श्री कृष्ण के दर्शन करते समय रखें ध्यान, पुण्य का प्रभाव होगा कम व बढ़ेगा अधर्म 

  • श्री कृष्ण के दर्शन करते समय रखें ध्यान, पुण्य का प्रभाव होगा कम व बढ़ेगा अधर्म 
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Friday, September 23, 2016-10:40 AM

शास्त्रों में ऐसा वर्णन है कि श्री भगवान के दर्शन मात्र से ही जन्म-जानमंतार के पाप धुल जाते हैं । इसी कारण श्री भगवान के दर्शन पाने हेतु कई प्रकार के अनुष्ठान और जतन किए जाते हैं । भक्तगण तीर्थों, देवालयों, धार्मिक स्थलों व मंदिरों में देवी-देवताओं के दर्शन हेतु जाते हैं । मान्यतानुसार सर्व देवी-देवताओं की मूर्तियों के दर्शन मात्र से पुण्य ही प्राप्त होता है परंतु ऐसा एक अपवाद शास्त्रों में उल्लेखित मिलता है । मान्यतानुसार भगवान श्रीकृष्ण के पीठ दर्शन करना शास्त्रों में वर्जित माना गया है । भगवान श्री कृष्ण की पीठ के दर्शन न करने का नियम शास्त्रों में दिया गया है । इसलिए जब भी कृष्ण मंदिर जाएं तो यह जरुर ध्यान रखें कि भगवान कृष्ण की प्रतिमा के पीठ दर्शन कभी न करें । 


शास्त्र सुख सागर में पीठ दर्शन न करने के संबंध में भगवान श्रीकृष्ण की लीला जुड़ी हुई है । कृष्णलीला अनुसार जब भगवान श्रीकृष्ण जरासंध से युद्ध कर रहे थे तब जरासंध का एक साथी असूर कालयवन भी उनसे युद्ध करने आ पहुंचा । कालयवन कृष्ण के समक्ष उन्हें ललकारने लगा । तब श्रीकृष्ण वहां से भाग निकले । रणभूमि से भागने के कारण ही उनका नाम रणछोड़ पड़ा । जब श्रीकृष्ण भाग रहे थे तब कालयवन भी उनके पीछा करने लगा । इस तरह श्रीकृष्ण रणभूमि से भागे क्योंकि कालयवन के पूर्व जन्म के पुण्य बहुत ज़्यादा थे व श्रीकृष्ण किसी को भी तब तक सजा नहीं देते थे जब कि पुण्य का बल शेष रहता था। कालयवन श्रीकृष्ण की पीठ देखते हुए भागने लगा व इसी तरह उसका अधर्म बढ़ने लगा क्योंकि भगवान की पीठ पर अधर्म का वास होता है । 


शास्त्रनुसार श्रीभगवान की पीठ के दर्शन करने से अधर्म बढ़ता है । जब कालयवन के पुण्य का प्रभाव खत्म हो गया तब श्रीकृष्ण एक गुफा में चले गए । जहां मुचुकुंद नामक राजा निद्रासन में था । मुचुकुंद को देवराज इंद्र का वरदान था कि जो भी व्यक्ति राजा को नींद से जगाएगा वो राजा की दृष्टि पढ़ते ही वह भस्म हो जाएगा। कालयवन ने मुचुकुंद को श्रीकृष्ण समझकर उठा दिया व राजा की नजर पढ़ते ही वह भस्म हो गया ।


अत: श्री भगवान की पीठ के दर्शन नहीं करने चाहिए क्योंकि इससे पुण्य कर्म का प्रभाव कम होता है व अधर्म बढ़ता है । भगवान श्रीकृष्ण का सदैव सनमुख होकर दर्शन करें । यदि भूलवश उनकी पीठ के दर्शन हो जाएं तो भगवान से याचना करें । शास्त्रानुसार इस पाप से मुक्ति हेतु कठिन चांद्रायण व्रत करना होता है । शास्त्रों मे चांद्रायण व्रत हेतु निर्देश दिए गए हैं । निर्देश के अनुसार चंद्रमा के घटने व बढ़ने के क्रम मे व्रती को खान-पान में कटौती या बढ़ौतरी करना पड़ती है व अमावस्या को निराहार रहना पड़ता है व पूर्णिमा यह व्रत पूर्ण हो जाता है ।

आचार्य कमल नंदलाल 
ईमेल: kamal.nandlal@gmail.com

Edited by:Aacharya Kamal Nandlal

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