तमिलनाडु चुनाव में बढ़ी सियासी हलचल, भाजपा भविष्य की रणनीति पर भी नजर

Edited By Updated: 08 Mar, 2026 12:17 PM

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तमिलनाडु की राजनीति इन दिनों काफी दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गई है। आगामी चुनाव में मुख्य रूप से दो बड़े गठबंधनों के बीच मुकाबला दिखाई दे रहा है।

नेशनल डेस्क: तमिलनाडु की राजनीति इन दिनों काफी दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गई है। आगामी चुनाव में मुख्य रूप से दो बड़े गठबंधनों के बीच मुकाबला दिखाई दे रहा है। एक तरफ भाजपा और अन्नाद्रमुक का गठबंधन है, जबकि दूसरी ओर द्रमुक के नेतृत्व वाला गठबंधन है, जिसमें कांग्रेस भी शामिल है। हालांकि, इस बार चुनाव पूरी तरह से सीधा नहीं माना जा रहा, क्योंकि अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (टीवीके) भी मैदान में उतरकर मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश कर रही है।

द्रमुक की स्थिति फिलहाल मजबूत
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, कड़े मुकाबले के बावजूद द्रमुक की स्थिति फिलहाल कुछ बेहतर दिखाई दे रही है। इसका एक कारण विपक्षी खेमे में एकजुटता की कमी भी है। भाजपा ने कोशिश की थी कि अन्नाद्रमुक के सभी गुटों को एक साथ लाकर मजबूत चुनौती पेश की जाए, लेकिन यह प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हो पाया।

अन्नाद्रमुक के नेता ई. पलानीस्वामी अपने रुख पर अड़े रहे, जिसके कारण पार्टी के अलग-अलग गुटों को पूरी तरह एकजुट नहीं किया जा सका। वहीं, अन्नाद्रमुक के एक अन्य धड़े के नेता ओ. पनीरसेल्वम द्रमुक के साथ जुड़ गए हैं। इसके अलावा शशिकला भी अलग से चुनाव लड़ रही हैं। इन परिस्थितियों में विपक्षी वोटों के बंटने की संभावना बढ़ गई है, जिससे द्रमुक को फायदा मिल सकता है।

भाजपा की दोहरी रणनीति
भाजपा इस चुनाव में दो स्तर पर रणनीति बनाकर चल रही है एक चुनाव से पहले की और दूसरी चुनाव के बाद की। पार्टी राज्य की द्रमुक सरकार पर भ्रष्टाचार और वैचारिक मुद्दों को लेकर लगातार हमला कर रही है। भाजपा के प्रदेश स्तर के नेता सरकार की नीतियों और कामकाज पर सवाल उठा रहे हैं।

हालांकि, भाजपा ने द्रमुक के शीर्ष नेतृत्व पर सीधे व्यक्तिगत हमले करने से काफी हद तक परहेज किया है। इससे यह संकेत मिलता है कि पार्टी भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए पूरी तरह टकराव की स्थिति नहीं बनाना चाहती। इसके उलट भाजपा कांग्रेस पर काफी आक्रामक रुख अपनाए हुए है। पार्टी कांग्रेस नेतृत्व पर लगातार तीखे और कई बार व्यक्तिगत हमले भी कर रही है।

राज्यपाल के तबादले को भी रणनीति से जोड़ा जा रहा
चुनाव से ठीक पहले तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि को वहां से हटाकर पश्चिम बंगाल भेजे जाने को भी राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। राज्यपाल रवि और द्रमुक सरकार के बीच लंबे समय से टकराव की स्थिति बनी हुई थी। द्रमुक के नेताओं ने कई बार उन पर सार्वजनिक रूप से आलोचना भी की थी। रवि के स्थानांतरण के बाद द्रमुक खेमे में राहत की भावना देखी गई। राजनीतिक हलकों में इसे भाजपा और द्रमुक के बीच संभावित नए रिश्तों के लिए एक अवसर के रूप में भी देखा जा रहा है।


दशकों से द्रमुक-अन्नाद्रमुक के बीच सत्ता
तमिलनाडु की राजनीति पिछले कई दशकों से मुख्य रूप से दो क्षेत्रीय दलों—द्रमुक और अन्नाद्रमुक—के बीच घूमती रही है। दोनों दल बारी-बारी से सत्ता में आते रहे हैं। लेकिन अन्नाद्रमुक की प्रमुख नेता और पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के निधन के बाद पार्टी की राजनीतिक ताकत और संगठनात्मक स्थिति कमजोर हुई है।

इसका असर राज्य की राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ा है। राष्ट्रीय दलों की भूमिका यहां मुख्य रूप से इन क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन तक सीमित रही है। कांग्रेस लंबे समय से द्रमुक के साथ है, जबकि भाजपा अन्नाद्रमुक के साथ मिलकर चुनाव लड़ती रही है।

अभिनेता विजय की एंट्री से नया समीकरण
इस बार अभिनेता विजय की राजनीति में सक्रिय एंट्री ने चुनाव को और दिलचस्प बना दिया है। उनकी पार्टी टीवीके युवाओं के बीच खासा आकर्षण पैदा करने की कोशिश कर रही है। हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि उनका प्रभाव कितनी सीटों पर निर्णायक होगा, लेकिन कई विश्लेषकों का मानना है कि वे कुछ जगहों पर वोटों का समीकरण जरूर बदल सकते हैं।


चुनाव परिणाम पर सबकी नजर
कुल मिलाकर तमिलनाडु का चुनाव इस बार कई नए राजनीतिक समीकरणों के बीच हो रहा है। एक तरफ द्रमुक अपनी सत्ता बरकरार रखने की कोशिश में है, तो दूसरी ओर भाजपा और अन्नाद्रमुक उसे चुनौती देने की रणनीति बना रहे हैं। वहीं तीसरे विकल्प के रूप में नई राजनीतिक ताकतें भी अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही हैं।

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