मोदी व नेता प्रतिपक्ष के बीच टकराव का साल

Edited By Updated: 01 Jan, 2026 05:17 AM

a year of confrontation between modi and the leader of the opposition

भले ही कोई जीते लेकिन 2026  टकराव का साल रहने वाला है। यह टक्कर प्रधानमंत्री मोदी और नेता प्रतिपक्ष के बीच देखने को मिलेगी। दरअसल 2024 के लोकसभा चुनावों के नतीजों के साथ ही टकराव का जो दौर शुरू हुआ था, वह अब भारतीय राजनीति में एक सिलसिला बनता जा रहा...

भले ही कोई जीते लेकिन 2026  टकराव का साल रहने वाला है। यह टक्कर प्रधानमंत्री मोदी और नेता प्रतिपक्ष के बीच देखने को मिलेगी। दरअसल 2024 के लोकसभा चुनावों के नतीजों के साथ ही टकराव का जो दौर शुरू हुआ था, वह अब भारतीय राजनीति में एक सिलसिला बनता जा रहा है। राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक मोर्चे पर मोदी सरकार की अग्निपरीक्षा होनी है, तो राहुल गांधी के लिए अपनी कांग्रेस पार्टी को संभालना चुनौतीपूर्ण साबित होने वाला है। 2026 में राहुल गांधी जन आंदोलन की सियासत करते दिख सकते हैं। इसमें ‘जेन जी’ की भूमिका से भी इंकार नहीं किया जा सकता। मोदी इसका तोड़ निकालने के लिए सालाना बजट में आॢथक सुधार को गति प्रदान कर सकते हैं। अमरीका से व्यापारिक समझौते पर सबकी नजरें होंगी। 

असम, बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुड्डुचेरी में विधानसभा चुनाव होने हैं। भाजपा के नजरिए से देखा जाए तो उसे असम में फिर से जीतना है। केरल और तमिलनाडु में वह न तीन में है और न तेरह में। बंगाल में भाजपा अगर जीती तो चमत्कार होगा और विपक्ष की राजनीति को सदमा लगेगा। लेकिन अगर भाजपा 100 सीट पार करती है तो भी पीठ थपथपाने की अधिकारी होगी।  उधर कांग्रेस को हर कीमत पर केरल में तो जीत हासिल करनी ही होगी। केरल के वायनाड से ही प्रियंका गांधी सांसद हैं और केरल की जीत प्रियंका गांधी के खाते में ही जाएगी। असम में कांग्रेस दुविधा में है कि उसे बदरुद्दीन अजमल के साथ जाना चाहिए या नहीं। पिछली बार कांग्रेस को भाजपा से सिर्फ 5 लाख वोट कम मिले थे। वैसे कांग्रेस एक चुनाव हाथ मिलाकर हार चुकी है और एक चुनाव अकेले लड़ कर भी हार चुकी है। कुल मिलाकर देखा जाए तो विधानसभा चुनावों में बहुत भारी उलटफेर होता दिख नहीं रहा है।

राहुल गांधी लेकिन गांव-गांव, पांव-पांव कार्यक्रम में भारत जोड़ो यात्रा का अक्स देख रहे हैं। मनरेगा का नाम बदल कर जी राम जी करने के खिलाफ 5 जनवरी से गांवों में धरने-प्रदर्शन का सिलसिला कांग्रेस शुरू करने जा रही है। राहुल गांधी को लगता है कि ग्रामीण जनता के सहयोग से इसे जन आंदोलन का रूप दिया जा सकता है और दिल्ली के किसान आंदोलन को दोहराया जा सकता है। अगर किसान वर्ग कांग्रेस के साथ जुड़ गया और विपक्ष ने भी अपना पूरा जोर लगाया तो सियासी खेल में नया रोमांच पैदा हो सकता है। शहरों का युवा और मध्यम वर्ग वैसे ही घटती बचत, बेरोजगारी आदि से परेशान है। यह वर्ग 2024 के लोकसभा चुनावों में अपना गुस्सा सामने ला भी चुका है। राजनीतिक मोर्चे को तो मोदी-अमित शाह की जोड़ी संभाल लेगी, पर आॢथक मोर्चा आंकड़ों के आधार पर फतह नहीं किया जा सकता। जिस देश में विकास दर 8.2 फीसदी हो, उस देश में डालर के मुकाबले रुपया इतना कमजोर क्यों है? उस देश में विदेशी पूंजी निवेश ठहर सा क्यों गया है? उस देश में जी.एस.टी. कलैक्शन स्थिर क्यों होता जा रहा है। उस देश में नौकरियों के मौके बढ़ क्यों नहीं रहे? उस देश में पूंजीपति बैंक में 5 से 6 लाख करोड़ रुपए क्यों रखे हुए हैं, नया उद्योग क्यों  नहीं खोल रहे? इन सवालों के जवाब देश चाहता है लेकिन चुप्पी है। क्या यह बताया जाएगा कि ट्रम्प के साथ व्यापार की डील कहां अटकी हुई है और कब तक हस्ताक्षर होने की उम्मीद है? 

इन सवालों के जवाब मिल जाएं तो कार्पोरेट जगत भी तय कर पाएगा कि उसे कितना पैसा लगाना है, कहां लगाना है। चीन से आयात खतरनाक स्तर तक बढ़ता जा रहा है। भारतीय उद्योगपति पूछ रहे हैं कि आखिर कौन सा उद्योग खोलें जो चीन में नहीं हो। श्रम कानून, बीमा को पूरी तरह से खोलना, परमाणु ऊर्जा में निजी क्षेत्र की अनुमति आॢथक सुधारों की तरफ गंभीर इशारा कर रहे हैं लेकिन भारतीय उद्योग जगत का आत्मविश्वास अभी डगमगाया हुआ है। आर्थिक मोर्चा कहीं न कहीं देश के सामाजिक धार्मिक ताने-बाने से, कानून व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। इस बार क्रिसमस के मौके पर देश के आधा दर्जन राज्यों में करीब 2 दर्जन घटनाएं हुई हैं जो नहीं होनी चाहिए थीं। दुनिया के 200 देशों में से करीब 120 देश ईसाई धर्म को मानते हैं। इनमें से बड़ी संख्या में अमीर लोकतांत्रिक देश हैं। अगर माहौल ऐसा विषैला रहेगा तो कौन पूंजी लगाने आएगा? कौन कूटनीतिक मोर्चे पर भारत के साथ खड़ा नजर आएगा? मुस्लिम बहुल दुनिया में 50 देश हैं जिनकी नाराजगी भारी पड़ सकती है। अगर हर नीति-रणनीति चुनाव को मद्देनजर रख कर बनेगी तो बुनियादी मुद्दों का क्या होगा?

कांग्रेस कमजोर है, विपक्ष बिखरा है, संघ बैकफुट पर है, एन.डी.ए. के साथी दल अपने-अपने राज्यों में उलझे हुए हैं, संगठन और सरकार में कोई चुनौती देने वाला नहीं है, लोकप्रियता बरकरार है। यानी सब कुछ मोदी के पक्ष में है। इस मजबूत नींव पर भविष्य की इमारत खड़ी करने का सुनहरा मौका है। हुड़दंगियों पर काबू करना बाएं हाथ का खेल है। संगठन में बदलाव और सरकार में फेरबदल क्या पहला कदम होगा? उसके बाद नए सिरे से मोदी सरकार जनता के बीच दिखेगी, जिसमें नौजवान चेहरे होंगे, नई योजनाएं होंगी और नया कोई नारा होगा। प्रियंका गांधी और मोदी साथ-साथ चाय पी चुके हैं। नए साल में चाय की चुस्कियों का दौर चलता है या चाय के प्याले में तूफान उठता है, देखना दिलचस्प रहेगा।-विजय विद्रोही
 

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