Edited By ,Updated: 22 Mar, 2026 05:26 AM

अनेक वर्ष बीत गए, परन्तु यह घटना सत्य है। एक राज्य के बड़े मंत्री थे, बड़ी ऊंचाई तक पहुंचे, शायद सबसे महंगी गाड़ी में आते थे। उनको नमस्ते करें तो वह समझते थे कोई छोटा-मोटा उनकी ऊंचाई से प्रभावित है, बस गर्दन हिला देते थे जवाब में। जब मैं सांसद था,...
अनेक वर्ष बीत गए, परन्तु यह घटना सत्य है। एक राज्य के बड़े मंत्री थे, बड़ी ऊंचाई तक पहुंचे, शायद सबसे महंगी गाड़ी में आते थे। उनको नमस्ते करें तो वह समझते थे कोई छोटा-मोटा उनकी ऊंचाई से प्रभावित है, बस गर्दन हिला देते थे जवाब में। जब मैं सांसद था, तब उनके व्यवहार को देखकर मैंने एक दिन एक समारोह में पीछे से नाम पुकारा और एक ही वाक्य कहा-जनाब इतना अहंकार लेकर कहां जाओगे? वह इस बार गर्दन हिलाना भूल गए, स्वयं ही मुड़ गए और मेरी तरफ देखकर बोले, क्या-क्या? मैं सिर्फ मुस्कुराया और मंच पर अपनी सीट पर बैठ गया।
नेताओं का अहंकार एक हास्यास्पद व्यवहार होता है। जब सत्ता जाती है तब ऐसों के द्वार पशु भी नहीं आते। लेकिन जो अपनी विनम्रता से सबके बन जाते हैं, उनके लिए सत्ता का आना-जाना कोई अर्थ नहीं रखता। तरनजीत सिंह संधू वाशिंगटन में हमारे राजदूत थे, अनेक बार वहां मिलना हुआ। वह मुझे कई बार वहां के प्रसिद्ध भारतीय रेस्तरां रसिका में ले गए। फिर अमृतसर से चुनाव लड़ा और अब दिल्ली के उपराज्यपाल बने हैं। मुझे लगा वह इतने साल की मुलाकातें भूल गए होंगे, पर उन्होंने याद रखा। मुझे बुलाया और शपथ समारोह में बड़े-बड़े मंत्रियों की भीड़ में मुझे पुकार कर अभिवादन किया, यह व्यवहार पंजाब के अधिकांश नेताओं के व्यवहार से बिल्कुल भिन्न है। रोपड़ की एक भोग अरदास की रस्म, जो किसी के दिवंगत होने के बाद आयोजित होती है, इस विषय में आंखें भिगोने वाली है।
नगरपालिका पार्षद का पद राजनीति में क्या मायने रखता है? अति सामान्य कहेंगे। लोग यहां से प्रधान और विधायक या सांसद की सीढ़ी चढ़ते हैं। यहां से एक पार्षद पम्मी सोनी थे, युवा और दबंग। उनका 60 साल की आयु में अचानक निधन हो गया तो शहर के मानो हर घर में शोक फैल गया। गुरुद्वारा टिब्बी साहिब में भोग अरदास की रस्म हुई तो हजारों लोग आए। यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ। न विधायक, न सांसद, न मंत्री, फिर भी लोग इतने दुखी क्यों हुए? एक ही कारण था-पम्मी सोनी का व्यवहार। हंसते हुए गया और जग को रुला गया। उसने कभी किसी का साथ न छोड़ा, सबके सुख-दुख में रल-मिलकर शामिल हुआ, जैसे कोई अपने घर में बिजली-पानी की दिक्कत से लेकर कालेज एडमिशन और गाड़ी खरीदने या किसी के सताने पर अपने भाई, पिता के पास आता है, कि वे कोई मदद करेंगे, ऐसे ही शहर के लोग उसके पास आ जाते थे, समय-असमय देखे बिना आवाज लगाते, घंटी बजाते और पम्मी सोनी तैयार उनके साथ चल पड़ते। भोग अरदास के समय गुरुद्वारे में आए एक अनजान आगंतुक से मैंने कहा, ए भाई जी, जाना तो सबको एक दिन है लेकिन जाओ तो ऐसे जाओ कि राजे-महाराजे जैसे बड़े धनीमानी भी आश्चर्यचकित रह जाएं। ऐसी मृत्यु विरले ही लोगों को मिलती है, वरना बड़े-बड़े अमीरों को उनकी मृत्यु के बाद घरवाले भी याद नहीं करते।
ऐसे वातावरण में जब कोई बड़ा नेता 20 रुपए देता है और 20000 उसके प्रचार पर खर्च कर देता है, रहीम खान याद आते हैं। अकबर को प्रशिक्षित कर बड़ा करने वाले बैरम खान के बेटे थे। ब्रज भाषा के बड़े कवि और बहुत प्रसिद्ध दानदाता। लेकिन वह जिसको दान देते थे, उसका चेहरा नहीं देखते थे। उनसे लोगों ने पूछा-ऐसा क्यों? इस पर एक दोहा भी है, जो कुछ लोग बाबा तुलसी का लिखा बताते हैं-‘ऐसी देनी देंन ज्यूं, कित सीखे हो सैन, ज्यों-ज्यों कर ऊंच्यो करो, त्यों-त्यों निचे नैन।’
यानी आपने ऐसा व्यवहार कहां से सीखा है कि जैसे-जैसे अपना देने वाला हाथ ऊंचा करते हैं, वैसे-वैसे आपके नयन नीचे देखने लगते हैं। लेने वाले से नजरें हटा कर। इस पर रहीम खान ने जवाब दिया :
‘देनहार कोई और है, देवत है दिन रैन,
लोग भरम हम पर करें, तासो नीचे नैन।’
अर्थात देने वाला तो कोई और है, यानी भगवान, जो दिन-रात देता है। लोगों को मुझ पर भ्रम हो जाता है, मानो मैं दे रहा हूं। इस कारण संकोच से नयन नीचे हो जाते हैं। विनम्रता ओढ़ी नहीं जा सकती, यह स्वभाव का हिस्सा होती है। नकली विनम्रता पहचानी जाती है। देश के अफसरों को, नेताओं को, उनके पूर्वजों के आशीर्वाद से बड़े पद मिलते हैं लेकिन सामान्यत: उनके व्यवहार के कण-कण में अहंकार टपकता है, लाल बत्तियां, हूटर के शोर, घर या दफ्तर में सामान्यजन के जाने पर तिरस्कार, दफ्तरों में छोटे-छोटे काम के लिए धक्के खाना, छोटे-छोटे नेताओं, अफसरों के करोड़ों रुपए के माल, सिनेप्लैक्स और 2-2 करोड़ की गाडिय़ां, उन सबका नकली सुख एक तरफ और रहीम खान का विनम्र स्वभाव उन सब पर भारी होता है। रहीम खान या बाबा तुलसी या दीनदयाल उपाध्याय इसलिए नहीं माने-जाने गए कि उनके पास अथाह ऐश्वर्य था, वे सिर्फ इसलिए सम्मानित हुए, अमर हो गए क्योंकि उनके व्यवहार में अहंकार नहीं था। वे सरल थे। रहीम खान उस समय के अत्यंत धनाढ्य थे, फिर भी निरहंकारी थे।
पैसे का, पद का अहंकार होता है, लेकिन उसका अपना मूल्य चुकाना पड़ता है। जो लोग भीड़ भरी सड़कों पर हूटर मारते हुए काले शीशे की गाडिय़ों में टेढ़ी गर्दन से निकलते हैं, वे सोच नहीं पाते कि सड़क पर पैदल चल रहे नागरिक उनसे कितनी नफरत करते हैं। लेकिन जो सामान्य पद पर रहते हुए भी असामान्य विनम्रता के व्यवहार से अपनी पहचान बना लेते हैं, उनके लिए संसार पलक पांवड़े बिछाता है, उनके जाने पर अश्रु बहाता है। इसी को अमरता कहते हैं। गुरुओं की धरती पर चारों तरफ सत्ता का अहंकारी कामकाज, व्यापार देखकर पम्मी सोनी की अरदास की रस्म के सबक सबको सुनने समझने की जरूरत है।-तरुण विजय