कृष्णावतार

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Sunday, October 09, 2016-3:20 PM

अर्जुन ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा,‘‘जल दानवों के राजा ने मुझे वचन दिया कि वह भविष्य में ऐसा ही करेगा। उसकी भाषा जानने वालों ने उसे मेरी बातें और उसकी बातें मुझे समझाईं। राजा ने भोजन आदि की बहुत-सी सामग्री के अलावा सोना, चांदी तथा तरह-तरह के रत्न मंगवा कर हमारी नौका में लाद दिए और अपनी भी कई नौकाएं ऐसे ही सामान से भर कर हमारे साथ भेज दी। हम उन सबसे विदा होकर तट पर आए। मैंने देवराज इंद्र के नाविक को संदेश भेजा और वह रथ लेकर आ गया। बहुत-सा सामान रथ पर लदवा लिया गया और बाकी फिर ले जाने के लिए वहीं छोड़ कर मैं रथ में बैठ कर अमरावती जा पहुंचा। देवराज इंद्र ने प्रसन्न होकर मुझे अपने शरीर की रक्षा के लिए यह कवच और सोने की एक माला भी दी व अपना देवदूत शंख भी दे दिया।’’ 

 

अर्जुन की ये सब बातें सुन कर युधिष्ठिर ने हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘बड़ा अनुग्रह है हम पर देवराज इंद्र व अन्य देवताओं का....।’’

 

महाराज युधिष्ठिर, भीम, नकुल, सहदेव और द्रौपदी को देवराज इंद्र के पास से लौटने के बाद आपबीती की कथाएं सुनाते हुए अर्जुन ने बताया कि ‘‘नवातकोच नामक असुरों पर विजय प्राप्त करके समुद्र पर शांति स्थापित करने के बाद जब मैं देवराज इंद्र के रथ में लौट रहा था तो मार्ग में एक ओर बहुत सुंदर नगर मैंने देखा। यह बहुत लम्बा-चौड़ा और अग्नि के समान कांतिपूर्ण था।’’

 

‘‘कौन से लोग रहते थे उस नगर में?’’ द्रौपदी ने पूछा। 

 

‘‘उस नगर में दैत्य लोग ही रहते थे।’’ अर्जुन ने बताया, ‘‘यह नगर ऐसे ढंग से बनाया गया था कि इसे इच्छानुसार कहीं भी ले जाया जा सकता था। इस अद्भुत नगर को देख कर मैंने देवराज इंद्र के सारथी मातुल से पूछा कि यह नगर किसका है?’’ 

 

मातुल ने मुझे बताया कि, ‘‘पलोमी और कालका नाम की दो दानव महिलाएं  थीं। उन्होंने घोर तपस्या की और अंत में ब्रह्मा जी ने उन्हें दर्शन दिए तो उन महिलाओं ने वर मांगा कि हमारे पुत्रों को बिल्कुल भी कष्ट न हो। देवता, राक्षस या नाग कोई भी उन्हें मार न सके और उनके रहने के लिए एक बहुत ही सुंदर, मनोरम, प्रकाशपूर्ण तथा आकाश को छूता हुआ नगर हो।’’                       

(क्रमश:)
 


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