हम स्टूडेंट्स को उन नौकरियों के लिए तैयार कर रहे हैं, जो अभी मौजूद नहीं हैं : वो स्किल, जिन्हें आज स्कूलों को प्राथमिकता देनी चाहिए

Edited By Updated: 28 Sep, 2026 10:03 PM

we are preparing students for jobs that don t exist yet

पीपुल, टीच फॉर इंडिया की सीनियर डायरेक्टर तान्या अरोड़ा का कहना है कि, भारत में कहीं इस समय एक बच्चा क्लासरूम में बैठकर ऐसी नौकरी की तैयारी कर रहा है, जिसे अभी भी कोई नाम नहीं दिया गया है। यह कोई वैचारिक प्रयोग नहीं है। वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम की फ्यूचर...

पीपुल, टीच फॉर इंडिया की सीनियर डायरेक्टर तान्या अरोड़ा का कहना है कि, भारत में कहीं इस समय एक बच्चा क्लासरूम में बैठकर ऐसी नौकरी की तैयारी कर रहा है, जिसे अभी भी कोई नाम नहीं दिया गया है। यह कोई वैचारिक प्रयोग नहीं है। वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम की फ्यूचर ऑफ जॉब्स रिपोर्ट 2025 के मुताबिक आज इस्तेमाल हो रही 39 प्रतिशत मुख्य स्किल साल 2030 तक आउटडेटेड हो जाएंगी। ए.आई और ऑटोमेशन दुनिया में 92 मिलियन नौकरियों की जगह ले लेंगे, वहीं 170 मिलियन नई नौकरियां उत्पन्न होंगी। जब एम्प्लॉयर्स से पूछा गया कि वो एक कैंडिडेट में क्या चाहते हैं, तो उनका उत्तर किसी विशेष क्वालिफिकेशन के लिए नहीं था। बल्कि उन्होंने एनालिटिकल थिंकिंग, क्रिएटिव प्रॉब्लम सॉल्विंग, रेजिलिएंस, क्यूरियोसिटी और सेल्फ-अवेयरनेस की मांग की। इनमें से कोई भी स्किल स्कूल के पाठ्यक्रम में नहीं सिखाई जाती है।

भारत इसके लिए अभी तैयार नहीं है। इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2026 के मुताबिक 56.35 प्रतिशत ग्रेजुएट बेरोजगार हैं। हमारे लगभग आधे ग्रेजुएट स्कूल और कॉलेज पूरा करने के बाद भी उद्योग के लिए तैयार नहीं होते हैं। हम अपनी आबादी का लाभ उठाने के लिए स्किल्स का निर्माण नहीं कर रहे हैं।

स्कूलों ने दशकों से सिलेबस कवर कराने, परीक्षाएं पास करवाने और बच्चों को पहले से निर्धारित करियर के लिए तैयार करने पर ध्यान केंद्रित किया है। अब वह समय बीत चुका है। कंटेंट अभी भी मायने रखता है। लेकिन यह अपने आप में अकेले पर्याप्त नहीं है। बच्चा वास्तव में तैयार है या नहीं, यह इस बात से निर्धारित होता है कि क्या उन्होंने सोचना, सवाल करना और जब उत्तर उनकी किताब में नहीं दिया गया है, तो उसे तलाशना सीखा है।

मैं वापस इस पर जोर देती हूं कि हम इसके बारे में बात कैसे करते हैं। यहां स्किल का निर्माण तब किया जाता है, जब स्कूल की पढ़ाई पूरी हो जाती है। यह एक्स्ट्रा क्लास, प्रोग्राम या प्रतियोगिता द्वारा सिखाया जाता है। लेकिन टीच फॉर इंडिया में हम बिल्कुल उल्टा करते हैं। क्योंकि आप एक क्यूरियस, करेजियस और क्रिटिकल थिंकिंग वाले युवा को एक साईड प्रोजेक्ट के रूप में विकसित नहीं कर सकते। आपको मुख्य पढ़ाने के साथ यह करना होगा।

हम अपने फैलो को स्टूडेंट्स में 8 ‘सी’ के विकास के लिए प्रशिक्षित करते हैं, जो क्रिटिकल थिंकिंग, क्यूरियोसिटी, करेज, कम्युनिकेशन, कोलाबोरेशन, कंपैशन और कॉन्शियसनेस हैं। हम इसे पाठ तैयार करने, क्लासरूम के संचालन और स्टूडेंट खुद को एवं दुनिया को कैसे देखता है, उसका हिस्सा बनाते हैं।

हमारा स्टूडेंट लीडरशिप अभियान, किड्स एजुकेशन रिवॉल्यूशन 8 सी के आधार पर बना है, जो इस विचार को ठोस रूप देता है। 15 साल की अनीषा ने अपने समुदाय में माहवारी पर सालों की चुप्पी को तोड़ा। 40 से अधिक कार्यकर्ताओं को एकत्रित किया गया और मेंस्ट्रुपीडिया के साथ साझेदारी में जागरुकता की वर्कशॉप्स का आयोजन किया गया। आर्या ने अपने क्लासरूम और करीबी सरकारी स्कूलों के बीच आत्मविश्वास के अंतर को देखा और एक पब्लिक स्पीकिंग अभियान, स्पीक टू लीड का निर्माण किया, जो 400 स्टूडेंट्स तक पहुँचा। थमन्ना और शिवानी ने अपने समुदायों में दवाईयों के आपस में मिल जाने की समस्या को देखा और एक अवार्ड-विनिंग ब्रेल-लेबल्ड मेडिसीन बैग तैयार किया। उनमें से कोई भी किसी स्किल का प्रदर्शन नहीं कर रहा था। बल्कि वो कुछ हल कर रहे थे, जो उनके लिए जरूरी था। पर वो स्किल ही थीं, जिनकी वजह से वो वहां पर थे।

हमारा अपना डेटा इसका समर्थन करता है। टीच फॉर इंडिया के 1,580 पूर्व छात्रों पर किए गए एक स्वतंत्र अध्ययन में सामने आया कि उनमें से 79 प्रतिशत को आगे बढ़ने का आत्मविश्वास मिला। वो इसका क्रेडिट अपने क्लासरूम को देते हैं। 46 प्रतिशत अपने नागरिक समाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। वो अपने समुदायों में मेंटर और कार्यकर्ताओं के रूप में परिवर्तन ला रहे हैं। मूल बात यह है कि अन्य लोगों को अपना योगदान देने और परिवर्तन लाने में मुख्य भूमिका केवल वो नहीं निभाते हैं, जो परीक्षा पास करते हैं, बल्कि वो भी निभाते हैं, तो स्वयं नेतृत्व करते हैं।

भारत की नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 में 21वीं सदी के कौशल बताए गए हैं। पॉलिसी में कोई कमी नहीं है। कमी है हर क्लासरूम में, जहां टीचर को केवल सिलेबस कवर करने के लिए पुरस्कृत किया जाता है और स्टूडेंट्स की पहचान उनके द्वारा अर्जित अंकों से होती है। इस कमी को दूर करना होगा। इसकी शुरुआत उस साल नहीं होगी, जब हम ग्रेजुएट करेंगे, बल्कि इन्हीं सालों में होगी, जो हमारे सामने हैं।

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