Edited By ,Updated: 05 Jun, 2026 03:36 AM

इस दौर में हमारा ज्ञान लगातार बढ़ रहा है लेकिन आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि पर्यावरण के मामले में क्या हमारी समझ बढ़ी है? पर्यावरण की वर्तमान स्थिति को देखकर तो ऐसा नहीं लगता। पर्यावरण की सेहत लगातार बिगड़ती जा रही है। कुछ समय पहले आस्ट्रेलिया के...
इस दौर में हमारा ज्ञान लगातार बढ़ रहा है लेकिन आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि पर्यावरण के मामले में क्या हमारी समझ बढ़ी है? पर्यावरण की वर्तमान स्थिति को देखकर तो ऐसा नहीं लगता। पर्यावरण की सेहत लगातार बिगड़ती जा रही है। कुछ समय पहले आस्ट्रेलिया के मोनाश विश्वविद्यालय में हुए एक अध्ययन में बताया गया था कि लू से जुड़ी मौतें गर्मी से मरने वालों की कुल संख्या का लगभग एक-तिहाई और विश्व भर में हुई कुल मौतों का एक फीसदी है। पिछले 30 वर्षों के आंकड़ों के आधार पर यह बताया गया है कि हर वर्ष गर्मी में 1.53 लाख अतिरिक्त लोगों की जान चली जाती है, जिनमें से लगभग आधी मौतें एशिया में और 30 फीसदी से ज्यादा यूरोप में होती हैं। भारत में हर साल 30 हजार से ज्यादा लोगों की लू के कारण मृत्यु हो जाती है।
कई शोधों में यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है। इसके साथ ही मौसम का चक्र भी अनियमित हो गया है। कुछ समय पहले ‘असैसमैंट ऑफ क्लाइमेट चेंज ओवर द इंडियन रीजन’ नामक रिपोर्ट में भी बताया गया था कि अगर जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए बड़े कदम नहीं उठाए गए, तो लू के थपेड़ों में 3 से 3.5 गुना बढ़ौतरी दिखाई देगी और समुद्र का जलस्तर 30 सैंटीमीटर तक उठ सकता है। इस रिपोर्ट के अनुसार पिछले दशकों में देश ने तापमान में वृद्धि और मानसून में कमी का सामना किया है। शोधकत्र्ताओं का कहना है कि इस बात के पुख्ता प्रमाण हैं कि इस बदलाव को मानव गतिविधियों ने प्रभावित किया है। पिछले दिनों हम सबने यह महसूस किया कि लॉकडाऊन के दौरान वायु और जल प्रदूषण कम हुआ। इस दौर में हमें यह समझना होगा कि पर्यावरण को सम्मान देकर ही हम पृथ्वी की रक्षा कर पाएंगे।
पिछले दिनों इंटरनैशनल यूनियन फॉर द कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आई.यू.सी.एन.) द्वारा जारी रिपोर्ट में बताया गया था कि गरीब देशों में जलवायु परिवर्तन को रोकने में सरकारें विफल हो रही हैं। इसके कारण संसाधन बर्बाद हो रहे हैं। इसका असर बढ़ती हुई लैंगिक असमानता के रूप में दिखाई दे रहा है। जलवायु परिवर्तन से जूझ रहे इलाकों में संसाधनों पर काबिज होने के लिए वर्ग संघर्ष जारी है। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि इस दौर में कई तौर-तरीकों से समाज पर जलवायु परिवर्तन का असर पड़ रहा है। मौसम का समस्त चक्र अनियमित हो गया है। सम्पन्न लोग ए.सी. में बैठकर पर्यावरण पर भाषण दे रहे हैं। प्रकृति और पर्यावरण को लेकर बड़ी-बड़ी बातें हो रही हैं लेकिन पर्यावरण बचाने के लिए जमीन पर काम नहीं हो रहा। यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि हम अभी तक भी प्रकृति का महत्व नहीं समझ पाए हैं।
धरती को सौन्दर्य प्रदान करने में प्रकृति ने अतुलनीय योगदान दिया है। पेड़-पौधे, फूल-पत्तियां, झरने और पहाड़ धरती के आभूषण ही हैं। कल्पना कीजिए कि इन आभूषणों से रहित धरती हमें कैसी दिखाई देगी। यह हम सबका कत्र्तव्य है कि हम धरती के इन आभूषणों की चमक फीकी न पडऩे दें। जब धरती के इन आभूषणों की चमक फीकी पड़ती है तो धरती का ताप बढऩे लगता है। धरती सुन्दर रहेगी तो हमारा जीवन भी सुन्दर रहेगा। कभी हम प्रकृति के विभिन्न अवयवों का क्षरण कर प्रदूषण बढ़ाते हैं तो कभी जलवायु परिवर्तन के लिए स्वयं जिम्मेदार होते हुए भी प्रकृति को कोसते हैं। यह दुखद ही है कि कभी धरती का बढ़ता हुआ तापमान पर्यावरण को जख्म दे रहा है, तो कभी हमारा व्यवहार पर्यावरण के जख्मों को कुरेदता है। कुल मिलाकर हम उसी प्रकृति से बेवफाई कर रहे हैं, जो हमें हमेशा वफा की सीख देती है। विभिन्न अध्ययनों के माध्यम से यह बात सामने आ रही है कि प्रदूषण और धरती का तापमान बढऩे के कारण सम्पूर्ण विश्व को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ेगा, जिनमें सूखा, बाढ़, ग्लेशियरों का पिघलना, समुद्र का स्तर बढऩा, अनेक जीव-जन्तुओं और पेड़-पौधों का विलुप्त होना आदि शामिल हैं।
प्रकृति मानसिक तनाव दूर करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। कई बार चिकित्सक भी मानसिक तनाव दूर करने के लिए हमें प्रकृति के बीच रहने की सलाह देते हैं। यह दुखद ही है कि प्रकृति जो शान्ति हमें प्रदान करना चाहती है, हम अपने व्यवहार से उस शान्ति को भंग कर देना चाहते हैं। मानसिक तनाव का एक बड़ा कारण यह भी है कि इस दौर में हम लगातार प्रकृति से दूर होकर यांत्रिक होते जा रहे हैं। प्रकृति से दूर होना हमें भावनात्मक स्तर पर भी कमजोर कर रहा है। महानगरों में निवास करने वाले लोग तो कई-कई दिनों तक प्रकृति के दर्शन ही नहीं कर पाते। ऐसी स्थिति में शरीर के अन्दर पहुंची प्रदूषित वायु जीवन की लय बिगाड़ देती है। जीवन की इस लय को सुधारने के लिए हम प्रकृति के सान्निध्य में समय बिताना चाहते हैं। जब हम चारों तरफ से हार मान जाते हैं तो प्रकृति ही हमें आशा की किरण दिखाकर एक नई ऊर्जा देती है। प्रकृति का स्नेहिल और शीतल स्पर्श हमें अवसाद के गहन अन्धकार से बाहर निकालने में सहायता प्रदान करता है।
दरअसल हमने आज तक पर्यावरण का ध्यान इसलिए नहीं रखा क्योंकि हम प्रकृति से प्यार का रिश्ता नहीं जोड़ पाए। आज पर्यावरण को बचाने के लिए विभिन्न कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं लेकिन प्रकृति के जख्म बढ़ते ही जा रहे हैं। ये कार्यक्रम केवल कुछ लोगों की जेब भर रहे हैं। यही कारण है कि आज प्रकृति को बचाने के लिए हल्ला तो मच रहा है लेकिन उससे प्यार का रिश्ता कायम नहीं हो पा रहा। इस दौर में हमें पर्यावरण का महत्व समझना होगा, तभी हम पृथ्वी के ताप को कम कर सकते हैं।-रोहित कौशिक