिपे हुए थे। इक्कीस में जांबाज अफसर सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की कहानी को बड़े पर्दे पर उतारा गया है इसके साथ ही दिवंगत एक्टर धर्मेंद्र की भी यह आखिरी फिल्म है। आइए जानते हैं कैसी है श्रीराम राघवन के निर्देशन में बनी अगस्त्य नंदा, जयदीप अहलावत और सिमर भाटिया स्टारर फिल्म इक्कीस।

कहानी
अधिकतर वॉर फिल्में जीत या हार के साथ खत्म हो जाती हैं, लेकिन इक्कीस उस जगह से अपनी कहानी शुरू करती है, जहां आमतौर पर सिनेमा खामोश हो जाता है। यह फिल्म 1971 के युद्ध से प्रेरित लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की वीरता को आधार बनाती है, लेकिन खुद को सिर्फ एक शहीद की कहानी तक सीमित नहीं रखती।

कहानी दो टाइमलाइन में चलती है एक तरफ युद्ध का मैदान, जहां फैसले कुछ सेकंड में लेने पड़ते हैं, और दूसरी तरफ 30 साल बाद की दुनिया, जहां युद्ध खत्म हो चुका है, लेकिन उसकी यादें अब भी ज़िंदा हैं। फिल्म सवाल पूछती है कि जंग के बाद इंसान कैसे जीता है, अपने अंदर के खालीपन और टूटे रिश्तों के साथ। यहां फोकस युद्ध पर नहीं, बल्कि उसके असर पर है सैनिकों और उनके परिवारों के भीतर चलने वाली एक खामोश लड़ाई पर।

निर्देशन 
श्रीराम राघवन इस फिल्म में अपने थ्रिलर वाले सिग्नेचर स्टाइल से बिल्कुल अलग नजर आते हैं। इक्कीस में उनका निर्देशन बेहद संयमित और परिपक्व है। वह भावनाओं को ज़ोर-शोर से पेश करने के बजाय, उन्हें धीरे-धीरे उभरने देते हैं।

युद्ध के दृश्य सीमित हैं और पूरी तरह कहानी की जरूरत के हिसाब से रखे गए हैं। कैमरा किसी को हीरो बनाने के बजाय हालात की सच्चाई दिखाता है। राघवन की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वह फिल्म को ड्रामा नहीं बनने देते, बल्कि उसे एक अनुभव की तरह पेश करते हैं।

अभिनय 
अगस्त्य नंदा लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के किरदार में सहज और ईमानदार लगते हैं। उनका अभिनय न तो ओवर-द-टॉप है, न ही बनावटी। वह एक युवा अफसर की तरह दिखते हैं, जो अपने फैसलों को लेकर आश्वस्त है, लेकिन इंसानियत से जुड़ा हुआ भी है।

धर्मेंद्र इस फिल्म की भावनात्मक रीढ़ हैं। उनका अभिनय बहुत शांत है, लेकिन हर सीन में गहराई है। आंखों की भाषा, चेहरे की थकान और अनुभव सब कुछ बेहद नैचुरल लगता है। ऐसा महसूस होता है जैसे वह अभिनय नहीं कर रहे, बल्कि किरदार को जी रहे हों।

जयदीप अहलावत कम स्क्रीन टाइम के बावजूद गहरी छाप छोड़ते हैं। उनका किरदार एक ऐसा इंसान है, जिसने बहुत कुछ देख लिया है और अब बिना किसी शिकायत के सच्चाई के साथ जी रहा है। धर्मेंद्र के साथ उनके सीन फिल्म के सबसे मजबूत हिस्सों में से हैं।

सिमर भाटिया का ये बॉलीवुड डेब्यू है लेकिन वह अपनी पहली फिल्म में अच्छा काम किया है उन्होंने अपने किरदार को सफल बनाने का पूरा प्रयास किया है।

संगीत और साउंड डिजाइन 
इक्कीस में संगीत का इस्तेमाल बहुत सीमित है। बैकग्राउंड स्कोर सिर्फ वहीं आता है, जहां उसकी ज़रूरत होती है। कई दृश्यों में सिर्फ साउंड डिजाइन टैंकों की आवाज़, हवा की सरसराहट और खामोशी माहौल रच देती है। यह फिल्म आपको म्यूजिक से भावुक करने की कोशिश नहीं करती, बल्कि सिचुएशन से जोड़ती है।

इक्कीस एक अलग तरह की वॉर फिल्म है। यह युद्ध की बहादुरी से ज़्यादा उसके बाद की इंसानी कीमत पर बात करती है। यह फिल्म शोर नहीं मचाती, लेकिन लंबे वक्त तक आपके भीतर ठहर जाती है। अगर आप ऐसी फिल्में पसंद करते हैं जो सिर्फ जंग नहीं, बल्कि उसके बाद की ज़िंदगी दिखाती हैं, तो इक्कीस जरूर देखी जानी चाहिए।

 

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