क्या आपके इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जल्दी खराब हो रहे हैं? जानिए कंपनियों की रणनीति

Edited By Updated: 06 Nov, 2026 04:29 PM

are your electronic devices breaking down quickly

लैपटॉप और स्मार्टवॉच जैसे आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण कई तरह की दुर्लभ सामग्रियों, जहरीले पदार्थों और ज्वलनशील बैटरियों से बनाए जाते हैं। इनमें पारा और आर्सेनिक जैसे खतरनाक रसायन भी शामिल हो सकते हैं।

सिडनी : क्या आपका नया फोन अभी से धीमा चलने लगा है या महंगे 'ईयरफोन' ठीक से काम नहीं कर रहे हैं? यह महज आपका वहम नहीं है। अब कंपनियां ऐसे उत्पाद नहीं बना रहीं, जो लंबे समय तक चलें। कुछ उत्पाद तो कुछ ही साल में, बल्कि कई बार इससे भी पहले खराब हो जाते हैं और आखिरकार कचरे के ढेर में पहुंच जाते हैं। किसी उत्पाद को जानबूझकर इस तरह तैयार करना कि वह तय समय से पहले ही बेकार हो जाए, 'प्लान्ड ऑब्सोलेसेंस' (नियोजित अप्रचलन) कहलाता है। मेरे नए अध्ययन में इस अवधारणा को विस्तार से समझने की कोशिश की गई है। इसमें बताया गया है कि मौजूदा कानूनों को मजबूत करके ऐसे उत्पाद तैयार करना संभव है, जो लंबे समय तक चलें। इससे न केवल उपभोक्ताओं का खर्च घटेगा, बल्कि पर्यावरण को भी नुकसान कम पहुंचेगा। 

ई-कचरे का बढ़ता पहाड़ :
लैपटॉप और स्मार्टवॉच जैसे आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण कई तरह की दुर्लभ सामग्रियों, जहरीले पदार्थों और ज्वलनशील बैटरियों से बनाए जाते हैं। इनमें पारा और आर्सेनिक जैसे खतरनाक रसायन भी शामिल हो सकते हैं। ये पदार्थ पर्यावरण में पहुंचकर मिट्टी और जलस्रोतों को प्रदूषित कर सकते हैं। यह जानने के बाद खराब हो चुके इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को सीधे फेंकने से पहले हमें दो बार सोचना चाहिए। इसके बावजूद ऑस्ट्रेलिया में प्रति व्यक्ति इलेक्ट्रॉनिक कचरे का उत्पादन वैश्विक औसत से लगभग तीन गुना है। दुनिया भर में 2022 तक 6.2 करोड़ टन ई-कचरा पैदा हो चुका था। इतनी बड़ी मात्रा में कचरे से 10 लाख से अधिक ट्रक भरे जा सकते हैं। इन ट्रकों को एक कतार में खड़ा किया जाए, तो वे पृथ्वी की भूमध्य रेखा का एक पूरा चक्कर लगाने के लिए पर्याप्त होंगे।

अनुमान है कि दुनिया में ई-कचरे की मात्रा 2030 तक 32 प्रतिशत और बढ़कर 8.2 करोड़ टन हो जाएगी। क्या उत्पादों को जानबूझकर जल्दी खराब होने लायक बनाया जा रहा है? 'प्लान्ड ऑब्सोलेसेंस' उन तरीकों में से एक है, जिनके जरिए तकनीकी कंपनियां लोगों को लगातार नई चीजें खरीदने के चक्र में बनाए रखती हैं। जब कोई नया उपकरण जल्द ही खराब हो जाता है, तो उपभोक्ता के पास अक्सर नया उपकरण खरीदने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। हालांकि, किसी उत्पाद का जीवनकाल जानबूझकर कम रखने की इस रणनीति के कई पहलू हैं। सबसे पहले, कंपनियां ऐसे उत्पाद तैयार कर सकती हैं, जिनका डिजाइन ही टिकाऊ न हो। उदाहरण के लिए, वायरलेस ईयरफोन की बैटरी जल्दी खराब हो सकती है। इनके डिजाइन में बैटरी बदलना इतना मुश्किल हो सकता है कि एक बार चार्जिंग क्षमता खत्म होने के बाद ये ईयरफोन लगभग इस्तेमाल के लायक नहीं रहते। ऐसे में ये 'डिस्पोजेबल गैजेट' यानी इस्तेमाल के बाद फेंक दिए जाने वाले उपकरण बन जाते हैं। 

इसके अलावा, निर्माता अपने उत्पादों की मरम्मत को भी मुश्किल बना सकते हैं। मसलन, किसी उपकरण के अलग-अलग हिस्सों को इस तरह चिपका दिया जाता है कि उसे खोलकर उसकी मरम्मत करना संभव न हो। इतना ही नहीं, कुछ कंपनियां मरम्मत करने वालों के लिए 'अधिकृत' होना जरूरी कर देती हैं। इसके बिना उन्हें किसी खास उत्पाद की मरम्मत के लिए जरूरी पुर्जे, सॉफ्टवेयर लॉक खोलने की सुविधा या तकनीकी जानकारी नहीं मिलती। कोई व्यक्ति अपने उपकरण को खुद ठीक करने की कोशिश भी करे, तो उसके सामने दूसरी बाधाएं आ सकती हैं। मरम्मत से जुड़ी 'गाइड' और 'मैनुअल' कॉपीराइट के दायरे में हो सकते हैं। ऐसे में निर्माता दूसरे लोगों या कंपनियों को इन्हें ऑनलाइन साझा करने से रोक सकते हैं। 'प्लान्ड ऑब्सोलेसेंस' का एक पहलू उपभोक्ताओं के व्यवहार से भी जुड़ा है। तकनीकी कंपनियां नियमित रूप से अपने उत्पादों के नए मॉडल पेश करती रहती हैं, जिससे मौजूदा उपकरण जल्द ही पुराने और चलन से बाहर लगने लगते हैं। इसे 'साइकोलॉजिकल ऑब्सोलेसेंस' यानी मनोवैज्ञानिक रूप से किसी उत्पाद को पुराना महसूस कराने की रणनीति कहा जाता है।

कंपनियां विज्ञापनों के जरिए लोगों को नए उत्पाद खरीदने के लिए प्रेरित करती हैं और नए उपकरणों को सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़कर पेश करती हैं। उदाहरण के लिए, स्मार्टफोन के साथ ऐसे सामान बेचे जाते हैं, जो केवल फोन की 'नई पीढ़ी' के मॉडल के साथ ही काम करते हैं। इससे उपभोक्ताओं को नया फोन खरीदने के लिए प्रोत्साहन मिलता है। यह सिर्फ कंपनियों की समस्या नहीं, पूरी व्यवस्था से जुड़ा मामला है : आमतौर पर 'प्लान्ड ऑब्सोलेसेंस' को कंपनियों की कारोबारी रणनीति के तौर पर देखा जाता है। यूरोप में उपभोक्ता संगठनों ने जापान की प्रसिद्ध वीडियो गेम कंपनी निनटेंडो के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। उनका आरोप था कि कंपनी के निनटेंडो स्विच गेमिंग कंसोल के कंट्रोलर बहुत जल्दी खराब हो रहे थे और ठीक से काम करना बंद कर देते थे। यूरोपीय आयोग और अन्य प्राधिकरणों के हस्तक्षेप के बाद कंपनी ने प्रभावित उपभोक्ताओं को मुफ्त मरम्मत की सुविधा देने पर सहमति जताई। ऑस्ट्रेलिया में संघीय अदालत ने एप्पल को 90 लाख ऑस्ट्रेलियाई डॉलर का जुर्माना भरने का आदेश दिया था। मामला उन आईफोन उपयोगकर्ताओं से जुड़ा था, जिनके फोन में सॉफ्टवेयर की खराबी आई थी। 

अदालत के मुताबिक, एप्पल ने इन उपभोक्ताओं को ऑस्ट्रेलियाई उपभोक्ता कानून के तहत अपने फोन की मरम्मत या उसे बदलवाने के अधिकारों के बारे में गलत या भ्रामक जानकारी दी थी। ये अधिकार सिर्फ इसलिए खत्म नहीं हो जाते कि किसी उपभोक्ता ने अपने फोन की मरम्मत किसी तीसरे पक्ष से कराई है। हालांकि, 'प्लान्ड ऑब्सोलेसेंस' के लिए किसी एक व्यक्ति या कंपनी को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा। दरअसल, यह हमारी मौजूदा उत्पादन और उपभोग व्यवस्था का नतीजा है। इस जटिल समस्या से निपटने के लिए कई क्षेत्रों में बदलाव और हस्तक्षेप की जरूरत होगी। इसमें उपभोक्ताओं के व्यवहार को भी ध्यान में रखना होगा। आखिरकार, यह उपभोक्ता ही तय करता है कि खराब हो चुके उत्पाद को मरम्मत की दुकान पर ले जाना है, घर की किसी दराज में रख देना है या सीधे कूड़ेदान में फेंक देना है। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता कि उपभोक्ता सोच-समझकर यह फैसला कर सके।

उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति मरम्मत का खर्च नहीं उठा पाने के कारण अपना पुराना उत्पाद बदलने के लिए मजबूर हो सकता है। इस समस्या से निपटने के लिए क्या किया जा सकता है? यह सुनिश्चित करने के लिए मजबूत कानून जरूरी हैं कि उत्पाद लंबे समय तक चलें। हालांकि, कानूनों में बदलाव करना आसान नहीं है। इसके अलावा, कानून बनाने वाले अक्सर 'प्लान्ड ऑब्सोलेसेंस' के सभी पहलुओं को ध्यान में नहीं रख पाते। उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलिया में पहली बार लागू किए गए 'राइट टू रिपेयर' यानी मरम्मत के अधिकार से जुड़े कानून को ही लें। इसका मकसद लोगों के लिए अपने वाहनों की मरम्मत आसान और कम खर्चीली बनाना है। इससे वाहन मालिकों को फायदा हुआ है, क्योंकि पहले उन्हें मरम्मत के लिए अधिकृत डीलरशिप पर ही निर्भर रहना पड़ता था। यूरोपीय संघ ने इस दिशा में कुछ प्रगति की है। वहां नए नियमों का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि यूरोपीय संघ के बाजार में बिकने वाले सभी उत्पादों का डिजाइन ही टिकाऊ हो। इसके अलावा, उसने मरम्मत के अधिकार से जुड़ा कानून भी लागू किया है। इसके तहत मोबाइल फोन और वॉशिंग मशीन जैसे कुछ इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए मरम्मत संबंधी कड़े नियम बनाए गए हैं। हम जानते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक उपकरण हमेशा नहीं चलते। लेकिन समस्या यह है कि आज वे अक्सर कुछ ही साल या कई बार कुछ महीनों में खराब हो जाते हैं। ऐसे में उपभोक्ताओं के पास उन्हें फेंककर नया उत्पाद खरीदने के अलावा बहुत कम विकल्प बचते हैं। अब समय आ गया है कि 'प्लान्ड ऑब्सोलेसेंस' पर लगाम लगाने के लिए कानूनों को और सख्त किया जाए। इससे न केवल लोगों की जेब पर पड़ने वाला बोझ कम होगा, बल्कि धरती को भी राहत मिलेगी। 

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