यरूशलम दुनिया के लिए बना एक ‘ज्वलंत प्रश्न’

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Wednesday, December 13, 2017-3:26 AM

डोनाल्ड ट्रम्प ने यरूशलम को दुनिया का ज्वलंत प्रश्न बना डाला है। यरूशलम को लेकर दुनिया की प्रतिक्रियाएं काफी खतरनाक ढंग से सामने आ रही हैं और लगता है कि दुनिया के सामने शांति कायम करने की एक और गंभीर चुनौती खड़ी हो गई है। 

यरूशलम को लेकर एक ओर मुस्लिम देशों की गोलबंदी व यू.एन.ओ. की सुरक्षा परिषद है तो दूसरी ओर अमरीका और इसराईल हैं। यू.एन.ओ. की सुरक्षा परिषद और मुस्लिम देशों के संगठन ने चेतावनी की भाषा में कहा है कि यरूशलम पर अमरीका की नई कार्रवाई से दुनिया की शांति को खतरा है और अमरीका द्वारा खड़ा किया गया विवाद मजहबी टकराव का रूप धारण कर सकता है। खासकर मुस्लिम देशों की गोलबंदी काफी प्रतिक्रियावादी और खतरनाक है। सिर्फ  इतना ही नहीं बल्कि फिलस्तीन से लेकर अमरीका तक रोष प्रदर्शन हुए हैं। 

प्रदर्शन में शामिल लोगों ने ङ्क्षहसा बढऩे की चेतावनी देकर अमरीका और इसराईल को सावधान भी किया है। यू.एन.ओ. की सुरक्षा परिषद के विरोध के बावजूद अमरीका ने अपने कदम पीछे लेने से इंकार कर दिया है। अमरीका का साफ  कहना है कि फिलस्तीन में शांति सिर्फ  इसराईल के हितों की बलि देकर नहीं हो सकती है। इसराईल के हितों की बलि देने का अर्थ है मुस्लिम आतंकवादी संगठनों के सामने घुटने टेकना, जो ङ्क्षहसा और घृणा के बल पर अपनी बात हम पर थोपना चाहते हैं। इसराईल भी इस अवसर का लाभ उठाना और यरूशलम में अपनी उपस्थिति को मजबूत करना चाहता है। उसने तत्काल एक योजना बनाई है जिसमें आबादी संतुलन को अपने पक्ष में करने की नीति है। इसके लिए लगभग 1000 फ्लैट वाली 1500 नई बस्तियां विकसित की जाएंगी, जो अमरीका और दुनिया के अन्य देशों द्वारा खोले गए दूतावास और अन्य कार्यालयों की जरूरत को पूरा करेंगी।

अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी नई यरूशलम नीति से न केवल दुनिया को चकित कर दिया है बल्कि मुस्लिम देशों, मुस्लिम आतंकवादी संगठनों और यू.एन.ओ. को भी भड़कने का अवसर दे दिया है। ट्रम्प ने अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों जैसे बिल क्लिंटन और बराक ओबामा की उस इसराईल और फिलस्तीन नीति को एक झटके में बदल दिया था जिसमें दोनों के हितों के प्रति रुझान होता था। डोनाल्ड ट्रम्प ने अबसिर्फ इसराईल के हित साधने और उसकी अवधारणा को पुष्ट करने और समर्थन देने की नीति अपनाई है।

इसके तहत उसने अमरीकी दूतावास उस यरूशलम में स्थानांतरितकरने की घोषणा की है जिस पर न तो फिलस्तीन, न ही इसराईल के नियंत्रण की स्वीकृति यू.एन.ओ. से मिली है। जब डोनाल्ड ट्रम्प चुनाव लड़ रहे थे उसी समय उन्होंने घोषणा की थी कि अगर वह चुनाव जीते तो फिर इसराईल के हितों का संरक्षण करेंगे और फिलस्तीन में सक्रिय मुस्लिम आतंकवादी संगठनों को शांति का पाठ पढ़ाएंगे। अमरीका की राष्ट्रवादी जनता इसराईल पर डोनाल्ड ट्रम्प की इस नीति से खुश है। 

यू.एन.ओ. की परिभाषा मानें तो अभी भी यरूशलम पर किसी देश का अधिकार नहीं है। यू.एन.ओ. ने अपनी अदूरदर्शिता वाली नीति और निर्णय से यरूशलम के विवाद को सुलझाने की जगह खतरनाक बना डाला और यरूशलम को ऐसी स्थिति में खड़ा कर दिया कि उसकी समस्या का समाधान संभव ही नहीं हो सकता है। भू-भाग पर किसी देश का ही नियंत्रण होता है, पर यू.एन.ओ. ने अपने निर्णय में धर्म को नियंत्रक बना डाला। 1967 में यू.एन.ओ. की सुरक्षा परिषद ने एक प्रस्ताव पारित कर यरूशलम में इसराईल और फिलस्तीन को छोड़कर अन्य किसी देश की गतिविधियां प्रतिबंधित कर दी थीं और अन्य देशों के यरूशलम में दूतावास खोलने पर भी प्रतिबंध लगा दिया था। 

इतना ही नहीं, बल्कि सुरक्षा परिषद ने एक प्रस्ताव पारित कर कहा था कि यरूशलम पर इसराईल और फिलस्तीन की सहमति जरूरी है। इसराईल और फिलस्तीन 1967 से लेकर अब तक किसी निर्णय पर नहीं पहुंचे हैं। सच तो यह है कि यरूशलम को लेकर इसराईल और फिलस्तीन के बीच मतभेद बढ़ते ही चले गए और मतभेद हिंसा का कारण भी बना हुआ है। यू.एन.ओ. ने 1980 में एक प्रस्ताव पारित कर यरूशलम की समस्या को और गंभीर बना दिया है।1980 के प्रस्ताव में यू.एन.ओ. की सुरक्षा परिषद ने कहा है कि यरूशलम एक पवित्र शहर है और इसे पवित्र शहर की मान्यता दी जाती है। इस पवित्र शहर पर न सिर्फ इस्लाम बल्कि ईसाइयत और  यहूदी  तीनों मजहबों का अधिकार रहेगा। 

यरूशलम शहर को मजहब के आधार पर देखना यू.एन.ओ. की सुरक्षा परिषद की भयंकर भूल थी। मुस्लिम, ईसाई और यहूदी तीनों ने यरूशलम को मजहबी और शांति के प्रतीक के तौर पर देखने की जगह अपने-अपने स्वार्थ की कसौटी पर देखने की कोशिश की है। खासकर मुस्लिम मान्यताओं और यहूदी मान्यताओं को लेकर यरूशलम में हुई हिंसा इसका प्रमाण है। अब तक यरूशलम औैर पूरे फिलस्तीन में आजादी के नाम पर हजारों लोगों का खून बह चुका है। 

इसराईल ने दुनिया के दबाव में आकर फिलस्तीन को स्वायत्तशासी क्षेत्र घोषित किया था। फिलस्तीन के नाम पर धमकी पिलाने वाले, खून-खराबा करने के समर्थक मुस्लिम देश कभी भी फिलस्तीन की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए सामने नहीं आए हैं। ये मुस्लिम देश सिर्फ आतंकवादी संगठनों के ही हित पोषक बनते हैं। अगर अमरीका और यूरोप आर्थिक सहायता बंद कर दें तो फिर फिलस्तीन की जनता भूखों मरने के लिए विवश हो सकती है। इसराईल की सुरक्षा के प्रश्न को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। दुनिया को यरूशलम पर सहमति बनाने की कोशिश करनी चाहिए।-विष्णु गुप्त

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