Edited By Pardeep,Updated: 14 Jul, 2026 10:36 PM

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि शादी का वादा पूरा नहीं होने मात्र से दो वयस्कों के बीच लंबे समय तक आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों को दुष्कर्म नहीं कहा जा सकता, विशेषकर तब जब मूल विवाद दीवानी और वित्तीय प्रकृति का हो।
नेशनल डेस्कः इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि शादी का वादा पूरा नहीं होने मात्र से दो वयस्कों के बीच लंबे समय तक आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों को दुष्कर्म नहीं कहा जा सकता, विशेषकर तब जब मूल विवाद दीवानी और वित्तीय प्रकृति का हो। इसके साथ ही, अदालत ने दो आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए आरोपी को दुष्कर्म तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत लगाए गए आरोपों से बरी कर दिया। न्यायमूर्ति संतोष राय ने विशेष न्यायाधीश (अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम), प्रयागराज के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें याचिकाकर्ता सौरभ पाल सिंह की आरोपमुक्त करने की अर्जी खारिज कर दी गई थी।
मामले के अनुसार, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पीएचडी कर रही अनुसूचित जाति की एक शोधार्थी ने अक्टूबर 2020 में प्राथमिकी दर्ज कराई थी जिसमें आरोप लगाया था कि आरोपी ने उससे निकटता बढ़ाई, विवाह का वादा किया और इसी आधार पर लंबे समय तक उससे शारीरिक संबंध बनाए। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी ने रेस्तरां का कारोबार शुरू करने के नाम पर उसका एटीएम कार्ड, छात्रवृत्ति की राशि, आभूषण और 15 लाख रुपये ले लिए। बाद में कारोबार शुरू होने पर उसने शादी से इनकार कर दिया और उससे बातचीत बंद कर दी।
महिला का यह भी आरोप था कि आरोपी की पत्नी और परिजनों ने उसे गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी तथा जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर उसका अपमान किया। महिला के अनुसार, आरोपी ने उसे पांच-पांच लाख रुपये के दो चेक भी दिए थे, लेकिन दोनों 'बाउंस' हो गए। आरोपपत्र दाखिल होने के बाद आरोपी ने अधीनस्थ अदालत में दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 227 के तहत आरोपमुक्त किए जाने का आवेदन दिया, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया। उच्च न्यायालय ने प्राथमिकी, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 और 164 के तहत दर्ज बयानों तथा अन्य दस्तावेजी साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद अभियोजन के मामले में कई स्पष्ट विसंगतियां पाईं।
अदालत ने कहा कि महिला ने मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए गए बयान में स्वीकार किया है कि उसके और याचिकाकर्ता के बीच कोई प्रेम संबंध नहीं था, बल्कि मित्र होने के कारण दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने थे। अदालत ने यह भी पाया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के तहत दर्ज बयान से संकेत मिलता है कि दोनों के बीच शारीरिक संबंध वर्ष 2014 में स्थापित हुए थे।
दीपक गुलाटी बनाम हरियाणा सरकार (2013) मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले का हवाला देते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि शादी के झूठे वादे के आधार पर दुष्कर्म का मामला तभी बनता है, जब यह स्थापित हो कि विवाह का वादा शुरू से ही छलपूर्वक और झूठा किया गया था। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अपराध केवल इस आधार पर नहीं बनता कि पीड़िता अनुसूचित जाति से है। अभियोजन पक्ष को यह भी साबित करना होगा कि कथित अपराध उसकी जातिगत पहचान के कारण किया गया। छह जुलाई को दिए अपने फैसले में अदालत ने कहा, ''रिकॉर्ड से स्पष्ट होता है कि यह विवाद मूल रूप से दीवानी और वित्तीय प्रकृति का है। उपलब्ध सामग्री के आधार पर विवाह के झूठे वादे के कारण दुष्कर्म का आरोप प्रथम दृष्टया सिद्ध नहीं होता।''