Edited By Niyati Bhandari,Updated: 28 Aug, 2026 06:29 PM

Amarnath Yatra 2026: वार्षिक श्री अमरनाथ यात्रा 2026 अपने भव्य आध्यात्मिक समापन की ओर बढ़ रही है। आज 28 अगस्त शुक्रवार श्रावण पूर्णिमा को पवित्र छड़ी मुबारक पंचतरणी से पवित्र गुफा के लिए रवाना हुई, जिसके साथ सुरक्षा बलों और माउंटेन रेस्क्यू टीमों का...
Amarnath Yatra 2026: वार्षिक अमरनाथ यात्रा 2026 अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुकी है। इस पावन तीर्थयात्रा के सबसे पवित्र चरण के तहत आज 28 अगस्त शुक्रवार श्रावण पूर्णिमा को पवित्र 'छड़ी मुबारक' (पवित्र गदा) पंचतरणी से पवित्र गुफा की ओर प्रस्थान किया। इसके साथ ही आस्था का यह पावन सफर अपने भव्य आध्यात्मिक समापन की ओर अग्रसर हो गया है।
समुद्री सतह से 3880 मीटर की ऊंचाई पर स्थित पवित्र श्री अमरनाथ गुफा में हिमशिवलिंग के रूप में शोभायमान होने वाले बाबा बर्फानी के दर्शन करवाने वाली वार्षिक अमरनाथ यात्रा श्रावणी पूर्णिमा एवं रक्षाबंधन पर पवित्र गुफा में छड़ी मुबारक पहुंचने के साथ ही सम्पन्न हो जाएगी।
कठिन रास्तों पर सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त और रेस्क्यू टीमें तैनात
पवित्र गुफा की ओर जाने वाले रास्ते बेहद ऊंचाई वाले और कठिन हैं इसलिए प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त किए हैं। तीर्थयात्रा का यह अंतिम चरण पूरी तरह से सुरक्षित और व्यवस्थित ढंग से संपन्न हो, इसके लिए विशेष रेस्क्यू टीमों की संयुक्त तैनाती की गई है। छड़ी मुबारक के साथ चलने वाली टीमों में निम्नलिखित बल मुस्तैद हैं:
स्टेट डिजास्टर रिस्पॉन्स फोर्स (SDRF)
जम्मू-कश्मीर आर्म्ड पुलिस
नेशनल डिजास्टर रिस्पॉन्स फोर्स (NDRF)
सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स (CRPF)
इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (ITBP) की माउंटेन रेस्क्यू टीमें

छड़ी मुबारक की रस्म का इतिहास
छड़ी मुबारक की रस्म चांदी की एक छड़ी से जुड़ी है। विश्वास है कि इस छड़ी में भगवान शिव की अलौकिक शक्तियां निहित हैं। जनश्रुति है कि महर्षि कश्यप ने यह छड़ी भगवान शिव को इस आदेश के साथ सौंपी थी कि इसे प्रति वर्ष अमरनाथ लाया जाए।

यह यात्रा सर्वप्रथम भृगु ऋषि ने की थी। अमरनाथ यात्रा की सदियों से परम्परा चली आ रही है। दर्शनार्थियों एवं साधु-महात्माओं का एक विशाल समूह प्रतिवर्ष श्रीनगर से रवाना होता है। समूह के साथ शैव्य निर्मित दंड भगवान शिव के झंडे के साथ आगे चलता है, इसे छड़ी मुबारक कहते हैं। आजकल इस छड़ी का नेतृत्व दशनामी अखाड़ा श्रीनगर के महंत श्री दीपेन्द्र गिरि कर रहे हैं। रक्षाबंधन की पूर्णिमा के दिन भगवान भोलेनाथ स्वयं श्री पावन अमरनाथ गुफा में पधारते हैं।

रक्षा बंधन के दिन ही पवित्र छड़ी मुबारक भी गुफा में बने हिमशिवलिंग के पास स्थापित कर दी जाती है। परम्परा के अनुसार श्रीनगर के दशनामी अखाड़े में पहले भूमि पूजन, फिर ध्वजा पूजन करके छड़ी मुबारक को श्री शंकराचार्य मंदिर और हरि पर्वत पर स्थित क्षारिका भवानी मंदिर ले जाया जाता है इसके बाद एक बड़े जत्थे के साथ छड़ी मुबारक रवाना होती है। कल्हण रचित ग्रंथ राजतरंगिणी के अनुसार श्री अमरनाथ यात्रा का प्रचलन ईस्वी से भी एक हजार वर्ष पूर्व का है।

एक किंवदंती यह भी है कि कश्मीर घाटी पहले एक बहुत बड़ी झील थी जहां सर्पराज नागराज दर्शन दिया करते थे। अपने संरक्षक मुनि कश्यप के आदेश पर नागराज ने कुछ मनुष्यों को वहां रहने की अनुमति दे दी। मनुष्यों की देखा-देखी वहां राक्षस भी आ गए जो बाद में मनुष्य व नागराज दोनों के लिए सिरदर्द बन गए।

अंतत: नागराज ने कश्यप ऋषि से इस संबंध में बातचीत की। कश्यप ऋषि ने अपने अन्य संन्यासियों को साथ लेकर भगवान भोलेनाथ से प्रार्थना की। तब शिव भोले नाथ ने प्रसन्न होकर उन्हें एक चांदी की छड़ी प्रदान की। यह छड़ी अधिकार एवं सुरक्षा की प्रतीक थी। भोलेनाथ ने आदेश दिया कि इस छड़ी को उनके निवास स्थान अमरनाथ ले जाया जाए जहां वह प्रकट होकर अपने भक्तों को आशीर्वाद देंगे।

संभवत: इसी कारण आज भी चांदी की छड़ी लेकर महंत यात्रा का नेतृत्व करते हैं। रक्षा बंधन वाले दिन पवित्र श्री अमरनाथ गुफा पहुंचने पर पवित्र हिमशिवलिंग के पास महंत दीपेन्द्र गिरि पारम्परिक विधि विधान और वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ छड़ी मुबारक का पूजन करेंगे। इस विशाल पूजा के साथ 40 दिन चलने वाली पवित्र अमरनाथ यात्रा का समापन हो जाएगा। पवित्र एवं पावन गुफा में पूजन के उपरांत 2 दिन बाद लिद्दर नदी के किनारे पहलगांव में पूजन एवं विसर्जन की रस्म अदा की जाएगी और शिव भक्त फिर से अगले वर्ष की यात्रा का इंतजार करने लगेंगे।
