Edited By ,Updated: 16 Jun, 2026 05:45 AM

चीन में एक शोधकत्र्ता ने 2018 में खुलासा किया था कि उन्होंने 3 जीन-संपादित बच्चे पैदा करने के लिए क्रिसपर (CRISPR) का इस्तेमाल किया था। उनके इस कदम की जीव विज्ञानियों द्वारा लगभग सार्वभौमिक रूप से निंदा की गई थी। मुख्य आपत्ति यह नहीं थी कि...
चीन में एक शोधकत्र्ता ने 2018 में खुलासा किया था कि उन्होंने 3 जीन-संपादित बच्चे पैदा करने के लिए क्रिसपर (CRISPR) का इस्तेमाल किया था। उनके इस कदम की जीव विज्ञानियों द्वारा लगभग सार्वभौमिक रूप से निंदा की गई थी। मुख्य आपत्ति यह नहीं थी कि जीन-संपादित बच्चे पैदा करना अपने आप में गलत है, बल्कि यह थी कि इस्तेमाल की गई क्रिसपर विधि सुरक्षित नहीं थी और इसमें हानिकारक म्यूटेशन (उत्परिवर्तन) होने का बहुत अधिक जोखिम था।
अब, अमरीका में एक टीम ने क्रिसपर के एक उन्नत रूप का उपयोग किया है, जिसे बेस एडिटिंग के रूप में जाना जाता है, ताकि स्वस्थ भ्रूणों को संपादित किया जा सके और दिखाया है कि यह अवांछित म्यूटेशन पैदा किए बिना किया जा सकता है। तो क्या हम अब उस ङ्क्षबदू पर हैं जहां हम इस तकनीक के उपयोग की अनुमति देने पर विचार कर सकते हैं? इसका जवाब है नहीं, क्योंकि एक बड़ी बाधा अभी भी बनी हुई है।
हमारा डी.एन.ए. 2 स्ट्रैंड्स (लडिय़ों) से बना होता है। क्रिसपर का जो पहला रूप विकसित किया गया था, वह कैस9 नामक प्रोटीन का उपयोग करता है, जो गाइड आर.एन.ए. के एक टुकड़े के साथ जुड़ता है, जो इसे जीनोम में एक विशिष्ट स्थान खोजने में मदद करता है। एक बार वहां पहुंचने पर, कैस9 दोनों स्ट्रैंड्स को काट देता है। जब एक कोशिका नुकसान की मुरम्मत करने की कोशिश करती है, तो वह अक्सर गलतियां करती है, जिससे छोटे म्यूटेशन होते हैं जो जीन को अक्षम कर सकते हैं। डी.एन.ए. के कटे हुए सिरे गलत जगहों पर दोबारा जुड़ जाते हैं, जिससे बड़े म्यूटेशन और गुणसूत्र (क्रोमोसोम) संबंधी असामान्यताएं हो जाती हैं। लेकिन क्रिसपर के कई बेहतर रूप विकसित किए गए हैं। उदाहरण के लिए, क्रिसपर बेस एडिटर्स एक सिंगल डी.एन.ए. अक्षर को दूसरे में बदल देते हैं और प्रक्रिया के दौरान डी.एन.ए. का केवल एक ही स्ट्रैंड कटता है। इसलिए बेस एडिटिंग का उपयोग बहुत कम गड़बड़ी की संभावना के साथ सटीक मुरम्मत करने के लिए किया जा सकता है।
लेकिन भ्रूणों को संपादित करना बीमारियों के इलाज से बहुत अलग है। वयस्कों में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि जीन एडिटिंग हर कोशिका में पूरी तरह से काम नहीं करती है। अक्सर बीमारी के इलाज के लिए लिवर की केवल 5वें हिस्से (1/5) की कोशिकाओं को सफलतापूर्वक संपादित करने की आवश्यकता होती है। हालांकि, मानव भ्रूण में, जीन एडिटिंग को पूरी तरह से काम करना पड़ता है, क्योंकि वह भ्रूण शरीर की प्रत्येक कोशिका को जन्म देगा। 2017 में, चीन की एक टीम ने आई.वी.एफ. के दौरान विसंगतियों के कारण फैंके गए मानव भ्रूणों का उपयोग करके एक छोटे से अध्ययन में आशाजनक परिणाम दर्ज किए थे। उन्होंने पाया कि बेस एडिटिंग ने लगभग हर भ्रूण में वांछित बदलाव किए, जिसमें बहुत कम अवांछित बदलाव हुए।
अब, न्यूयॉर्क में कोलंबिया विश्वविद्यालय के डाइटर एगली और उनकी टीम ने माता-पिता द्वारा दान किए गए स्वस्थ दो-कोशिका वाले भ्रूणों का उपयोग करके एक बड़ा अध्ययन किया है, जिसके मोटे तौर पर समान परिणाम मिले हैं। टीम ने 2 बदलाव करने की कोशिश की। एक बदलाव तीन-चौथाई कोशिकाओं में सफलतापूर्वक किया गया, जिसमें कोई अवांछित बदलाव नहीं हुआ। दूसरे बदलाव ने केवल लगभग आधी कोशिकाओं में काम किया और अक्सर अवांछित बदलावों का कारण बना। बेहतर डिजाइन और गाइड आर.एन.ए. के परीक्षण के साथ, उनका कहना है कि ऑफ-टार्गेट प्रभावों से बचना संभव होना चाहिए। लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह थी कि बेस एडिटिंग हर भ्रूण की हर कोशिका में काम नहीं करती थी, एक ऐसी समस्या, जिसे ‘मोजेसिज्म’ कहा जाता है। यदि एक मोजेक भ्रूण एक बच्चे के रूप में विकसित होता है, तो उसके शरीर की केवल कुछ कोशिकाओं में ही वांछित बदलाव होगा, जिसका अर्थ है कि वे अभी भी उस बीमारी से पीड़ित हो सकते हैं, जिसे रोकने के लिए जीन एडिटिंग की गई थी। चीन में बड़े हो रहे 3 जीन-संपादित बच्चे भी मोजेक हो सकते हैं।
इसके साथ समस्या यह है कि वर्तमान में यह सुनिश्चित करने का कोई तरीका नहीं है कि जीन-संपादित भ्रूण मोजेक है या नहीं। जब किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित बच्चे के पैदा होने का खतरा होता है, तो आनुवांशिक परीक्षण के लिए आई.वी.एफ. भ्रूण से एक एकल कोशिका निकाली जा सकती है। यह जीन-संपादित भ्रूणों के साथ भी किया जा सकता है लेकिन यदि भ्रूण मोजेक हैं, तो केवल एक कोशिका का परीक्षण करना पर्याप्त नहीं है।एक तरीका जीन-संपादित शुक्राणु या अंडों का उपयोग करना हो सकता है। यदि एडिटिंग अंडाणु के निषेचित होने और विभाजित होने से पहले की जाती है, तो कोई मोजेसिज्म नहीं होना चाहिए। इंसानों में ऐसा नहीं किया गया लेकिन हाल ही में एक स्टार्टअप ने दावा किया है कि वह लैब में स्पर्म स्टैम सैल्स से स्पर्म बना सकता है और अगर यह सच है, तो उन स्पर्म स्टैम सैल्स को जीन-एडिट करना संभव होना चाहिए।वह दृष्टिकोण हमें उस बिंदू पर पहुंचाने में मदद कर सकता है, जहां हम सुरक्षित रूप से बच्चों को जीन-एडिट कर सकते हैं। लेकिन क्या हमें ऐसा करना चाहिए, यह एक दूसरा सवाल है।-माइकल ली पेज