रोंगटे खड़े कर देने वाला बिजनेस! 10 लाख रुपये में किडनी खरीदते 80 लाख में बेचते... अस्पताल में पकड़े गए डोनर और रिसीवर

Edited By Updated: 01 Apr, 2026 09:48 AM

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उत्तर प्रदेश के कानपुर से एक रोंगटे खड़े कर देने वाला मामला सामने आया है, जहां इंसानी अंगों की खरीद-फरोख्त करने वाले एक बड़े अंतरराष्ट्रीय गिरोह का भंडाफोड़ हुआ है। कानपुर पुलिस की क्राइम ब्रांच और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीम ने केशवपुरम स्थित एक...

नेशनल डेस्क: उत्तर प्रदेश के कानपुर से एक रोंगटे खड़े कर देने वाला मामला सामने आया है, जहां इंसानी अंगों की खरीद-फरोख्त करने वाले एक बड़े अंतरराष्ट्रीय गिरोह का भंडाफोड़ हुआ है। कानपुर पुलिस की क्राइम ब्रांच और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीम ने केशवपुरम स्थित एक निजी अस्पताल पर छापेमारी कर इस रैकेट को बेनकाब किया। इस मामले में पुलिस ने अस्पताल संचालक डॉक्टर दंपत्ति और एक बिचौलिए को गिरफ्तार किया है। जांच में पता चला है कि यह गिरोह किडनी और लिवर ट्रांसप्लांट के नाम पर करोड़ों का अवैध कारोबार चला रहा था।

मासूम डोनर्स और मजबूर मरीजों का फायदा
इस काले धंधे का गणित बेहद चौंकाने वाला है। गिरोह के सदस्य गरीब और जरूरतमंद लोगों को 8 से 10 लाख रुपये का लालच देकर किडनी देने के लिए तैयार करते थे। वहीं, दूसरी ओर गंभीर बीमारियों से जूझ रहे अमीर मरीजों से एक ट्रांसप्लांट के बदले 80 लाख रुपये तक वसूले जाते थे। इस पूरी प्रक्रिया को अंजाम देने के लिए दिल्ली और लखनऊ जैसे बड़े शहरों से डॉक्टरों की विशेष टीम बुलाई जाती थी। पुलिस के अनुसार, इस खेल में शहर के कई अन्य निजी अस्पताल भी शामिल थे जो जांच और भर्ती के लिए बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराते थे।

22 दिनों के गुप्त ऑपरेशन से मिला सुराग
कानपुर पुलिस कमिश्नर को मिली एक गुप्त सूचना के बाद यह पूरी कार्रवाई शुरू हुई। पुलिस को खबर मिली थी कि शहर में कुछ बाहरी लोगों की मेडिकल जांच कराई जा रही है और उन्हें सर्जरी के बदले मोटी रकम का लालच दिया जा रहा है। इसके बाद एसटीएफ और क्राइम ब्रांच ने करीब 22 दिनों तक 'अंडरकवर' रहकर सबूत जुटाए। सोमवार रात जब पुख्ता जानकारी मिली, तो टीम ने अस्पताल पर छापा मारा। वहां एक महिला मरीज (रिसीवर) और एक युवक (डोनर) भर्ती मिले। डोनर की पहचान बिहार के समस्तीपुर निवासी आयुष के रूप में हुई है, जो वर्तमान में मेरठ में रह रहा था। आयुष को इस काम के लिए करीब 9.5 लाख रुपये दिए गए थे, जिसमें से कुछ हिस्सा यूपीआई और कुछ नकद था।

अस्पताल की लापरवाही और डोनर की हालत
गिरफ्तारी के दौरान एक डरावना सच यह भी सामने आया कि जिस अस्पताल में डोनर आयुष को रखा गया था, वहां इलाज की पर्याप्त सुविधाएं तक नहीं थीं। सर्जरी के बाद आयुष दर्द से तड़प रहा था, लेकिन उसे सही मेडिकल केयर नहीं दी जा रही थी। पकड़े जाने के डर से गिरोह ने डोनर और रिसीवर को अलग-अलग निजी अस्पतालों में छिपाकर रखा था। पूछताछ में आयुष ने पहले खुद को मरीज का भाई बताया, लेकिन कड़ाई से पूछने पर उसने कबूल किया कि उसने पैसों के लिए अपनी किडनी बेची है।

पांच राज्यों तक फैला है नेटवर्क
पुलिस जांच में यह भी साफ हुआ है कि यह गिरोह सिर्फ कानपुर तक सीमित नहीं है। इसके तार उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल और दिल्ली तक जुड़े हुए हैं। यह एक अंतर्राज्यीय नेटवर्क है जो संगठित तरीके से अंगों की तस्करी कर रहा है। फिलहाल एसटीएफ की पांच अलग-अलग टीमें कई शहरों में छापेमारी कर रही हैं। पुलिस का मानना है कि आने वाले दिनों में कुछ और बड़े अस्पतालों और नामी डॉक्टरों के नाम इस रैकेट में सामने आ सकते हैं। फिलहाल पकड़े गए आरोपियों से पूछताछ जारी है ताकि इस सिंडिकेट की जड़ों तक पहुंचा जा सके।

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