Ikka Review: राजनीति, कोर्ट और इमोशन के बीच उलझी सनी देओल-अक्षय खन्ना की कहानी

Edited By Updated: 10 Jul, 2026 03:39 PM

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यहां पढ़ें कैसी है फिल्म इक्का

फिल्म: इक्का (Ikka)
कलाकार: सनी देओल (Sunny Deol),अक्षय खन्ना (Akshaye Khanna),दीया मिर्जा (Dia Mirza),तिलोत्तमा शोम (Tillotama Shome),संजीदा शेख (Sanjeeda Sheikh)
डायरेक्टर :सिद्धार्थ पी मल्होत्रा (Siddharth P. Malhotra)

रेटिंग: 3 स्टार


इक्का :बॉर्डर 2' को में दमदार परफोर्मेंस के बाद सनी देओल और 'धुरंधर' में अपने दमदार अभिनय से चर्चा बटोर चुके अक्षय खन्ना अब करीब तीन दशक बाद एक बार फिर स्क्रीन शेयर करते नजर आए हैं। ऐसे में निर्देशक सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा की कोर्टरूम ड्रामा 'इक्का' से दर्शकों की उम्मीदें स्वाभाविक रूप से काफी बढ़ जाती हैं। आज नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई कोर्टरूम ड्रामा, इमोशन और राजनीतिक साज़िश का मिश्रण है, लेकिन क्या यह दर्शकों की उम्मीदों पर खरी उतरती है? आइए जानते हैं।

कहानी:
फिल्म की कहानी मुंबई के मशहूर और ईमानदार वकील अर्जुन मेहरा (सनी देओल) के इर्द-गिर्द घूमती है, जिन्हें लोग 'इक्का' के नाम से जानते हैं। अर्जुन हमेशा कमजोर और बेगुनाह लोगों के लिए लड़ते हैं और कोर्ट में आखिरी पल पर ऐसा दांव चलते हैं कि पूरा मामला पलट जाता है। लेकिन उनकी जिंदगी तब बदल जाती है, जब हालात उन्हें एक प्रभावशाली नेता के बेटे शौर्यमन गौर (अक्षय खन्ना) का केस लड़ने पर मजबूर कर देते हैं। शौर्यमन पर सोमा मित्तल (आकांक्षा रंजन कपूर) पर जानलेवा हमले का आरोप है। अपने उसूलों और एक पिता के दर्द के बीच फंसे अर्जुन का यह संघर्ष ही फिल्म की असली कहानी बन जाता है।

एक्टिंग:
सनी देओल ने वकील अर्जुन मेहरा के किरदार में गंभीर और संयमित अभिनय किया है। लेकिन कई जगह दर्शकों को उनके पुराने दमदार अंदाज़ और जोशीले संवादों की कमी महसूस होती है। अक्षय खन्ना अपने किरदार में प्रभावशाली हैं और नकारात्मक भूमिका को मजबूती से निभाते हैं, हालांकि 'धुरंधर' जैसी छाप यहां नहीं छोड़ पाते। आकांक्षा रंजन कपूर ने अपने हिस्से का काम ईमानदारी से किया है, जबकि तिलोत्तमा शोम और दीया मिर्जा भी अपने किरदारों के साथ न्याय करती हैं।

डायरेक्शन:
निर्देशक सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा ने फिल्म को एक गंभीर कोर्टरूम ड्रामा बनाने की कोशिश की है। कहानी का विचार मजबूत है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमजोरी इसकी धीमी रफ्तार है। पहले हाफ में फिल्म जरूरत से ज्यादा समय लेती है, जिससे कई दृश्य खिंचे हुए महसूस होते हैं। हालांकि दूसरे हाफ में कहानी थोड़ी रफ्तार पकड़ती है और कुछ कोर्टरूम सीक्वेंस असर छोड़ते हैं, लेकिन स्क्रीनप्ले में कसावट की कमी साफ नजर आती है।

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