Edited By Anu Malhotra,Updated: 03 Sep, 2026 02:43 PM

देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को फैसला सुनाया कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के पास लॉ कॉलेज के छात्रों (Law Students) के व्यक्तिगत आचरण या व्यवहार को कंट्रोल करने और उन पर डायरेक्ट एक्शन लेने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। कोर्ट ने...
नई दिल्ली: देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया (BCI) और स्टेट बार काउंसिल के पास लॉ स्टूडेंट्स के खिलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। कोर्ट ने साफ़ किया कि ऐसी अनुशासनात्मक शक्तियां स्टूडेंट्स के मूल संस्थान या संस्थान को चलाने वाले नियमों या उप-नियमों के तहत तय अथॉरिटी के पास होती हैं।
बार काउंसिल को किसी व्यक्ति पर अनुशासनात्मक अधिकार क्षेत्र तभी मिलता है जब वे एडवोकेट के तौर पर एनरोल हो जाते हैं। कोर्ट ने कहा कि BCI चेयरमैन द्वारा जारी निर्देश - जिन्हें बाद में BCI ने खुद ही वापस ले लिया था - जिनमें NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ़ लॉ, हैदराबाद के 2026 में ग्रेजुएट होने वाले बैच के एनरोलमेंट पर रोक लगाने और CJI के खिलाफ़ अभियान चलाने को लेकर स्टूडेंट्स और फैकल्टी सदस्यों के खिलाफ़ जांच की बात कही गई थी, कानूनी रूप से टिकने लायक नहीं थे।
चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी मोहना की बेंच, NALSAR के दो पूर्व स्टूडेंट्स मिहिरा सूद और अभिषेक तिवारी द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा द्वारा 13 अगस्त को जारी निर्देशों को चुनौती दी गई थी। इन निर्देशों के कारण जनता में नाराज़गी फैलने के कुछ ही समय बाद BCI चेयरमैन ने इन्हें वापस ले लिया था।