शिवकुमार महास्वामी के आदर्श शासन का मार्गदर्शन करते हैं: उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन

Edited By Updated: 21 Jan, 2026 05:42 PM

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उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन ने बुधवार को कहा कि सिद्धगंगा मठ के दिवंगत पीठाधिपति श्री शिवकुमार महास्वामी के आदर्शों को शासन के माध्यम से संस्थागत अभिव्यक्ति मिली है। उन्होंने यह भी कहा कि पीठाधिपति की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा प्रधानमंत्री...

नेशनल डेस्क: उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन ने बुधवार को कहा कि सिद्धगंगा मठ के दिवंगत पीठाधिपति श्री शिवकुमार महास्वामी के आदर्शों को शासन के माध्यम से संस्थागत अभिव्यक्ति मिली है। उन्होंने यह भी कहा कि पीठाधिपति की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने में मार्गदर्शक शक्ति है। शिवकुमार महास्वामी की सातवीं पुण्यतिथि के अवसर पर उपराष्ट्रपति ने कहा कि सिद्धगंगा मठ ने नागरिकों के आध्यात्मिक विकास के साथ-साथ स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक एकता जैसे विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

महास्वामी का 21 जनवरी, 2019 को 111 वर्ष की आयु में निधन हो गया था। राधाकृष्णन के अनुसार, भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा ने धर्म और सेवा, वसुधैव कुटुंबकम और प्रकृति के प्रति सम्मान के मूल्यों के माध्यम से समाज का पोषण किया है। राधाकृष्णन ने कहा, ‘‘हाल के वर्षों में उनके (शिवकुमार महास्वामी के) शाश्वत आदर्शों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शासन के माध्यम से संस्थागत अभिव्यक्ति मिली है।'' उन्होंने कहा कि संस्कृत और पारंपरिक ज्ञान प्रणाली की विरासत, संरक्षण और संवर्धन पर पीठाधीश्वर का जोर देना और संतों, ऋषियों और आध्यात्मिक संस्थानों की मान्यता एक ऐसे शासन मॉडल को दर्शाती है जो सभी नागरिकों की समान रूप से सेवा करते हुए आस्था का सम्मान करता है।

उपराष्ट्रपति ने कहा, ‘‘महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में हिंदू चेतना का पुनरुत्थान इस बात की गरिमा को दर्शाता है कि हम कौन हैं, हम कहां से आए हैं और वे मूल्य क्या हैं जो हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। यह इस बात की पुष्टि करता है कि अपनी सभ्यता से जुड़ा राष्ट्र आधुनिक दुनिया से कहीं अधिक ऊंचा है और यह आत्मविश्वासी, करुणामय और समावेशी है।” उन्होंने आगे कहा, ‘‘आज भारत में एक संगठित ‘विकास' और ‘विरासत' है, यानी विरासत के साथ विकास, ताकि हम आध्यात्मिक रूप से स्थिर रहते हुए भौतिक रूप से प्रगति कर सकें।''

शिवकुमार महास्वामी की सातवीं पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए राधाकृष्णन ने कहा कि ‘चलते-फिरते भगवान'' (जैसा कि उन्हें श्रद्धापूर्वक संबोधित किया जाता था) का जीवन करुणा, त्याग और गरीबों की सेवा का जीवंत संदेश था। राधाकृष्णन ने श्रोताओं को बताया कि महास्वामी वर्ष 1941 में 500 साल पुराने मठ के प्रमुख बने और उन्होंने ‘त्रिविध दासोहा' की शुरुआत की, जो एक त्रिविध सहभोज व्यवस्था थी, जिसके तहत देश में भोजन की कमी के दौरान लोगों को भोजन, शिक्षा और आश्रय प्रदान किया जाता था।

उन्होंने कहा कि महास्वामी केवल रीति-रिवाजों और उपदेशों तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि कर्मठ संत थे। उन्होंने कहा कि महास्वामी ने आध्यात्मिकता को सेवा में और भक्ति को कर्तव्य में रूपांतरित किया। उपराष्ट्रपति ने कहा, ‘‘महास्वामी के जीवन ने ‘सेवा ही साधना' और ‘मानवता ही सर्वोच्च पूजा' है के शाश्वत भारतीय दर्शन को पुनः स्थापित किया। उन्होंने कहा कि सिद्धगंगा संस्था में हर जाति, हर समुदाय और हर क्षेत्र के सबसे गरीब परिवारों के लाखों बच्चों को अपना घर मिला।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि मठ ने हमारे देश के समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जहां बच्चों को आधुनिक विचारों और आध्यात्मिकता के साथ-साथ शिक्षा भी मिलती है। राधाकृष्णन ने कहा, ‘‘शिवकुमार महास्वामी ने हमें सिखाया है कि सच्ची आध्यात्मिकता सभी को समाहित करती है। जन्म से कोई श्रेष्ठ नहीं होता, बल्कि जन्म से सभी समान होते हैं, लेकिन केवल गरीबों की सेवा करके वे संत बन जाते हैं।'' 

 

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