चुनाव नजदीक आते ही पुराने वायदों का किया जाने लगा नया शृंगार

Edited By Updated: 09 Dec, 2021 04:43 AM

as the election nears the old promises are being made a new adornment

जैसे -जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, राजनीतिक दलों द्वारा पुराने वायदों का नए रूप में शृंगार किया जा रहा है। मतदाताओं के सामने पिछले वायदों की पूर्ति का सही हिसाब-किताब रखने की बजाय ‘तेज विकास’ जैसे

जैसे -जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, राजनीतिक दलों द्वारा पुराने वायदों का नए रूप में शृंगार किया जा रहा है। मतदाताओं के सामने पिछले वायदों की पूर्ति का सही हिसाब-किताब रखने की बजाय ‘तेज विकास’ जैसे भटकाऊ, गोल-मोल व अस्पष्ट बयानों तथा अंधाधुंध इश्तिहारबाजी के माध्यम से सामान्य लोगों को अंधेरे में धकेला जा रहा है। 

आर्थिक विकास केवल बड़ी सड़कों, अत्याधुनिक किस्म के निजी अस्पतालों व हवाई अड्डों के निर्माण, धार्मिक स्थान और आलीशान होटल बनवाने तथा उच्च वर्ग के लिए लग्जरी कारों की उपलब्धता का नाम नहीं है। यह कार्य तो हर रंग की सरकार ने खुद ही करना होता है क्योंकि इसमें उसका हित है। असल विकास की पहचान तो सामान्य लोगों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य व सामाजिक सुविधाओं का उचित प्रबंध, रोजगार, रिहायश तथा जीवन की अन्य आधारभूत जरूरतों की पूर्ति से की जाती है। इन प्रश्नों का उत्तर न तो आज के और न ही भविष्य के हुक्मरान देना चाहते हैं क्योंकि उनके लिए ऐसा विकास लाभकारी नहीं है। 

एक ‘निरंकुश बादशाह’ की तरह लोगों को खैरात के तौर पर दी जाने वाली सुविधाओं तथा धन राशियों की बौछार की जा रही है, जैसे यह सबकुछ उन्होंने अपने घर की कमाई या सम्पत्ति बेच कर देना है। सामान्य लोगों से टैक्सों के माध्यम से वसूला धन देश या प्रांत के एक समान विकास तथा लोगों की बुनियादी जरूरतों के अनुरूप सरकारी योजनाबंदी के अनुसार खर्चा जाना चाहिए। किसी राजनीतिक नेता को भी अधिकार नहीं है कि वह केवल वोटें हासिल करने के लिए लोगों के गाढ़े पसीने की कमाई से इकट्ठे किए गए सरकारी धन को मनमर्जी तथा स्व:सिद्धि के लिए खर्च करे। 

वास्तविकता यह है कि जितना धन सामान्य लोगों से टैक्सों के माध्यम से वसूला जाता है, उसका एक छोटा सा हिस्सा ही जनता के कल्याण के लिए खर्च करके बाकी सारा ‘हिस्से-पत्ती’ के मुताबिक शासक पक्ष आपस में बांट लेता है। अन्यथा बिना किसी लाभकारी और ईमानदारी से किए जाने वाले कारोबार के राजनीतिक नेताओं का रातों रात अरबपति बन जाना कैसे संभव हो सकता है? सभी राजनीतिक दल चुनाव जीतने के बाद उपरोक्त नुस्खे का इस्तेमाल खुल कर कर रहे हैं। चुनाव झूठे लारों का मौसम बन गया है। 

धर्मों, जातियों तथा बिरादरियों के आधार पर वोटें हासिल करने के तरीके बिल्कुल ही सही या तर्कसंगत नहीं कहे जा सकते और न ही इस आधार पर बनी सरकारें कभी समस्त लोकहितों के अनुकूल काम कर सकती हैं। पंजाब में मुफ्त बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा नकद राशि देने के लिए सभी दल एक-दूसरे को मात दे रहे हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पंजाब के लोगों से उन्हें सत्ता सौंपने की गुहार इस तरह लगा रहे हैं (इस बार केजरीवाल) जैसे वह मजाक में कह रहे हों कि ‘पंजाबियो राज्य में मेरे जैसा कोई अन्य दूरदर्शी तथा ईमानदार राजनेता आपके पास नहीं है?’’

यह पंजाब के गैरतमंद लोगों का अपमान है। देश में ‘एक राजनेता, एक राजनीतिक विचारधारा तथा एक राजनीतिक पार्टी के हाथ सत्ता सौंपने’ का सिलसिला जिस तेजी से बढ़ रहा है वह देश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए नए खतरों का सूचक है। सामूहिक नेतृत्व की जगह ‘निजी तथा सुप्रीमो’ के हाथों में सारी शक्ति को केंद्रित कर देना ‘तानाशाही शासन’ स्थापित करने जैसा है। इसका भुगतान भारत सहित दुनिया के अन्य बहुत से देश कर रहे हैं। 

उत्तर प्रदेश में भाजपा नेताओं ने अब खुल कर साम्प्रदायिक पैंतरे लेने शुरू कर दिए हैं। राज्य के उपमुख्यमंत्री मौर्य साहिब ने कारोबारियों तथा व्यापारियों के सामने अपने भाषण में यह कह कर भारतीय संविधान तथा राजनीतिक नैतिकता की सभी मर्यादाओं को तार-तार कर दिया कि ‘जालीदार गोल टोपी तथा लुंगी-गमछे वाले लोग (मुसलमान) जो सरेआम आपको लूटते हैं, अब योगी सरकार ने पूरी तरह खत्म कर दिए हैं।’ अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण से लाभ लेने के खेल को अब मौर्य ने ऐसा कार्य मथुरा में दोहराने का आह्वान देकर यू.पी. में साम्प्रदायिक धु्रवीकरण को खतरनाक हद तक पहुंचा दिया है। यदि प्रधानमंत्री मोदी जी पहरावे को देख कर ही किसी व्यक्ति का धर्म बता सकते हैं (अर्थात मुस्लिम) तो उनके अंधभक्त उनसे पीछे कैसे रह सकते हैं। 

समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव द्वारा चुनाव प्रचार के दौरान मुस्लिम लीग के नेता जिन्ना, जिसने 2 कौमों के आधार पर पाकिस्तान की मांग की थी, का जिक्र केवल मुस्लिम वोटें हासिल करने का घटिया हथियार ही है। अन्य भी कई मुस्लिम नेता जो मुस्लिम भाईचारे के शुभचिंतक होने का दावा कर रहे हैं, ऐसे साम्प्रदायिक बयान दाग रहे हैं जो भाजपा की साम्प्रदायिक धु्रवीकरण की राजनीति को ही आगे बढ़ा रहे हैं। ऐसा करना मुसलमान भाईचारे के हित में भी नहीं है। यह मिलजुल कर साम्प्रदायिक खेल खेलने का तरीका है। 

देश के बुद्धिमान वर्ग तथा धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक शक्तियों को चुनावों के दौरान खेली जा रही इस धोखे भरी तथा साम्प्रदायिक खेल से जनसमूहों को सावधान रखने के लिए आगे आने की जरूरत है। ऐसा न हो कि वोटों के लिए प्रचार के पर्दे के नीचे देश की विभिन्नता, धर्मनिरपेक्षता, लोकतांत्रिक तथा सहनशीलता जैसे मूल्यवान सिद्धांत ही बलि का बकरा बन जाएं। यह बहुत ही खतरनाक तथा दुर्भाग्यपूर्ण होगा।-मंगत राम पासला

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