भारत के ब्रिज मैन और पद्मश्री से सम्मानित गिरीश भारद्वाज का निधन, 76 साल की उम्र में दुनिया को कहा अलविदा

Edited By Updated: 08 Jul, 2026 01:20 AM

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किफायती झूला पुलों के माध्यम से ग्रामीण संपर्क को बदलने के लिए‘ब्रिज मैन ऑफ इंडिया'के नाम से लोकप्रिय रहे पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित प्रसिद्ध इंजीनियर गिरीश भारद्वाज का मंगलवार को निधन हो गया। वह 76 वर्ष के थे। कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले के...

नेशनल डेस्कः किफायती झूला पुलों के माध्यम से ग्रामीण संपर्क को बदलने के लिए‘ब्रिज मैन ऑफ इंडिया'के नाम से लोकप्रिय रहे पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित प्रसिद्ध इंजीनियर गिरीश भारद्वाज का मंगलवार को निधन हो गया। वह 76 वर्ष के थे। कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले के सुलिया में एक निजी अस्पताल में उम्र से संबंधित बीमारी के कारण उन्होंने आज अंतिम सांस ली।

भारद्वाज ने कर्नाटक, केरल, तेलंगाना और ओडिशा में 140 से अधिक कम लागत वाले झूला पुलों का निर्माण करके देश के बुनियादी ढांचा क्षेत्र में एक अनूठा स्थान बनाया। इन पुलों ने नदियों और नालों के कारण कटे हुए सुदूर गांवों में रहने वाले हजारों लोगों को सुरक्षित और विश्वसनीय मार्ग प्रदान किया। उनके अभिनव इंजीनियरिंग समाधानों ने ग्रामीण समुदायों के लिए यात्रा के समय को काफी कम कर दिया और स्कूलों, अस्पतालों, बाजारों तथा सरकारी सेवाओं तक उनकी निर्बाध पहुंच सुनिश्चित की।

पेशे से मैकेनिकल इंजीनियर भारद्वाज की पुल निर्माण की यह उल्लेखनीय यात्रा 1989 में शुरू हुई थी, जब सुलिया के अरामबुर गांव के निवासियों ने पयस्विनी नदी पर एक नाव के क्षतिग्रस्त होने से बार-बार होने वाली परेशानियों के बाद उनसे मदद मांगी थी। उन्हें झूला पुलों को डिजाइन करने का हालांकि कोई पूर्व अनुभव नहीं था, फिर भी उन्होंने तकनीकी साहित्य का अध्ययन किया, साथी इंजीनियरों से सलाह ली और ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी के साथ दो लाख रुपये से भी कम की लागत में एक किफायती झूला पुल का निर्माण किया। अरामबुर पुल की सफलता उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। इसने कर्नाटक सरकार का ध्यान आकर्षित किया, जिसने उन्हें अन्य दूरदराज के क्षेत्रों में भी इसी तरह की परियोजनाएं सौंप दीं।

अगले तीन दशकों में भारद्वाज कम लागत वाले ग्रामीण बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में एक अग्रणी नाम बनकर उभरे। उन्होंने वैश्विक झूला पुल तकनीक को भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल ढाला और साबित किया कि गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक बुनियादी ढांचा पारंपरिक लागत के एक बहुत छोटे हिस्से में भी तैयार किया जा सकता है। उनके बनाए पुल हजारों परिवारों के लिए जीवन रेखा बन गए, विशेष रूप से बाढ़ प्रभावित और पहाड़ी क्षेत्रों में जहाँ मौसमी नदियाँ अक्सर गांवों को हफ्तों के लिए अलग-थलग कर देती थीं। इनमें से कई संरचनाओं ने बच्चों को स्कूलों से जोड़ा, किसानों को अपनी उपज बाजारों तक ले जाने में सक्षम बनाया और स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं तक त्वरित पहुँच सुनिश्चित की, जिससे इन क्षेत्रों में जीवन की गुणवत्ता में काफी सुधार हुआ।

भारद्वाज को न केवल उनकी इंजीनियरिंग प्रतिभा बल्कि जनसेवा के प्रति उनकी द्दढ़ प्रतिबद्धता के लिए भी व्यापक रूप से सराहा जाता था। वे परियोजनाओं के पूरा होने तक निर्माण स्थलों पर रहकर स्वयं उनकी निगरानी करने के लिए जाने जाते थे। कई सामुदायिक वित्त पोषित परियोजनाओं में उन्होंने अपना व्यावसायिक शुल्क छोड़ दिया और यह सुनिश्चित करने के लिए अपने पैसे भी खर्च किए कि काम बिना किसी रुकावट के पूरा हो सके। ग्रामीण विकास और किफायती इंजीनियरिंग में उनके असाधारण योगदान के लिए केन्द्र सरकार ने उन्हें 2017 में पद्मश्री से सम्मानित किया था।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी एक प्रशंसा पत्र में उनकी अग्रणी 'सेतु बंधु' पहल की सराहना की थी और उनके काम को समाज की सेवा में इंजीनियरिंग का एक प्रेरक उदाहरण बताया था। अपने पुल-निर्माण मिशन के अलावा भारद्वाज सुलिया में रेशनल इंजीनियरिंग वर्क्स का संचालन करते थे और कम लागत वाले बुनियादी ढांचे के समाधान में रुचि रखने वाले युवा इंजीनियरों का मार्गदर्शन करते थे। उनके बेटे पतंजलि भारद्वाज ने परिवार की इस विरासत को आगे बढ़ाया है और उस द्दष्टिकोण को जारी रखा है जिसने भारद्वाज को राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाई। उनके परिवार में पतंजलि सहित दो बेटे और एक बेटी हैं।

विभिन्न नेताओं, इंजीनियरों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भारद्वाज को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की और व्यावहारिक, किफायती तथा टिकाऊ इंजीनियरिंग समाधानों के माध्यम से दूरदराज के समुदायों को जोड़ने के प्रति उनके आजीवन समर्पण को याद किया। उनके निधन से देश ने न केवल एक कुशल इंजीनियर बल्कि एक दूरदर्शी व्यक्ति को भी खो दिया है जिसके काम ने ग्रामीण जीवन को बदल दिया। देश भर में उनके द्वारा बनाए गए सैकड़ों पुल नवाचार, करुणा और समावेशी विकास के स्थायी प्रतीक के रूप में खड़े हैं, जो आने वाली पीढि़यों को जोड़ते रहेंगे। 

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