ममता ने बगावत कर तृणमूल का गठन किया था, अब उसकी खुद की पहचान पर संकट के बादल

Edited By Updated: 18 Sep, 2026 09:19 PM

clouds of uncertainty loom over mamata banerjee own identit

ममता बनर्जी ने कभी कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस गठित करने के लिए बगावत की थी, लेकिन उनके राजनीतिक सफर का पर्याय बन चुकी इस पार्टी में सिलसिलेवार बगावत होने से उसकी पहचान पर अब संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

कोलकाता : ममता बनर्जी ने कभी कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस गठित करने के लिए बगावत की थी, लेकिन उनके राजनीतिक सफर का पर्याय बन चुकी इस पार्टी में सिलसिलेवार बगावत होने से उसकी पहचान पर अब संकट के बादल मंडरा रहे हैं। पश्चिम बंगाल में 6 अक्टूबर को होने वाले विधानसभा उपचुनावों से ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस नाम और उसके ''जोड़ा घास फूल'' चुनाव चिह्न को बाहर रखने का निर्वाचन आयोग का अंतरिम फैसला, केवल चुनाव चिह्न से जुड़ा विवाद नहीं है। यह उस पार्टी की राजनीतिक विरासत को लेकर चल रहे बड़े संघर्ष का ताजा घटनाक्रम है, जिसका 28 साल पहले गठन होने के समय से ही ममता का उसपर दबदबा रहा था। इस अंतरिम आदेश ने एक अभूतपूर्व स्थिति पैदा कर दी है - पहली बार, ममता के खेमे और बागी गुट, दोनों को ही उस नाम और चुनाव चिह्न के बिना मैदान में उतरना होगा, जिसके तहत तृणमूल कांग्रेस ने लगभग तीन दशक तक चुनाव लड़ा। 

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बगावत कर बनाई थी अपनी पार्टी

ममता के लिए बगावत कोई नई राजनीतिक भाषा नहीं है। इसी भाषा और राजनीतिक हथियार के जरिए उनका अपना करियर बना था। उन्होंने 1990 के दशक के बीच में, कांग्रेस की प्रदेश इकाई पर नियंत्रण को लेकर पार्टी के तत्कालीन प्रदेश प्रमुख सोमेन मित्रा के साथ तीखा संगठनात्मन संघर्ष किया था। मित्रा अपने पद पर बने रहे और ममता पार्टी से अलग हो गईं। ममता ने 1 जनवरी 1998 को तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की और कांग्रेस के खिलाफ अपनी बगावत को अपने करियर का सबसे अहम राजनीतिक उद्देश्य बना लिया। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने 'पीटीआई-भाषा' से कहा, ''हम जहां से शुरूआत करते हैं, घूम-फिर कर आखिर वहीं आ जाते हैं क्योंकि हम जानते हैं कि इतिहास हमेशा खुद को दोहराता है। कांग्रेस से अलग होकर अपनी खुद की पार्टी बनाने के बावजूद उन्होंने कांग्रेस को खत्म करने की कोशिश की। कर्म का हिसाब-किताब भी अजीब तरीके से होता है।'' 

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ममता का दांव उस वक्त सफल रहा था। तृणमूल का विस्तार हुआ और वह वाम मोर्चा की मुख्य चुनौती बनकर उभरी। आखिरकार, बंगाल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेतृत्व वाली सरकार के 34 साल के शासन को खत्म करने वाले राजनीतिक आंदोलन में इस पार्टी की अहम भूमिका रही। पार्टी के चुनाव चिह्न पर ममता की अपनी छाप थी। उन्होंने घास से निकलते दो फूलों का चित्र बनाया था, जो उनकी जमीनी राजनीति की पहचान बन गई। पार्टी के भीतर कई बार बगावतें हुईं, लेकिन यह चुनाव चिह्न कायम रहा। पार्टी के संस्थापक चेयरमैन पंकज बनर्जी, इसके गठन के कुछ ही समय बाद इसे छोड़कर कांग्रेस में चले गए थे, लेकिन बाद में वह फिर वापस आ गए। एक और संस्थापक सदस्य अजीत पांजा का 2001 में ममता की राजनीतिक रणनीति को लेकर उनसे मतभेद हो गया था और उन्होंने एक अलग संगठन बनाने की नाकाम कोशिश की। सुदीप बंदोपाध्याय को ममता से मतभेद के बाद पार्टी से निकाल दिया गया था, लेकिन वह कुछ वर्षों बाद वापस आ गए। 

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सुब्रत मुखर्जी, जिन्हें कभी उनके राजनीतिक गुरुओं में से एक माना जाता था, ने पार्टी से अलग होकर एक गुट का नेतृत्व किया, बाद में वह तृणमूल में फिर से शामिल हुए और ममता के मंत्रिमंडल के सदस्य बने। इस तरह का पैटर्न दिनेश त्रिवेदी और मुकुल रॉय के मामले में भी देखने को मिला। रेल किराया बढ़ाने को लेकर 2012 में ममता के साथ टकराव की वजह से त्रिवेदी का रेल मंत्री के तौर पर कार्यकाल खत्म हो गया। रॉय, जो कभी पार्टी में संगठन के लिहाज से दूसरे सबसे बड़े नेता थे, अभिषेक बनर्जी का प्रभाव बढ़ने पर ममता से अलग हो गए। वह 2017 में भाजपा में शामिल हुए और बाद में 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल में लौट आए थे। कुछ बगावतों से तृणमूल को चुनावी नुकसान हुआ, तो कुछ ने रणनीति, महत्वाकांक्षा और उत्तराधिकार को लेकर मतभेदों को उजागर किया। लेकिन किसी ने भी संगठन की राजनीतिक धुरी के तौर पर ममता की जगह नहीं ली। यह समीकरण 2022 में संगठन में मची उथल-पुथल के दौरान फिर से सामने आया, जब पुराने नेताओं और अभिषेक के युवा नेतृत्व के बीच तकरार से एक बड़ा सत्ता संघर्ष उत्पन्न होने का खतरा पैदा हो गया था। ममता ने उस समय राष्ट्रीय पदाधिकारी समिति को भंग कर दिया और संगठन में आखिरी फैसला लेने वाली अपनी ताकत को फिर से प्रदर्शित किया। 
अब अपनी ही पार्टी में हो गई बगावत

राजनीतिक विश्लेषक शुभोमय मैत्रा का मानना ​​है कि पार्टी में हालिया दरार ने एक ऐसी कमजोरी को उजागर किया है जो पूर्व की बगावतों में देखने को नहीं मिली थी। तृणमूल के वरिष्ठ नेता सौगत रॉय ने (ऋतब्रत बनर्जी गुट की) बगावत से जुड़े संकट से निपटने की ममता की क्षमता का बचाव करते हुए ऐसे दौर को ''राजनीतिक जीवन में अस्थायी'' बताया और उन्हें ''इस दौर के बीतने का इंतज़ार करने'' की सलाह दी। उन्होंने अनुमान जताया कि बागी विधायक आखिरकार पार्टी में लौट आएंगे। ममता का राजनीतिक सफर कांग्रेस से अलग होकर अपनी खुद की पार्टी गठित करने, नई शुरुआत करने और जो कुछ बनाया था उसे एकजुट रखने पर टिका था। अब विडंबना यह है कि जिस बगावत के जरिए उन्होंने कभी तृणमूल का गठन किया था, वही (बगावत) अब उनकी पार्टी के भीतर हो गई और तृणमूल के नाम एवं चुनाव चिह्न तक पहुंच गई है जो उनकी राजनीतिक पहचान बन गए थे। 

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