Edited By Rahul Singh,Updated: 20 Oct, 2026 06:02 PM
मोहन भागवत ने समाज में मतभेदों और विवादों को लेकर कहा कि छोटी-छोटी बातों पर तनाव बढ़ाने और लोगों को भड़काने से बचना चाहिए। उन्होंने राजनीतिक स्वार्थ के लिए सामाजिक विभाजन बढ़ाने की प्रवृत्ति पर चिंता जताई।
नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने विजयादशमी उत्सव के अवसर पर अपने संबोधन में सामाजिक एकता, भारतीय संस्कृति, स्वदेशी, पर्यावरण संरक्षण और नागरिक अनुशासन को राष्ट्र निर्माण के लिए महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि भारत को विकसित और विश्व में सम्मानित राष्ट्र बनाने के लिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और अपने दैनिक जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने होंगे। संघ की शताब्दी के कार्यक्रमों के समापन के अवसर पर दिए गए इस संबोधन में भागवत ने युवाओं में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति, सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों के प्रभाव, तकनीक के जिम्मेदार इस्तेमाल तथा समाज में सद्भाव बनाए रखने जैसे मुद्दों पर भी विचार रखे।
पंच परिवर्तन से समाज में बदलाव लाने का आह्वान
मोहन भागवत ने सामाजिक परिवर्तन के लिए संघ की पांच प्रमुख पहलों—सामाजिक समरसता, परिवार प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्व-बोध एवं स्वदेशी और नागरिक अनुशासन पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ये केवल कार्यक्रम नहीं, बल्कि जीवन में अपनाई जाने वाली ऐसी आदतें हैं, जिनसे व्यक्ति और समाज के व्यवहार में स्थायी बदलाव आ सकता है। उन्होंने सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठकर सभी के साथ सम्मानपूर्ण व्यवहार करने, परिवार में अच्छे संस्कार विकसित करने, पर्यावरण की रक्षा करने, स्वदेशी को प्रोत्साहित करने और कानून व नागरिक कर्तव्यों का पालन करने की आवश्यकता बताई।
युवाओं को नशे से बचाने के लिए देशव्यापी प्रयासों पर जोर
भागवत ने नशे की समस्या को गंभीर राष्ट्रीय चुनौती बताते हुए कहा कि इससे निपटने के लिए सरकार, प्रशासन और समाज को मिलकर प्रयास करने चाहिए। उन्होंने अभिभावकों से नई पीढ़ी को सही-गलत का अंतर समझाने और युवाओं को नशे से दूर रहने के लिए प्रेरित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री को बिना सोचे-समझे स्वीकार करना उचित नहीं है। युवाओं में विवेकपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता विकसित करना परिवार और समाज की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। ओटीटी प्लेटफॉर्मों पर उपलब्ध सामग्री के संबंध में भी उन्होंने उचित नियमों की आवश्यकता पर विचार करने की बात कही।
तकनीक के साथ नैतिकता और विवेक भी जरूरी
संघ प्रमुख ने कहा कि विज्ञान और तकनीक मानव जीवन को बेहतर बनाने के महत्वपूर्ण साधन हैं, लेकिन इनका उपयोग जिम्मेदारी के साथ होना चाहिए। उन्होंने आगाह किया कि केवल भौतिक सुख-सुविधाओं को केंद्र में रखकर किया गया विकास पर्यावरण और समाज के लिए नुकसानदायक हो सकता है। उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और परमाणु विज्ञान का उदाहरण देते हुए कहा कि उपयोगी तकनीकों का गलत इस्तेमाल भी संभव है। इसलिए तकनीकी प्रगति के साथ नैतिक मूल्यों, संयम और सही निर्णय लेने की क्षमता को भी महत्व देना चाहिए। भागवत ने भारत से ऐसे विकास मॉडल को अपनाने का आह्वान किया, जिसमें आर्थिक प्रगति के साथ पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक कल्याण और मानवीय मूल्यों का संतुलन बना रहे।
विविधता के बीच एकता को बताया भारत की विशेषता
अपने संबोधन में भागवत ने भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा को सामाजिक एकता का आधार बताया। उन्होंने कहा कि भारत में अलग-अलग धर्मों, भाषाओं, जातियों, खान-पान और रीति-रिवाजों के लोग रहते हैं। इन विविधताओं का सम्मान करते हुए आपसी विश्वास और सद्भाव बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय एकता के लिए देश के प्रति प्रेम, साझा विरासत का सम्मान और भारतीय संस्कृति के मानवीय मूल्यों को जीवन में अपनाना महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, समाज को संगठित और सक्षम बनाना तथा सभी समुदायों के साथ सम्मानपूर्ण व्यवहार करना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
विवादों का समाधान संवाद और संवैधानिक मर्यादा से हो
मोहन भागवत ने समाज में मतभेदों और विवादों को लेकर कहा कि छोटी-छोटी बातों पर तनाव बढ़ाने और लोगों को भड़काने से बचना चाहिए। उन्होंने राजनीतिक स्वार्थ के लिए सामाजिक विभाजन बढ़ाने की प्रवृत्ति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आंदोलन और विरोध का उद्देश्य समस्याओं का समाधान होना चाहिए। समाज के विभिन्न वर्गों, प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व को संविधान तथा कानून की मर्यादा में रहते हुए काम करना चाहिए। असहमति के बावजूद बातचीत, शालीन व्यवहार और आपसी सम्मान बनाए रखना जरूरी है। भागवत ने यह भी कहा कि समाज की समस्याओं का समाधान केवल सरकार या आंदोलनों से नहीं हो सकता। स्थानीय लोगों की भागीदारी और सामूहिक प्रयासों से भी शिक्षा, ग्रामीण विकास और अन्य सामाजिक चुनौतियों का समाधान किया जा सकता है।
संघ के शताब्दी अभियान के आंकड़े प्रस्तुत किए
भागवत के संबोधन में संघ के शताब्दी वर्ष के दौरान किए गए संपर्क और सामाजिक कार्यक्रमों के आंकड़े भी प्रस्तुत किए गए। भाषण में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, संपर्क अभियान के तहत 4,61,527 गांवों और 41,076 शहरी बस्तियों में 10,19,88,511 घरों तक संपर्क किया गया। इसके अलावा, 1,117 जिलों में आयोजित प्रबुद्ध नागरिक गोष्ठियों में 4,26,497 लोगों की भागीदारी का उल्लेख किया गया। सद्भावना बैठकें 5,036 खंडों में और हिंदू सम्मेलन 34,187 मंडलों में आयोजित किए जाने की जानकारी दी गई। युवा सम्मेलनों में 39,25,225 युवाओं की भागीदारी बताई गई। उन्होंने कहा कि भारत, भारतीय संस्कृति और संघ के कार्यों के बारे में संवाद को देश और विदेश में आगे भी जारी रखने की योजना है।
भारत को विश्व के सामने विकास का नया मॉडल प्रस्तुत करने का संदेश
भागवत ने कहा कि दुनिया आज पर्यावरण संकट, आर्थिक अनिश्चितता, सामाजिक तनाव और भू-राजनीतिक संघर्ष जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। उनके अनुसार, भारत अपनी सांस्कृतिक परंपराओं, संतुलित जीवन-दृष्टि और मानवीय मूल्यों के आधार पर इन समस्याओं के समाधान में योगदान दे सकता है। उन्होंने कहा कि भारत को विश्व में सम्मानित स्थान दिलाने के लिए केवल अतीत पर गर्व करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि वर्तमान में प्रत्येक क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करना होगा। इसके लिए नागरिकों को अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और व्यावसायिक जीवन में ईमानदारी, अनुशासन और जिम्मेदारी अपनानी होगी।
राष्ट्र निर्माण में हर नागरिक की भूमिका
संबोधन के अंत में भागवत ने राष्ट्र निर्माण को सामूहिक जिम्मेदारी बताते हुए कहा कि देश की प्रगति के लिए प्रत्येक व्यक्ति का योगदान जरूरी है। उन्होंने पंच परिवर्तन के माध्यम से समाज में अच्छे संस्कार, सामाजिक सद्भाव, आत्मनिर्भरता और नागरिक जिम्मेदारी बढ़ाने का संदेश दिया। उनके संबोधन का प्रमुख संदेश यह रहा कि भारत को सशक्त, आत्मनिर्भर और विकसित बनाने के लिए सामाजिक एकता, सांस्कृतिक मूल्यों, युवाओं के सही मार्गदर्शन और प्रत्येक नागरिक के जिम्मेदार आचरण पर ध्यान देना होगा।