उनका लिखा हुआ आज भी सच है

Edited By Updated: 09 Sep, 2026 03:07 AM

what he wrote is still true today

पंजाब केसरी ग्रुप के संस्थापक पूज्य पिता लाला जगत नारायण जी को हमसे बिछुड़े हुए आज 45 वर्ष हो गए हैं। वह सशरीर हमारे बीच उपस्थित नहीं लेकिन आज भी उनका आशीर्वाद हम पर बना हुआ है।

पंजाब केसरी ग्रुप के संस्थापक पूज्य पिता लाला जगत नारायण जी को हमसे बिछुड़े हुए आज 45 वर्ष हो गए हैं। वह सशरीर हमारे बीच उपस्थित नहीं लेकिन आज भी उनका आशीर्वाद हम पर बना हुआ है। पूज्य पिता जी राजनीति के साथ-साथ सामाजिक समस्याओं के प्रति भी समान रूप से चिंतित रहते थे और ऐसे विषयों पर अक्सर लिखा करते थे। यहां हम उनका लिखा हुआ पंजाब केसरी के 29 जुलाई, 1978 के अंक में प्रकाशित लेख सशीर्षक ‘वृद्धाश्रम बनाएं’ हू-ब-हू प्रकाशित कर रहे हैं :

वृद्धाश्रम बनाएं 
एमरजैंसी में जेल जाने से बहुत पहले मैंने एक लम्बी लेखमाला ‘जीवन की संध्या’ के शीर्षक से लिखी थी जिसे पढ़कर हमारे पास बुजुर्गों के पत्रों की एक बाढ़ सी आ गई थी जिनमें अधिकांश ने लिखा था कि उन बुजुर्गों की देखभाल के लिए जिनका कोई सहारा नहीं है या जिनके बच्चे उनकी ओर उनके अंतिम जीवन में ध्यान नहीं देते, वृद्धाश्रम खोले जाने चाहिएं। ऐसे असंख्य भाई-बहनें हमारे दफ्तर में आ जाते हैं और कहते हैं ‘‘लाला जी इस बुढ़ापे में हमारे दिन कुछ आराम से कट सकें, कृपा करके ऐसा प्रबंध कर दीजिए क्योंकि जिन बच्चों के लिए जीवन भर हम अच्छी और बुरी कमाई करते रहे अब उन्होंने ही धक्के देकर हमें घर से निकाल दिया है।’’ इसी कारण मैं प्राय: अपने भाषणों में इस बात पर बल दिया करता हूं कि लोग अपने शहर या कस्बे में वृद्धाश्रम बनवाने पर अवश्य ध्यान दें और इसे सामाजिक भलाई का आवश्यक अंग समझ कर पूरा करने का प्रयत्न करें।

गत दिनों मुझे रोटरी क्लब जालंधर में पिंगलवाड़े के मानसिक रोगियों को कुछ सामान देने के लिए आयोजित समारोह में जाने का अवसर मिला। वहां मैंने क्लब के पदाधिकारियों से अनुरोध किया कि वे एक पुण्य का काम  और करें तथा जालंधर में एक वृद्धाश्रम के निर्माण का बीड़ा उठाएं। मैंने उनको एक किस्सा सुनाया कि किस प्रकार मेरे एक साथी जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए जेलें भुगतीं और अपना तमाम कारोबार समाप्त कर दिया, आज बुढ़ापे में मेरे पास रोते हुए आए। जब मैंने उनको चुप कराया तो कहने लगे,‘‘या तो मुझे किसी वृद्धाश्रम में भर्ती करा दें या अपने पास ही कोई कमरा दे दें ताकि मैं अपना शेष जीवन कुछ चैन से बिता सकूं।’’ मैंने उनसे कहा, ‘‘आपका अपना मकान है। आप अपने लड़कों और लड़कियों की शादियां कर चुके हैं। सरकार ने आपको हिसार में जमीन अलाट की। इससे भी आपको दो-अढ़ाई सौ रुपया मासिक आय होती होगी। इन परिस्थितियों में आपको वृद्धाश्रम में जाने की क्या आवश्यकता है?’’

उन्होंने भरे हुए गले से बताया, ‘‘सारे पैसे बाल-बच्चे मुझसे मारपीट कर छीन लेते हैं। दो समय की रोटी भी बड़ी मुश्किल से खिलाते हैं और वह भी सबके अंत में बची-खुची रोटी होती है।’’ मैं विदेशों में घूम कर आया हूं। वहां सरकार ने बुजुर्गों के लिए वृद्धाश्रम बनाए हुए हैं। बूढ़े नर-नारियों को जो पैंशन मिलती है उसका कुछ अंश वे वृद्धाश्रम को दे देते हैं ताकि जीवन आराम से व्यतीत हो सके परंतु पश्चिमी देशों में हमारे देश की तरह संयुक्त परिवार की प्रथा नहीं है। वहां सोलह और अठारह वर्ष की आयु में ही बच्चे मां-बाप से अलग हो जाते हैं और कभी-कभार महीने-दो महीने में उनसे मिलने चले जाते हैं। पश्चिम की सभ्यता अब हमारे घरों में भी आने लगी है। हजारों वर्ष से भारत वर्ष में जो संयुक्त परिवार की प्रथा चल रही थी, बिखरने लगी है। आज से 60 साल पहले सारे परिवार में बुजुर्गों का न केवल आदर और मान होता था बल्कि परिवार के तमाम लोग उनकी बात पर अमल करते थे। किसी की मजाल नहीं होती थी कि उनकी बात को टाल सके परंतु आज स्थितियां ही भिन्न हो गई हैं। बच्चे मां-बाप के हाथों से निकलते जा रहे हैं।

केवल कुछ ही परिवारों में पुरानी परम्परा कायम है। यदि पुरानी परम्परा फिर से बहाल हो जाए तो वृद्धाश्रमों की आवश्यकता ही नहीं रहती परंतु स्थितियां इतनी बिगड़ चुकी हैं कि अब इन आश्रमों के बगैर काम नहीं चल सकता। अत: यदि हम बुजुर्गों और बूढ़ों के जीवन के अंतिम पड़ाव में उन्हें कोई सुख देना चाहते हैं तो हमें ऐसे आश्रम हर जिले और बड़े कस्बे में कायम करने चाहिएं।—जगत नारायण 
देश में आज भी बड़ी संख्या में वृद्ध माता-पिता अपनी संतानों की उपेक्षा व दुव्र्यवहार के शिकार होने के कारण वृद्धाश्रमों आदि में रहने के लिए विवश हैं। पूज्य लाला जी ने आज से 48 वर्ष पूर्व जो लिखा था, वह आज भी सच है। सिर्फ समय और पात्र बदले हैं, हालात वही हैं।—विजय कुमार

Related Story

    Trending Topics

    img title
    img title

    Be on the top of everything happening around the world.

    Try Premium Service.

    Subscribe Now!