तुर्की का बड़ा गेम प्लानः पाकिस्तान के बाद बांग्लादेश पर एर्दोगन की नजर, भारत की बढ़ सकती टेंशन

Edited By Updated: 25 Aug, 2026 07:15 PM

will dhaka join the mecca pact the strategic stakes for india india

पाकिस्तान के साथ रक्षा संबंध मजबूत करने के बाद तुर्की की बांग्लादेश में बढ़ती रणनीतिक सक्रियता भारत के लिए चिंता का विषय बन सकती है। ढाका के संभावित ‘मक्का फ्रेमवर्क’ जुड़ाव से तुर्की की पूर्वी दक्षिण एशिया में पहुंच बढ़ सकती है। हालांकि, इसे फिलहाल...

 Ankara: दक्षिण एशिया में तुर्की की बढ़ती सक्रियता को लेकर भारत के लिए नई रणनीतिक चुनौती की चर्चा तेज हो गई है। पाकिस्तान के साथ अंकारा के गहरे रक्षा संबंधों के बाद अब बांग्लादेश के साथ उसके बढ़ते संपर्क और ढाका की संभावित सुरक्षा साझेदारियों ने क्षेत्रीय समीकरणों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।सेंटर फॉर जियोपॉलिटिक्स एंड स्ट्रैटजिक स्टडीज की फेलो डॉ. इंद्राणी तालुकदार ने अपने विश्लेषण में तुर्की-पाकिस्तान-सऊदी अरब-बांग्लादेश के संभावित रणनीतिक समीकरण को भारत के लिए चुनौतीपूर्ण बताया है। हालांकि, इसे सीधे तौर पर किसी औपचारिक सैन्य गठबंधन के रूप में पेश करना अभी जल्दबाजी होगी। बांग्लादेश लंबे समय से भारत, चीन और अमेरिका जैसी बड़ी शक्तियों के साथ संबंधों में संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता रहा है।

 

लेकिन देश में राजनीतिक बदलाव, आर्थिक दबाव और सुरक्षा साझेदारों में विविधता लाने की इच्छा के कारण ढाका अब नए विकल्पों पर भी नजर डाल रहा है। पाकिस्तान के साथ हाल के वर्षों में बढ़ते संपर्क इसी रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं। तुर्की के साथ रक्षा और सैन्य सहयोग बढ़ना भी इसी व्यापक बदलाव को दर्शा सकता है। सबसे ज्यादा चर्चा बांग्लादेश के ‘मक्का फ्रेमवर्क’ से संभावित जुड़ाव को लेकर है। हालांकि उपलब्ध जानकारी के मुताबिक बांग्लादेश अभी इसका औपचारिक हस्ताक्षरकर्ता नहीं है। इसलिए यह कहना कि ढाका पहले ही किसी तुर्की-पाकिस्तान-सऊदी सैन्य गठबंधन का हिस्सा बन चुका है, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। लेकिन यदि भविष्य में बांग्लादेश इसमें पर्यवेक्षक या किसी अन्य भागीदारी के रूप में शामिल होता है, तो दक्षिण एशिया में सुरक्षा सहयोग का नया नेटवर्क बन सकता है। यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक पहलू है।

 

अगर तुर्की और बांग्लादेश के बीच रक्षा सहयोग काफी गहरा होता है और पाकिस्तान भी इसमें सक्रिय भूमिका निभाता है, तो भारत की पूर्वी सीमा के करीब तुर्की की रणनीतिक पहुंच बढ़ सकती है।इसका मतलब यह नहीं है कि तुर्की सीधे भारत के खिलाफ सैन्य मोर्चा खोल देगा। लेकिन सैन्य प्रशिक्षण, रक्षा उपकरणों की बिक्री, सुरक्षा सहयोग और राजनीतिक समन्वय जैसे क्षेत्रों में बढ़ती मौजूदगी भारत के लिए निगरानी का विषय जरूर बन सकती है। तुर्की और पाकिस्तान के बीच रक्षा संबंध पिछले कुछ वर्षों में काफी मजबूत हुए हैं। अंकारा ने पाकिस्तान को सैन्य तकनीक, रक्षा उपकरण और प्रशिक्षण के क्षेत्र में सहयोग दिया है। दोनों देशों के बीच राजनीतिक संबंध भी मजबूत हैं। खासकर कश्मीर मुद्दे पर तुर्की के बयानों को लेकर भारत ने कई बार असहमति जताई है। तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन द्वारा कश्मीर पर पाकिस्तान के पक्ष में दिए गए बयानों ने नई दिल्ली और अंकारा के संबंधों में तनाव बढ़ाया है।


भारत और तुर्की के संबंधों में पिछले कुछ वर्षों में कई मुद्दों को लेकर मतभेद बढ़े हैं। कश्मीर के अलावा तुर्की का पाकिस्तान के साथ बढ़ता रक्षा सहयोग भी भारत की चिंता का कारण है। दूसरी तरफ भारत ने ग्रीस और साइप्रस के साथ अपने रणनीतिक और रक्षा संबंध मजबूत किए हैं। ये दोनों देश तुर्की के साथ लंबे समय से विवादों में रहे हैं। हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि भारत ने ग्रीस और साइप्रस के साथ संबंध सिर्फ तुर्की द्वारा पाकिस्तान की मदद के जवाब में शुरू किए। भारत के इन देशों के साथ संबंधों के अपने अलग रणनीतिक और आर्थिक आधार भी हैं।  तुर्की अगर पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ अपने रक्षा संबंध मजबूत करता है, तो भारत के लिए कूटनीतिक चुनौती बढ़ सकती है। लेकिन इसे भारत की सैन्य घेराबंदी कहना फिलहाल अतिशयोक्ति होगी। भारत की भौगोलिक स्थिति, आर्थिक क्षमता और सैन्य संसाधनों की तुलना में तुर्की के लिए दक्षिण एशिया में लंबे समय तक बड़े पैमाने पर रणनीतिक मौजूदगी बनाए रखना आसान नहीं होगा। इसके अलावा बांग्लादेश की अपनी विदेश नीति भी महत्वपूर्ण है। ढाका के चीन, अमेरिका और भारत के साथ बड़े आर्थिक और रणनीतिक हित जुड़े हुए हैं।

 

बांग्लादेश के लिए भी भारत को नजरअंदाज करना आसान नहीं । भारत और बांग्लादेश के बीच लंबी साझा सीमा है। दोनों देशों के बीच व्यापार, ऊर्जा, परिवहन, सुरक्षा और नदी जल जैसे कई मुद्दे सीधे जुड़े हुए हैं। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लिए भारत महत्वपूर्ण पड़ोसी है। इसलिए ढाका का तुर्की या पाकिस्तान के साथ संबंध बढ़ाना जरूरी नहीं कि भारत-विरोधी रणनीति हो। यह उसकी विदेश नीति में विकल्प बढ़ाने और अलग-अलग शक्तियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश भी हो सकती है। भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता किसी तत्काल सैन्य हमले की नहीं, बल्कि रणनीतिक प्रभाव के धीरे-धीरे बढ़ने की हो सकती है। अगर तुर्की और पाकिस्तान बांग्लादेश में रक्षा सहयोग बढ़ाते हैं, तो भविष्य में सैन्य प्रशिक्षण हथियारों और रक्षा उपकरणों की बिक्री, खुफिया एवं सुरक्षा सहयोग, ड्रोन और रक्षा तकनीक, राजनीतिक एवं कूटनीतिक समन्वयइन क्षेत्रों में सहयोग बढ़ सकता है।  इन क्षेत्रों में बढ़ती गतिविधियां भारत को अपनी पूर्वी सुरक्षा व्यवस्था पर ज्यादा ध्यान देने के लिए मजबूर कर सकती हैं।
 

Trending Topics

img title
img title

Be on the top of everything happening around the world.

Try Premium Service.

Subscribe Now!