क्यों डाइट-ओ-थेरेपी को आधुनिक इलाज में फिर से शामिल किया जाना चाहिए? डॉ. नौशाद अली राना

Edited By Updated: 30 Jan, 2026 05:20 PM

why should diet therapy be reintroduced into modern medicine

आज की तेज़ और भागदौड़ भरी ज़िंदगी में, सेहत को संतुलित और सही तरीके से समझना फिर से ज़रूरी हो गया है। खाना हमेशा से सेहत बनाए रखने, बीमारियों से बचाने और बीमारी से उबरने में मदद करता रहा है। लेकिन समय के साथ लोग सिर्फ दवाओं पर ज़्यादा निर्भर हो गए...

(वेब डेस्क): आज की तेज़ और भागदौड़ भरी ज़िंदगी में, सेहत को संतुलित और सही तरीके से समझना फिर से ज़रूरी हो गया है। खाना हमेशा से सेहत बनाए रखने, बीमारियों से बचाने और बीमारी से उबरने में मदद करता रहा है। लेकिन समय के साथ लोग सिर्फ दवाओं पर ज़्यादा निर्भर हो गए हैं और खाने की अहमियत कम होती गई है। भारत की पुरानी चिकित्सा पद्धतियां हमें यह सिखाती हैं कि सही आहार आज भी इलाज का एक ज़रूरी हिस्सा बन सकता है। यह आधुनिक दवाओं की जगह नहीं लेता, बल्कि उनका साथ देता है।

हर तरह की चिकित्सा पद्धति में यह माना गया है कि अच्छा खाना सेहत बनाए रखने और शरीर को ठीक होने में मदद करता है। यूनानी चिकित्सा में आहार का बहुत खास महत्व है। इसमें इलाज के चार तरीके बताए गए हैं—रेजिमेंटल थेरेपी, डाइट-ओ-थेरेपी, दवाइयों से इलाज और सर्जरी। इनमें सबसे पहले डाइट-ओ-थेरेपी को रखा गया है, क्योंकि यह प्राकृतिक है और शरीर की रोज़ की ज़रूरतों के अनुसार होती है।

यूनानी पद्धति के अनुसार, खाना सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं होता। खाना पचने के बाद शरीर का हिस्सा बन जाता है और शरीर को मज़बूत रखने में मदद करता है। इसी वजह से संतुलित आहार बहुत ज़रूरी है। अगर खाना सही न हो, तो स्कर्वी, एनीमिया और रिकेट्स जैसी बीमारियां हो सकती हैं। इससे साफ पता चलता है कि हमारी रोज़ की सेहत सीधे हमारे खाने से जुड़ी होती है।

यूनानी डॉक्टर पुराने समय से खास तरह का खाना इलाज के लिए इस्तेमाल करते आए हैं। मूंग दाल का सूप प्रोटीन, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है। यह शरीर की मरम्मत में मदद करता है, सूजन कम करता है और आसानी से पच जाता है। गेहूं या जौ की पतली दलिया बीमारी के बाद दी जाती है, क्योंकि यह हल्की होती है और शरीर को ताकत देती है। यही वजह है कि इसे बच्चों के खाने के रूप में भी दिया जाता है। जौ का पानी पुराने बुखार में फायदेमंद माना जाता है, और सब्ज़ियों का सूप पाचन और पोषण दोनों के लिए अच्छा होता है।

डाइट-ओ-थेरेपी में फलों का भी खास रोल होता है। कब्ज़ में पपीता, अमरूद, किशमिश, अंजीर, आम और केला दिए जाते हैं। दस्त में आंवला, नेक्टरीन और बेल फल फायदेमंद माने जाते हैं। उल्टी में अनार, फालसा, पुदीना और इलायची का इस्तेमाल किया जाता है। खून की कमी यानी एनीमिया में खजूर, अनार, अंगूर और किशमिश खाने की सलाह दी जाती है।

डाइट-ओ-थेरेपी की सबसे अच्छी बात यह है कि यह हर व्यक्ति के अनुसार होती है। हर इंसान का मिज़ाज यानी शरीर का स्वभाव अलग होता है। इसलिए हर खाना हर किसी के लिए बराबर सही नहीं होता। जैसे ठंडे मिज़ाज वाले लोगों को सर्दियों में ठंडे असर वाले फल, जैसे अनार या अनानास, खाने से सर्दी-खांसी हो सकती है। वहीं गर्म मिज़ाज वाले लोगों के लिए वही फल फायदेमंद हो सकते हैं। इस तरह व्यक्ति के अनुसार आहार तय करने से इलाज ज़्यादा असरदार होता है।

आम तौर पर कुछ खाने की चीज़ें खास फायदे के लिए ली जाती हैं। इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए आंवला, कलौंजी, हल्दी, मेथी और शहद अच्छे माने जाते हैं। पाचन और मेटाबॉलिज़्म के लिए पपीता, जायफल, काली मिर्च, जीरा और अजवाइन फायदेमंद हैं। डायबिटीज़ में मेथी, नेक्टरीन और आंवला उपयोगी होते हैं। हाई ब्लड प्रेशर में अनार, खीरा और सिरका लिया जाता है। जोड़ों के दर्द और गठिया में सहजन, मखाना, बादाम, कोलेजन और तिल मदद करते हैं।

अगर इन आहार नियमों को रोज़ की ज़िंदगी में अपनाया जाए, तो यह सेहत को लंबे समय तक बनाए रखने का एक आसान और प्राकृतिक तरीका बन सकता है। इससे बीमारी का बोझ कम होता है और इलाज पर होने वाला खर्च भी घट सकता है। जब आधुनिक इलाज में डाइट-ओ-थेरेपी को फिर से शामिल किया जाता है, तो स्वास्थ्य देखभाल ज़्यादा समझदारी भरी, व्यक्तिगत और टिकाऊ बनती है। यह बात साफ हो जाती है कि सही तरीके से लिया गया खाना सच में दवा की तरह काम करता है।

डॉ. नौशाद अली राना, एसोसिएट जनरल मैनेजर, हमदर्द वेलनेस, हमदर्द लेबोरेटरीज़ इंडिया.

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