पंजाब में ‘आप’ के पक्ष में लहर भाजपा-कांग्रेस के लिए ‘डरावनी खबर’

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Friday, February 17, 2017-2:08 AM

यह आम राय बनती जा रही है कि पंजाब में आम आदमी पार्टी (आप) के पक्ष में लहर है। यह भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए बहुत डरावनी खबर है-इसलिए नहीं कि वे चुनाव हार जाएंगे, बल्कि इसलिए कि भविष्य का मार्ग उनके लिए बहुत मुश्किल हो जाएगा। 

चुनावों के इस दौर में पछाड़ खाने के बाद नरेन्द्र मोदी की छवि की चमक-दमक को जो आघात पहुंचेगा उसका इलाज नहीं किया जा सकेगा। मई 2014 के आम चुनावों में उनकी जीत ने खुशी की मस्ती का जो आलम पैदा किया था वह दिसंबर 2013 में दिल्ली में ‘आप’  और फरवरी 2015 में बिहार विधानसभा चुनावों में राजद-जद (यू) के हाथों लगातार दो पराजय झेलने के बाद 2016 के बंगाल, तमिलनाडु, केरल तथा पुड्डुचेरी चुनावों में मिली पराजयों के फलस्वरूप हवा होना शुरू हो गया था। परन्तु ताजा चुनावों में महत्वपूर्ण राज्यों में पराजय आंतरिक बेचैनी का सृजन करेगी और नोटबंदी के राजनीतिक दुष्प्रभावों में बढ़ौतरी करेगी। 

जहां तक कांग्रेस का सवाल है, ‘आप’ का निरंतर अभ्युदय इसके अस्तित्व पर खतरे का सूचक है। उत्तरी राज्यों में खो चुका जनाधार हासिल करने में इसकी विफलता अब दयनीय वास्तविकता का रूप धारण कर जाएगी-बिल्कुल इसी तरह  गांधी-नेहरू परिवार का जलवा भी चूर-चूर हो जाएगा। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव का दामन थाम कर न तो राहुल और न ही कांग्रेस ज्यादा दूर तक जा सकेंगे। 

वैसे कांग्रेस में हाशिए पर विचरण कर रहे कुछ नेताओं को अभी भी उम्मीद है कि इस निर्णायक मोड़ पर प्रियंका गांधी यदि सहायता के लिए  आगे आती हैं तो यह कांग्रेस के लिए अंधेरे में रोशनी की किरण जैसा होगा। यदि प्रियंका के व्यवहार को संकेत माना जाए तो उसका स्वास्थ्य कुछ ठीक नहीं चल रहा और इसलिए वह राहुल और सोनिया तक के संसदीय क्षेत्रों अमेठी और रायबरेली पर भी फोकस नहीं कर सकतीं, जबकि सुरक्षित देखभाल के लिए ये क्षेत्र उन्हीं के हवाले किए गए हैं। फिर भी प्रियंका में राजनीतिक अस्तित्व बनाए रखने की बहुत चतुराई भरी और गजब की क्षमता है। 2014 के आम चुनावों दौरान ऐसी आशंकाएं व्यक्त की गई थीं कि ये दोनों सीटें भी मोदी लहर  की भेंट चढ़ जाएंगी तथा उनकी मां और भाई शायद अगली संसद में जगह  हासिल नहीं कर पाएंगे लेकिन प्रियंका ने दमखम दिखाया और लगातार 2 सप्ताह तक अभियान चला कर अपने छोटे भाई तथा मां की  विजय सुनिश्चित की। 

कांग्रेस की प्रत्याशित पराजय के अनेक कारण हैं। इनमें से एक तो है मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा करने में आदतन विलम्ब। अमरेन्द्र सिंह को बहुत देर बाद मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में प्रस्तुत किया गया। कांग्रेसी बुदबुदाते तो रहते हैं लेकिन वास्तव में कभी भी यह कहने की हिम्मत नहीं करते कि कांग्रेस अध्यक्षा  हरगिज किसी ऐसे व्यक्ति को राजनीतिक तौर पर नहीं उभारेंगी जो उनके अपने परिवार और खासतौर पर राहुल की संभावनाओं को धूमिल कर सकता हो। मैं ऐसा खासतौर पर  अमरेन्द्र सिंह के बारे में ही नहीं कह रहा बल्कि ऐसे अन्य कई उदाहरण भी हैं। 

मेरा सदा से यह मत रहा है कि 2014 के चुनावों में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित शायद इस केन्द्र शासित प्रदेश में विरोधियों को चित्त कर देतीं यदि पार्टी हाईकमान ने उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने का थोड़ा-बहुत भी संकेत दिया होता। पार्टी कार्यकर्ताओं में एक नया जोश भरा जा सकता था लेकिन ऐसा करने की बजाय हाईकमान ने ऐसीबेरुखी अपनाए रखी जैसी दुश्मनों के प्रति बरती जाती है। फलस्वरूप शीला पराजित हो गईं और यहीं से केजरीवाल और ‘आप’ के अभ्युदय की यात्रा शुरू हो गई। 

वैसे राहुल गांधी की प्रधानमंत्री के रूप में ताजपोशी करवाने के सोनिया गांधी के सपने को साकार करने की दिशा में किसी प्रकार का कदम उठाने  का वक्त अब बहुत पीछे छूट गया है। आप खुद ही सोचें कि कांग्रेस जैसी पार्टी के उस उपाध्यक्ष का क्या भविष्य हो सकता है जो लखनऊ में अब अखिलेश यादव के साथ छुटभैया भूमिका अदा कर रहा है? सितंबर 1998 में पंचमढ़ी (मध्य प्रदेश) में आयोजित चिंतन शिविर के दौरान कमलनाथ, अर्जुन सिंह और जितिंद्र प्रसाद जैसे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ‘दीवार पर लिखा’ पढऩे में असफल रहे और इस प्रस्ताव को रद्द कर दिया कि कांग्रेस ने यदि जिंदा रहना है तो उसे अवश्य ही दूसरी पार्टीयों के साथ गठबंधन करना होगा।

चंद्रजीत यादव और राजेश पायलट (सचिन पायलट के पिता) गला फाड़-फाड़ कर दुहाई देते रहे कि ‘‘वर्तमान परिस्थितियों में गठबंधन के बिना अन्य कोई विकल्प ही नहीं है।’’ विडम्बना देखिए कि पंचमढ़ी चिंतन शिविर में गठबंधन के प्रस्ताव को सिरे से रद्द करने वाली सोनिया गांधी ने 18 वर्ष बाद यू.पी. में ऐन उसी पार्टी के साथ गठबंधन किया है जिसको उन दिनों वे नेता भी मुंह लगाने को तैयार नहीं थे जो आज भी सोनिया की अंदरूनी जुंडली में सुशोभितहैं। 

भाजपा और कांग्रेस ने यदि एक-दूसरे को प्रतिस्पर्धा में पराजित कर दिया होता तो उनको आज का हताशापूर्ण दौर न देखना पड़ता। ‘आप’ पंजाब में जहां ‘तीसरी शक्ति’ के रूप में  उभर रही है, वहीं गोवा में भी अपनी पैठ बना रही है। 11 मार्च को चुनावों के परिणाम आते ही राजस्थान जैसे प्रदेश में भी कांग्रेस का हतोत्साह ज्वारभाटे की तरह उछल पड़ेगा। 

आज तक जो कार्पोरेट घराने कांग्रेस और भाजपा की अदल-बदल से बनने वाली सरकारों में सुखद महसूस कर रहे थे, उन्हें अब अपने दाव खेलने के लिए नए तरीके ढूंढने पड़ेंगे। उधर पंजाब चुनावों के नतीजों का पूर्वानुमान लगाते हुए केजरीवाल ने पहले ही खुद को दिल्ली नगर निगम के चुनावों में सक्रिय कर लिया है जोकि 2 माह में होने वाले हैं। मोदी और अमित शाह की जोड़ी को जो बात सबसे अधिक बेचैन कर सकती है, वह यहकि ‘आप’  ने गुजरात पर भी निशाना साधा हुआ है। भाजपा के रास्ते में और भी अधिक कांटे बिखेरते हुए पाटीदार आंदोलन के नायक हार्दिक पटेल ने पहले ही प्रदेश में शिवसेना नेता के रूप में पांव पसारने शुरू कर दिए हैं। 

नोटबंदी से संबंधित अफरा-तफरी के बावजूद मोदी एक बात सिद्ध करने में सफल रहे थे कि वह पूरे देश को बैंकों के  बाहर कतारों में खड़ा कर सके और कोई नेता उनके विरुद्ध विद्रोह नहीं भड़का पाया। यह स्थिति अब बदल जाएगी। केजरीवाल और अखिलेश की बढ़ती ताकत ममता बनर्जी, नीतीश कुमार-लालू प्रसाद और अन्य क्षेत्रीय बाहुबलियों को नए विकल्प तलाशने की ओर अग्रसर करेगी। इस परिदृश्य में राहुल कहां फिट हो सकेंगे, यह तो समय ही  बताएगा। 


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