Edited By Sahil Kumar,Updated: 13 Sep, 2026 03:31 PM
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार को कहा कि देश के इतिहास और ज्ञान को उपनिवेशवादी प्रभाव से मुक्त करने का मतलब अतीत को मिटाना नहीं, बल्कि ''भारतीय दृष्टिकोण से ऐतिहासिक सच्चाई को प्रामाणिक तरीके से दुनिया के सामने प्रस्तुत करना है।''
मुंबईः केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार को कहा कि देश के इतिहास और ज्ञान को उपनिवेशवादी प्रभाव से मुक्त करने का मतलब अतीत को मिटाना नहीं, बल्कि ''भारतीय दृष्टिकोण से ऐतिहासिक सच्चाई को प्रामाणिक तरीके से दुनिया के सामने प्रस्तुत करना है।''
उन्होंने एशियाटिक सोसायटी मुंबई में एक पांडुलिपि प्रदर्शनी का उद्घाटन करने के बाद कहा कि भारतीय ज्ञान, इतिहास, परंपराओं, भाषाओं, पांडुलिपियों और अभिलेखों को संरक्षित किया जाना चाहिए तथा इन्हें देश और दुनिया भर के लोगों तक पहुंचाया जाना चाहिए। शाह ने कहा कि लंबे समय तक भारतीय ज्ञान की व्याख्या औपनिवेशिक दृष्टिकोण से की जाती रही, जिसने हीनभावना पैदा करने में योगदान दिया।
उन्होंने विश्वास जताया कि एशियाटिक सोसायटी जैसी संस्थाएं भारतीय ज्ञान और विरासत को संरक्षित करने तथा देश और दुनिया के कल्याण के लिए उसका उपयोग करने में मदद करेंगी। वर्ष 1804 में स्थापित एशियाटिक सोसायटी मुंबई शहर की सबसे पुरानी गैर-सरकारी संस्थाओं में से एक है। इसका उद्देश्य सामान्य रूप से एशिया और विशेष रूप से भारत के संदर्भ में भाषा, दर्शन, कला तथा प्राकृतिक एवं सामाजिक विज्ञानों के अध्ययन और शोध को प्रोत्साहित करना है।
शाह ने कहा, ''उपनिवेशवाद से मुक्ति का मतलब इतिहास को मिटाना नहीं है। हमारी नजर से इसका अर्थ है कि ऐतिहासिक सच्चाई को प्रामाणिक तरीके से और भारतीय दृष्टिकोण से दुनिया के सामने प्रस्तुत किया जाए।'' उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने ज्ञान और सत्ता को एक-दूसरे के साथ जोड़ दिया था तथा अब जरूरत इस बात की है कि ज्ञान को उस ढांचे से मुक्त किया जाए। शाह ने कहा, ''आज हम ज्ञान को उस ढांचे से मुक्त करने और उसे उपनिवेशवादी प्रभाव से मुक्त करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।''
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता शाह ने कहा कि कोई राष्ट्र अपनी शक्ति के बल पर लंबे समय तक कायम नहीं रह सकता, यदि वह अपनी ऐतिहासिक स्मृतियों, इतिहास, परंपराओं, संस्कृति, भाषाओं और अभिलेखों को संरक्षित करने में विफल रहता है। उन्होंने कहा, ''लेकिन जो राष्ट्र अपनी स्मृतियों, इतिहास, परंपराओं, संस्कृति, अभिलेखों, भाषाओं और व्याकरण को संरक्षित रखता है, उसे कितने भी वर्षों तक विदेशी शासन के अधीन क्यों न रहना पड़े, लेकिन गुलाम नहीं बनाया जा सकता। भारत इसका उदाहरण है।'' मंत्री ने कहा कि भारत की ज्ञान परंपराओं को नष्ट करने के प्रयास किए गए, लेकिन लोगों की स्मृतियों और मौखिक परंपराओं में समाहित ज्ञान को समाप्त नहीं किया जा सका। उन्होंने कहा, ''वे नालंदा के पुस्तकालय को जला सकते थे... लेकिन लोगों के मन में स्मृतियों और मौखिक परंपराओं के माध्यम से समाहित ज्ञान को नष्ट नहीं कर सके।''
'इंडोलॉजी' यानी भारतविद्या के विषय का उल्लेख करते हुए शाह ने कहा कि इसमें इतिहास, पुरातत्व, भाषा विज्ञान, दर्शन, साहित्य, धर्म, व्याकरण, मानव विज्ञान, अभिलेख विज्ञान और मुद्राशास्त्र जैसे विभिन्न विषय शामिल हैं। हालांकि, उन्होंने कहा कि लंबे समय तक भारतीय ज्ञान की व्याख्या औपनिवेशिक दृष्टिकोण से की जाती रही। शाह ने कहा, "भारतीय ज्ञान को भारत की अपनी आवाज में नहीं लिखा जा रहा था। इसे औपनिवेशिक दृष्टिकोण से लिखा जा रहा था।''
उन्होंने कहा कि इस दृष्टिकोण ने भारतीयों में हीनभावना पैदा करने और उनके आत्मविश्वास को कमजोर करने में योगदान दिया। शाह के अनुसार, औपनिवेशिक काल में भारतीय समाज का अध्ययन करने का उद्देश्य दुनिया का कल्याण करना नहीं था, बल्कि देश की व्यवस्थाओं को समझना और लंबे समय तक शासन करने को आसान बनाना था। उन्होंने कहा कि भारत की स्वतंत्रता के बाद स्थिति बदल गई है। उन्होंने विश्वास जताया कि एशियाटिक सोसायटी जैसी संस्थाओं द्वारा संरक्षित ज्ञान का अब देश और दुनिया के कल्याण के लिए उपयोग किया जाएगा। शाह ने भाजपा नेता विनय सहस्रबुद्धे की अध्यक्षता वाली एशियाटिक सोसायटी की नवनिर्वाचित समिति से इसके विशाल संग्रह तक लोगों की पहुंच बढ़ाने को कहा। उन्होंने सुझाव दिया कि महाराष्ट्र और देश के विभिन्न हिस्सों के विद्वानों की पहचान कर उन्हें सोसायटी में लाया जाए, ताकि वे यहां संरक्षित संग्रह पर शोध कर सकें। केंद्रीय मंत्री ने सोसायटी के संग्रह को डिजिटल स्वरूप देने और देशभर के पुस्तकालयों तथा इसी तरह की अन्य संस्थाओं के साथ उन्हें इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से साझा करने की भी अपील की।
उन्होंने भारत की विरासत को संरक्षित करने वाली विभिन्न संस्थाओं और पुस्तकालयों को जोड़ने के लिए एक साझा मंच बनाने का प्रस्ताव रखा, जिसमें मुंबई की एशियाटिक सोसायटी को अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए। शाह ने महाराष्ट्र के गांवों में घरों में रखी पांडुलिपियों और पूर्वजों से जुड़े दस्तावेजों की पहचान कर उन्हें ज्ञान भारतम राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के दायरे में लाने की भी अपील की। उन्होंने कहा, ''इन पांडुलिपियों में अपार ज्ञान समाहित है। इन पर शोध किए जाने की जरूरत है। ये देश को आगे बढ़ाने में बड़ी ताकत साबित हो सकती हैं।'' गृह मंत्री ने कहा कि इन पांडुलिपियों में ऐसा ज्ञान हो सकता है, जो भारत की आर्थिक और रणनीतिक प्रगति में योगदान दे सके।
शाह ने एशियाटिक सोसायटी में संरक्षित संग्रह का भी उल्लेख किया, जिसमें चित्रों से सुसज्जित महाभारत की प्रतियां, जैन कल्पसूत्र और बौद्ध ग्रंथ शामिल हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी सामग्री को देशभर के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए सुलभ बनाया जाना चाहिए। शाह ने कहा कि उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से केवल पुस्तकालय के उपयोग को सुगम बनाने का ही नहीं, बल्कि एशियाटिक सोसायटी को मजबूत करने का भी अनुरोध किया है।
उन्होंने कहा कि गांवों, शहरों और राज्यों में ज्ञान को संरक्षित करने वाली संस्थाओं को अंततः मुंबई की एशियाटिक सोसायटी से जोड़ा जाना चाहिए, ताकि विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए सुलभ एक साझा ज्ञान भंडार तैयार किया जा सके। शाह ने कहा कि वह सोसायटी में केवल केंद्रीय गृह मंत्री के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा को हजारों वर्षों तक आगे ले जाने के अभियान में एक सहभागी के रूप में आए हैं। उन्होंने कहा, ''मैं भारतीय ज्ञान परंपरा को हजारों वर्षों तक आगे ले जाने के अभियान के लिए यहां आया हूं।''