धार्मिक स्वतंत्रता पर अमरीका का ढोंग

Edited By Updated: 31 Mar, 2026 05:26 AM

america s hypocrisy on religious freedom

हाल ही में यू.एस. कमीशन ऑन इंटरनैशनल रिलीजियस फ्रीडम की एक रिपोर्ट आई, जिसमें बताया गया  कि भारत में दिनों-दिन धार्मिक स्वतंत्रता का हनन हो रहा है।  यह भी कहा गया  कि सरकारों द्वारा अल्पसंख्यकों पर हमलों को बढ़ावा दिया जाता है और सरकार एन.जी.ओज के...

हाल ही में यू.एस. कमीशन ऑन इंटरनैशनल रिलीजियस फ्रीडम की एक रिपोर्ट आई, जिसमें बताया गया  कि भारत में दिनों-दिन धार्मिक स्वतंत्रता का हनन हो रहा है।  यह भी कहा गया  कि सरकारों द्वारा अल्पसंख्यकों पर हमलों को बढ़ावा दिया जाता है और सरकार एन.जी.ओज के पीछे पड़ी है। हालांकि सरकार ने सारे आरोपों को निराधार और राजनीति से प्रेरित बताया। यह भी कहा कि अमरीका पहले अपने  गिरेबान में झांके, जहां मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थलों तथा दूसरे धर्मावलम्बियों पर लगातार हमले हो रहे हैं।

दरअसल दुनिया भर में काम करने वाले तमाम एन.जी.ओज ही ऐसी रिपोर्ट्स बनवाने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। इनमें से अधिकांश को विदेशों से धन प्राप्त होता है। इनका कोई न कोई आका ऐसी रिपोर्ट्स बनवाता है। बहुत से पश्चिमी देशों, खासकर अमरीका के बारे में कहा जाता है कि वे ऐसे व्यापारी हैं, जो बिना किसी लाभ के एक डालर खर्च नहीं करते। तो आखिर इन रिपोर्ट्स से अमरीका को क्या लाभ होता है? वह लाभ है, लोगों को तरह-तरह से भड़काना, अस्थिरता पैदा करना। यदि अमरीका के ऐसे करतबों के बारे में जानना हो तो जॉन पर्किंस की बेहद महत्वपूर्ण पुस्तक-‘कन्फैशन ऑफ ऐन इकोनॉमिक हिटमैन’ पढ़ी जा सकती है। पर्किंस खुद इकोनॉमिक हिटमैन रहे हैं। हिटमैन शब्द का इस्तेमाल अक्सर हत्यारों के लिए किया जाता है। ऐसे में इकोनॉमिक हिटमैन का मतलब हर तरह से देश की तबाही करना होता है। जॉन बताते हैं कि यह बनने के लिए कठोर परीक्षा से गुजरना पड़ता है। यदि आप पकड़े जाएं, तो कोई आपकी जिम्मेदारी नहीं लेता। 

अमरीका के लिए काम करने वाले इन लोगों का काम तीन चरणों में होता है। पहले  ये लोगों के सांस्कृतिक और बहुलतावादी संस्कृति के अंतॢवरोधों का लाभ उठाकर, कभी भाषा, कभी धर्म, तो कभी पहनावे आदि को लेकर लोगों को भड़काते हैं। इसके लिए लोगों को बाकायदा आर्थिक मदद दी जाती है। उनकी खबरें अधिक से अधिक प्रसारित कराने के लिए मीडिया मैनेजमैंट किया जाता है और जो भी सरकारें होती हैं, चाहे राज्य सरकारें या केंद्र सरकार, उसके खिलाफ आंदोलन कराए जाते हैं, ताकि सरकारें टूट जाएं। यदि तब भी सफलता न मिले, तो ये और अधिक खतरनाक हो जाते हैं। इन्हें जॉन ने नाम दिया है-जैकाल्स। इनका काम देशों के नेताओं को मरवाने का होता है। किस-किस नेता को इस तरह से मारा गया, इसके उद्धरण पुस्तक में दिए गए हैं। मान लीजिए नेताओं के मरने के बाद भी किसी देश में अस्थिरता नहीं फैलती, तो फिर अंतिम आप्शन होता है, युद्ध का ऐलान, सेना की चढ़ाई। पिछले कुछ दशकों में अमरीका ने जिन-जिन देशों पर युद्ध थोपा है, उनमें इन तीनों बातों को देखा जा सकता है। 

ईरान में भी जब लोगों का आंदोलन हुआ, तो अमरीका ने सोचा कि वहां सरकार टूट जाएगी। नहीं टूटी तो फौरन चढ़ाई करके वहां के सुप्रीम लीडर और अन्य नेताओं को मार दिया। कहने का अर्थ यह कि जिन भी देशों पर अमरीका हमलावर हुआ,  वहां के लोगों की धार्मिक आजादी तो छोडि़ए, जीवन की आजादी तक का सम्मान भी नहीं किया गया। हां, ‘पर उपदेश कुशल जरूर बहुतेरे’ हो सकते हैं। यूं भी अमरीका में आज तक शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति राष्ट्रपति बना है, जो ईसाई धर्म को मानने वाला न हो। राष्ट्रपति वहां बाइबिल पर हाथ रखकर शपथ लेते हैं। अपने यहां तो ऐसी कोई मजबूरी नहीं कि कोई मंत्री या सांसद किस ग्रंथ पर हाथ रख कर शपथ ले। जिसकी जो मर्जी हो, वह वैसा कर सकता है। बराक हुसैन ओबामा अमरीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति थे। जब वह राष्ट्रपति बने, तो उन्हें कहना पड़ा कि वह मुसलमान नहीं ईसाई हैं, क्योंकि वहां के सर्वोच्च पद पर शायद किसी अन्य धर्मावलम्बी के लिए कोई जगह नहीं। 

अमरीकी बात जरूर बना सकते हैं कि उनके यहां ही सबसे अधिक धार्मिक आजादी है, जबकि अपने देश में डा. जाकिर हुसैन, फखरुद्दीन अली अहमद और डा. अब्दुल कलाम राष्ट्रपति बने हैं। ज्ञानी जैल सिंह भी राष्ट्रपति रह चुके हैं। और तो और, अमरीका में आज तक कोई महिला राष्ट्रपति नहीं बन सकी, जबकि भारत में इंदिरा गांधी 1966 में ही प्रधानमंत्री बन गई थीं, प्रतिभा पाटिल राष्ट्रपति रह चुकी हैं तथा द्रौपदी मुर्मू वर्तमान में देश की राष्ट्रपति हैं। 

भारतीय समाज एक तरह से समावेशी समाज है। लेकिन ये पश्चिमी एजैंसीज, जब देखो तब भारत को अपनी तरह-तरह की रिपोर्ट्स के डंडों से पीटती रहती हैं। आखिर यह अधिकार इन्हें दिया किसने? आप कौन होते हैं, हमारे देश के बारे में बोलने वाले? दुनिया के दारोगा हैं क्या? सारी हेकड़ी और दारोगाई ईरान ने निकाल दी है, फिर भी अकड़ रहे हैं। और दिलचस्प यह है कि जब अमरीका ईरान पर टूट पड़ा, तब यह रिपोर्ट आई, क्योंकि भारत ने अमरीका के हमले का कोई समर्थन नहीं किया। करे भी क्यों, हमला तुम करो और हम समर्थन करें? स्पेन और जर्मनी के नेताओं ने ठीक कहा कि हमले से पहले क्या हमसे पूछा था, जो अमरीका का साथ दें? सोचने की बात है कि क्या ईरान के लोगों की कोई धार्मिक स्वतंत्रता नहीं कि आपने ऐन रमजान के दिनों में उन पर हमला बोला और ईद पर भी नहीं रुके?-क्षमा शर्मा
 

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