Edited By Radhika,Updated: 06 Aug, 2026 02:05 PM

आज के समय में कलयुग इस सीमा पर पहुंच चुका है कि कलयुगी बच्चों के पास अपने पिता के अंतिम दर्शनों के समय भी नहीं मिला। सोनीपत से रिश्तों की सच्चाई को उजागर करने वाला एक ऐसा ही हृदय विदारक मामला सामने आया है।एक पिता ने अपनी बेटियों से मिलने की चाहत में...
नेशनल डेस्क: आज के समय में कलयुग इस सीमा पर पहुंच चुका है कि कलयुगी बच्चों के पास अपने पिता के अंतिम दर्शनों के समय भी नहीं मिला। सोनीपत से रिश्तों की सच्चाई को उजागर करने वाला एक ऐसा ही हृदय विदारक मामला सामने आया है। एक पिता ने अपनी बेटियों से मिलने की चाहत में दम तोड़ दिया, लेकिन बेटियों के पास पिता के अंतिम दर्शन के लिए भी समय नहीं था। वृद्ध आश्रम में रह रहे एक कपड़ा व्यापारी की मौत के बाद उनके अंतिम संस्कार में कोई अपना नहीं पहुंचा।
पत्नी का पहले ही हो चुका निधन
सामने आई जानकारी के अनुसार महाराष्ट्र के रहने वाले कपड़ा व्यापारी तकरीबन डेढ़ साल पहले अपनी पत्नी के साछ सोनीपत वृद्ध आश्रम आ गए। दंपति का कोई बेटा नहीं था। उन्होंने अपनी तीन बेटियों को पढ़ा-लिखाकर कामयाब बनाया, जिनमें से दो को उन्होंने अध्यापिका बनाया। उनकी पत्नी मीना गुप्ता का पहले ही निधन हो चुका था। इसके बाद वे काफी शांत रहने लग गए थे। उन्हें उम्मीद रहती थी कि शायद कभी बेटियां हाल- चाल पूछने के लिए फोन करें, लेकिन ऐसा न हुआ।
बीमारी में भी रहा आंखों को अपनों का इंतजार
तबीयत ज्यादा बिगड़ने पर वृद्धाश्रम प्रबंधन ने बेटियों को पिता की नाजुक हालत की जानकारी दी और उनसे मिलने का अनुरोध किया। लेकिन व्यस्तता और परिस्थितियों के कारण बेटियां नहीं आ सकीं। बीमारी के दौरान भी शिवचरण बार-बार यही पूछते रहे कि क्या उनकी बेटियों का कोई संदेश या कॉल आया है।
वीडियो कॉल से अंतिम विदाई, ऑनलाइन भेजे गए पैसे
शिवचरण ने मंगलवार सुबह अंतिम सांस ली। परिजनों के न पहुंच पाने के कारण अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू की गई। श्मशान घाट में एक तरफ चिता जल रही थी, तो दूसरी तरफ मोबाइल की स्क्रीन पर वीडियो कॉल के जरिए बेटियों ने पिता को अंतिम विदाई दी। बड़ी बेटी ने अंतिम संस्कार के खर्च के लिए ₹5,100 ऑनलाइन ट्रांसफर किए और आश्रम से ही अस्थियों का गंगा विसर्जन कराने का आग्रह किया।
जाते-जाते दे गए महादान का संदेश
शिवचरण की मौत के बाद उनके परिजनों की सहमति से उनका नेत्रदान कराया गया है। अपनी जिंदगी के अंतिम दिनों में जो अपनों को देखने के लिए तरस गई, अब वहीं आंखें किसी और को नया जीवन दान देंगी।