भारत में Fanta में 3 गुना ज्यादा चीनी? Reuters रिपोर्ट में कोल्ड ड्रिंक-फूड कंपनियों पर बड़े सवाल, यूरोप में हेल्थ वॉर्निंग

Edited By Updated: 25 Aug, 2026 04:44 PM

fanta in india has three times more sugar

लंदन में बिकने वाले फैंटा (Fanta) के एक कैन में 63 कैलोरी होती है। भारत में उसी ब्रांड को खरीदने पर उसमें तीन गुना ज़्यादा चीनी होती है। इसमें आर्टिफिशियल डाई भी होती है, जिसके इस्तेमाल पर यूरोप में खाने-पीने की चीज़ों पर साफ़ तौर पर हेल्थ वॉर्निंग...

नेशनल डेस्क : लंदन में बिकने वाले फैंटा (Fanta) के एक कैन में 63 कैलोरी होती है। भारत में उसी ब्रांड को खरीदने पर उसमें तीन गुना ज़्यादा चीनी होती है। इसमें आर्टिफिशियल डाई भी होती है, जिसके इस्तेमाल पर यूरोप में खाने-पीने की चीज़ों पर साफ़ तौर पर हेल्थ वॉर्निंग (स्वास्थ्य चेतावनी) देना ज़रूरी है।

कोका-कोला इंडिया की सीनियर एग्जीक्यूटिव मिली भट्टाचार्य ने 19 मार्च की मीटिंग में कहा कि यह सोचना "बहुत आसान बात" है कि जो कंज्यूमर पहले से ही इंग्रीडिएंट्स की लिस्ट नहीं पढ़ते, वे लेबल पर कोई सिंबल या आइकन देखकर इतने जागरूक हो जाएंगे कि उनकी डाइट में काफी सुधार हो जाएगा।

वॉर्निंग लेबल को लेकर कंपनी की दलील
उन्होंने आगे कहा कि वॉर्निंग लेबल बेकार हैं क्योंकि वे कंज्यूमर को मीठा और नमकीन खाना खाने से नहीं रोक पाएंगे। और वे इसलिए भी ज़रूरी नहीं थे क्योंकि भारतीय डॉक्टरों ने अपने मरीज़ों को यह सिखाने का अच्छा काम किया है कि किन चीज़ों को खाने से बचना चाहिए। हालांकि, कोका-कोला और उसके बॉटलिंग पार्टनर ने यूरोप के लगभग दो दर्जन मार्केट में अपनी ड्रिंक्स पर स्वेच्छा से ट्रैफिक-लाइट-स्टाइल लेबल लगाए हैं। स्विट्जरलैंड की सहयोगी कंपनी कोका-कोला HBC अपनी वेबसाइट पर कहती है कि ऐसे लेबल "साफ़ और पारदर्शी" जानकारी देते हैं।

नेस्ले भी लेबलिंग बहस में
नेस्ले उन भारतीय लॉबी का सदस्य है जिन्होंने रेगुलेटर के पुराने प्रस्तावों का विरोध किया था। लेकिन कंपनी 2013 से ब्रिटेन में स्वेच्छा से इंटरप्रिटेटिव लेबल का इस्तेमाल कर रही है। कोका-कोला और नेस्ले ने इस आर्टिकल के लिए कोई कमेंट करने से इनकार कर दिया। इस रिपोर्ट के लिए, रॉयटर्स ने ऑडियो रिकॉर्डिंग और सरकारी व कॉर्पोरेट डॉक्यूमेंट्स के सैकड़ों पन्नों की समीक्षा की, और 11 इंडस्ट्री एग्जीक्यूटिव और हेल्थ एक्सपर्ट्स का इंटरव्यू लिया।

फूड कंपनियों और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट्स के बीच विवाद
कई फूड कंपनियों ने उन सोशल-मीडिया इन्फ्लुएंसर के खिलाफ कानूनी शिकायतें दर्ज कराई हैं जिन्होंने भारत में उनके प्रोडक्ट की मार्केटिंग के तरीके की आलोचना की है। ऑस्ट्रेलिया में जॉर्ज इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ में फूड पॉलिसी की हेड सिमोन पेटिग्रेव ने कहा कि वॉर्निंग लेबल से मुनाफ़े को जो खतरा है, उसका मतलब है कि इंडस्ट्री को "जितना हो सके उतना समय तक इंतज़ार करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, ताकि वे भारतीय जनता को उन फूड्स की सेहत के बारे में जानकारी न दें जिन्हें वे बेच रहे हैं।" 

पेटिग्रू, जिन्होंने दो दर्जन से ज़्यादा देशों में 'फ्रंट-ऑफ-पैक' लेबल (पैकेट के सामने वाले हिस्से पर लगने वाले लेबल) पर रिसर्च की है, का कहना है कि अलग-अलग ग्रुप्स की लॉबिंग ने रेगुलेटर्स को कड़े नियम लागू करने से "लगभग रोक" दिया है। FSSAI ने लेबलिंग पॉलिसी से जुड़ी अदालती कार्यवाही का हवाला देते हुए इस पर कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

क्या भारत को स्वस्थ बनाया जा सकता है?
इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, भारत के 100 अरब डॉलर से ज़्यादा के पैकेज्ड फ़ूड और बेवरेज मार्केट में बनने वाले लगभग 80% प्रोडक्ट्स में फैट, शुगर और नमक की मात्रा ज़्यादा हो सकती है। रेगुलेटर्स के साथ मार्च में हुई मीटिंग में 'इंड फ़ूड एंड बेवरेज एसोसिएशन' के दीपक जॉली ने कहा कि अगर इंडस्ट्री कलर-कोडेड वॉर्निंग लेबल अपनाती है, तो पैकेजिंग पर हर तरफ़ लाल रंग दिखाई देगा।

पेप्सिको जैसी कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले IFBA ने रॉयटर्स के सवालों के जवाब में कहा कि वह रेगुलेटर्स से और स्पष्टता चाहता है। उसने कहा कि मौजूदा प्रस्तावों के कारण नारियल पानी के पैकेट पर भी "हाई शुगर" (ज़्यादा चीनी) वाली वॉर्निंग लग सकती है, जबकि उनमें सिर्फ़ नैचुरल शुगर होती है।

2017 से चल रही है लेबलिंग को लेकर बहस
2017 से भारतीय रेगुलेटर्स ने साफ़ तौर पर दिखने वाली कलर-कोडेड वॉर्निंग और स्टार रेटिंग जैसे प्रस्ताव पेश किए हैं, जो प्रोडक्ट की न्यूट्रिशनल वैल्यू (पोषक तत्वों की जानकारी) बताते हैं। लेकिन प्रोड्यूसर्स के लिए सिर्फ़ पैकेजिंग के पीछे सामग्री और बुनियादी न्यूट्रिशनल जानकारी देना ज़रूरी है।

ज़्यादा पारदर्शिता की मांग करने वाले हेल्थ एक्टिविस्ट्स ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। कोर्ट ने फरवरी में रेगुलेटर्स को वॉर्निंग लेबल पर विचार करने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने सुझाव दिया था कि एजेंसी इज़राइल के रेड-एंड-ग्रीन मैसेजिंग सिस्टम की जांच करे।

हालांकि, इंडस्ट्री के साथ मार्च में हुई मीटिंग के बाद FSSAI 'इंटरप्रिटेटिव लेबलिंग' (जानकारी देने वाले लेबल) के मामले से पीछे हट गया। अगस्त में उसने कोर्ट को बताया कि पैकेजिंग पर इंटरनेशनल स्टैंडर्ड्स से मेल खाना "मुश्किल" है, जो इंडस्ट्री की राय से मेल खाता था। इस पर जजों ने उन्हें फटकार लगाई और कहा कि "दुनिया को पता चलना चाहिए कि भारत अपने नागरिकों की सेहत को लेकर बहुत गंभीर है।"

हेल्थ को लेकर बढ़ी जागरूकता
जैसे-जैसे भारत अमीर हो रहा है, मिडिल-क्लास कंज्यूमर भी अपनी सेहत को लेकर ज़्यादा जागरूक हो गए हैं। मार्केट-रिसर्च फर्म 'फार्मारैक' (Pharmarack) के अनुसार, 2025 की शुरुआत से भूख कम करने वाली वज़न घटाने की दवाओं की मासिक बिक्री में 400% की बढ़ोतरी हुई है। सोशल मीडिया पर एक्टिविस्ट और इन्फ्लुएंसर प्रोसेस्ड और पैक्ड फ़ूड के ख़िलाफ़ कैंपेन चला रहे हैं।

इनमें रेवंत हिम्मतसिंघा भी शामिल हैं। मैकिन्से (McKinsey) के पूर्व मैनेजमेंट कंसल्टेंट ने YouTube और Instagram पर 50 लाख से ज़्यादा लोगों की ऑडियंस बनाई है, जहाँ 34 साल के रेवंत 'फ़ूड फ़ार्मर' (Food Pharmer) के नाम से जाने जाते हैं।

‘फूड फार्मर’ की पेप्सिको से जुड़ी लड़ाई
इन वीडियो की वजह से वे कभी-कभी मुश्किल में भी पड़ जाते हैं। 2023 में, हिम्मतसिंघा ने एक क्लिप बनाई जिसमें पेप्सिको (PepsiCo) के 'स्टिंग' (Sting) कैफ़ीन ड्रिंक में इस्तेमाल होने वाली चीनी और आर्टिफिशियल स्वीटनर की मात्रा की आलोचना की गई थी। एनर्जी ड्रिंक के तौर पर बेचे जाने वाले इस ड्रिंक को भारत में युवा काफ़ी पसंद करते हैं।

पेप्सिको ने दिल्ली कोर्ट से इसे हटाने का आदेश हासिल कर लिया। कंपनी का तर्क था कि वीडियो में किए गए दावे झूठे थे और उनका मकसद ड्रिंक के ख़िलाफ़ कैंपेन शुरू करना था। जुलाई में FSSAI ने पेप्सिको और दूसरी कंपनियों को 90 दिनों के अंदर "एनर्जी ड्रिंक" लेबल हटाने का आदेश दिया। पेप्सिको ने सवालों का कोई जवाब नहीं दिया। 

दो रेसिपी की कहानी
मल्टीनेशनल फ़ूड कंपनियाँ अक्सर स्थानीय नियमों, स्वाद और खर्च करने की क्षमता के हिसाब से एक ही प्रोडक्ट के अलग-अलग वर्शन बनाती हैं। उदाहरण के लिए, मैक्सिकन कोक अपने कम सिरप वाले स्वाद की वजह से बहुत मशहूर है। मोंडेलेज़ (Mondelez) की पूर्व एग्जीक्यूटिव पारुल शर्मा ने कहा, "कीमत और खरीदने की क्षमता कुछ ऐसे बड़े कारण हैं जिनकी वजह से अलग-अलग देशों में रेसिपी में इतना फ़र्क होता है।"

लेकिन हिम्मतसिंघा का कहना है कि भारत में कई कंज्यूमर को लगता है कि उन्हें घटिया क्वालिटी के प्रोडक्ट बेचे जा रहे हैं। उन्होंने ऐसे वीडियो बनाए हैं जिनमें भारत में बिकने वाले फैंटा (Fanta) और नेस्ले (Nestle) के किटकैट (KitKat) में इस्तेमाल होने वाली चीज़ों की तुलना यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में बिकने वाले प्रोडक्ट से की गई है और उन्हें कमतर बताया गया है।

KitKat और Maggi के वर्जन पर सवाल
भारत में बिकने वाले स्टैंडर्ड किटकैट में 4.5% कोको सॉलिड होता है, जबकि ऑस्ट्रेलिया में बिकने वाले वर्शन की मिल्क चॉकलेट में कम से कम 22% कोको होता है। भारत में बिकने वाले नेस्ले के मैगी (Maggi) इंस्टेंट नूडल्स के सभी वर्शन पाम ऑयल से बनते हैं, जबकि ब्रिटेन में बिकने वाले कई वर्शन में ज़्यादा महंगे सनफ़्लावर ऑयल का इस्तेमाल होता है। ब्रिटेन में बिकने वाले मैगी के कई पैकेट भारत में बनते हैं, लेकिन उनके पैकेट के सामने वाले हिस्से पर लाल रंग का लेबल लगा होता है, जो उनमें नमक की ज़्यादा मात्रा के बारे में चेतावनी देता है। हिमात्सिंगका ने कहा, "यह ठगे जाने का एहसास और उससे होने वाली निराशा है।"

कंपनियों पर बदलती पसंद का असर
कुछ संकेत ऐसे हैं जिनसे पता चलता है कि ग्राहकों की बदलती पसंद कंपनियों को बदलाव करने के लिए मजबूर कर रही है। उदाहरण के लिए, नेस्ले ने 2024 में घोषणा की कि वह भारत में शुगर-फ्री सेरेलैक बेबी फ़ूड बेचना शुरू करेगी। हिमात्सिंगका समेत कई एक्टिविस्ट ने शिकायत की थी कि 50 सालों से देश में सिर्फ़ वही वर्शन बेचा जा रहा था जिसमें चीनी होती थी। कंपनी लंबे समय से दूसरी जगहों पर शुगर-फ्री सेरेलैक बेच रही है।

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