कृष्णावतार

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Sunday, October 23, 2016-1:57 PM

इसके बाद अर्जुन ने बताया, ‘‘मातुल मेरा रथ लेकर गांव के द्वार पर गया। इस नगर के चारों ओर परकोटा बना हुआ था और दीवार पर अनेक दैत्य शस्त्रों से सजे चारों ओर पहरा दे रहे थे। मैंने देवराज इंद्र का प्रदान किया हुआ ‘देवदत्त’ नामक शंख बजाया और ऐसी धुनें निकाली जिनका अर्थ वे सब समझते थे कि या तो मित्र बन कर रहना स्वीकार कर लो और या फिर बाहर आकर युद्ध करो। जो दैत्य पहरे पर तैनात थे उनमें से कुछ धनुष पर बाण चढ़ाकर और कुछ दूसरे शस्त्र हाथों में लेकर युद्ध करने के लिए तैयार हो गए। कुछ दैत्य जो उनके सरदार मालूम होते थे, अंदर दौड़ गए।’’

 

‘‘कुछ ही देर में बहुत से दैत्य रथों व घोड़ों पर सवार होकर तथा कुछ पैदल अस्त्र-शस्त्र लिए बाहर निकल आए और बड़े क्रोध में भर कर मुझ पर विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों से प्रहार करने लगे। अंतर मात्र इतना था कि उनके समस्त शस्त्र तांबे के बने हुए थे जबकि मेरे बाण तथा अन्य शस्त्र इस्पात से निर्मित थे और मेरे शरीर पर कवच भी इस्पात का था इसलिए उनके सभी अस्त्र-शस्त्र मेरे कवच पर लगते ही बेकार होकर नीचे गिर जाते थे।’’ 

 

इसके बाद कुछ क्षण रुक कर अर्जुन ने बताया, ‘‘तब मैंने अपनी अस्त्र विद्या से भीषण बाण वर्षा करके उनकी शस्त्र वृष्टि पर रोक लगा दी और उन दैत्यों को मार गिराया। इसके बाद वे सब दौड़ कर अपने नगर में घुस गए और उस नगर को आकाश में ले जाने की कोशिश करने लगे। तब मैंने अपने दिव्य अस्त्रों का सहारा लेकर उसके कल-पुर्जों में भयानक ज्वाला भड़का दी और वह नगर धरती पर गिर पड़ा। महिलाएं और बालक घरों से निकल-निकल कर अपने प्राण बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे जबकि अनेक पुरुष आग बुझाने में जुट गए और उनमें से अनेक तो आग में जल कर भस्म भी हो गए। उसी समय एक अन्य दल मुझसे युद्ध लड़ने के लिए बाहर से वहां आ गया। यह दल बड़ा विकट था और ये लोग तो मेरे दिव्य अस्त्रों का भी बड़ी आसानी से काट कर रहे थे।’’   
(क्रमश:)


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