Edited By ,Updated: 19 Mar, 2026 04:20 AM

राष्ट्र का ध्यान अब 4 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के विधानसभा चुनावों की ओर केंद्रित हो गया है, जहां प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दलों के लिए दाव बहुत ऊंचे हैं लेकिन गैर-भाजपा और क्षेत्रीय दलों के लिए यह और भी अधिक महत्वपूर्ण है।
राष्ट्र का ध्यान अब 4 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के विधानसभा चुनावों की ओर केंद्रित हो गया है, जहां प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दलों के लिए दाव बहुत ऊंचे हैं लेकिन गैर-भाजपा और क्षेत्रीय दलों के लिए यह और भी अधिक महत्वपूर्ण है। पिछले लोकसभा चुनावों में एक झटके के बाद, जिसमें भाजपा के नेतृत्व वाले एन.डी.ए. ने सत्ता तो बरकरार रखी लेकिन कम अंतर के साथ, सत्ताधारी दल अब विधानसभा चुनावों में जीत की लहर पर सवार है। इसकी पहली सफलता हरियाणा में मिली अप्रत्याशित जीत थी, जहां कांग्रेस को चुनाव जीतने के लिए पसंदीदा माना जा रहा था। इसके बाद पार्टी ने महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार में भी अपनी जीत का सिलसिला जारी रखा।
जाहिर है कि पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल के विधानसभा चुनावों में वह पूरे उत्साह और आत्मविश्वास के साथ उतर रही है। यद्यपि वह चुनाव वाले अन्य राज्यों में भी कोई कसर नहीं छोड़ेगी लेकिन उसने अपना सबसे बड़ा दांव पश्चिम बंगाल पर लगाया है, जहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लगातार चौथे कार्यकाल की तलाश में हैं। दिलचस्प बात यह है कि पिछले 60 वर्षों में इस राज्य पर केवल 2 दलों का शासन रहा है। पहले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी) की सरकार और उसके बाद ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस। भाजपा पश्चिम बंगाल में अपनी सरकार बनाने के लिए बेताब रही है और लंबे समय से इसकी तैयारी कर रही है। कांग्रेस, जो कभी मुख्य विपक्षी दल हुआ करती थी, अब हाशिए पर सिमट गई है। वामपंथी दल भी पूरी तरह पस्त हो चुके हैं।
हालांकि, भाजपा 2024 के लोकसभा चुनावों में अपनी सीटों की संख्या बढ़ाने में असमर्थ रही थी। टी.एम.सी. ने 28 सीटें जीतीं जबकि भाजपा की संख्या घटकर 12 रह गई। अब वह उम्मीद कर रही है कि हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार में अपनी वापसी की तरह, वह विधानसभा चुनावों में बेहतर प्रदर्शन करेगी। ‘दीदी’ के रूप में भाजपा को एक कठिन और आक्रामक प्रतिद्वंद्वी का सामना करना होगा। राज्य में भाजपा के लिए अपने वोट शेयर या सीटों की संख्या में वृद्धि भी एक सकारात्मक परिणाम होगा। असम एक और राज्य है जहां भाजपा अपने मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के साथ आक्रामक अभियान चला रही है, जो खुले तौर पर अपने सांप्रदायिक एजैंडे को हवा दे रहे हैं। निर्वाचन क्षेत्रों के विवादास्पद परिसीमन के बाद राज्य में यह पहला चुनाव है, जिसने निर्वाचन क्षेत्रों की जनसांख्यिकीय प्रकृति को महत्वपूर्ण रूप से बदल दिया है। सरमा भाजपा नीत सरकार के कार्यकाल के दौरान किसी विकास या प्रगति के लिए नहीं, बल्कि अवैध मुस्लिम प्रवासियों के मुद्दे पर वोट मांग रहे हैं, जिन्हें वे ‘मियां’ कहते हैं। राज्य में कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे और नेतृत्व को देखते हुए, यह किसी चमत्कार से कम नहीं होगा, यदि वह राज्य में भाजपा को सत्ता से बेदखल कर सके।
तमिलनाडु एक और राज्य है जहां क्षेत्रीय दलों का दबदबा है और राष्ट्रीय दल इन पाॢटयों के सहारे चलने को मजबूर हैं। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ द्रमुक (डी.एम.के.) अपने दूसरे कार्यकाल की तलाश में है और उसने पिछले लोकसभा चुनावों में भी अच्छा प्रदर्शन किया था। अन्नाद्रमुक (ए.आई.ए.डी.एम.के.) के नेतृत्व वाले विपक्ष के पास स्टालिन जैसा कोई करिश्माई नेता नहीं है लेकिन इसे कद्दावर चुनाव रणनीतिकार अमित शाह द्वारा निर्देशित किया जा रहा है। इसके बावजूद, विपक्षी दलों के लिए स्टालिन की राह में रोड़े अटकाना एक कठिन कार्य होगा। केरल में, वामपंथी देश में अपनी एकमात्र सरकार के अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसे भ्रष्टाचार के आरोपों और विकास की कमी सहित गंभीर प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डैमोक्रेटिक फ्रंट (यू.डी.एफ.) इसका मुख्य प्रतिद्वंद्वी बना हुआ है, हालांकि भाजपा राज्य में अपना आधार बढ़ाने का प्रयास कर रही है।
कांग्रेस पार्टी के भीतर असंतोष और गुटबाजी से जूझ रही है, जिसने वस्तुत: अपने दिग्गज नेता शशि थरूर को हाशिए पर धकेल दिया है। पार्टी में मुख्यमंत्री पद के कुछ अन्य दावेदार भी हैं। भाजपा का राज्य में बहुत अधिक प्रभाव नहीं है लेकिन वह विधानसभा में अपनी वर्तमान एकमात्र सीट से अपनी संख्या में सुधार करना चाहेगी। पार्टी ने तब सबको चौंका दिया था, जब पिछले चुनावों में पहली बार उसने एकमात्र लोकसभा सीट जीती थी। भाजपा और उसके नेता एक ‘वैल-ऑयल्ड’ इलैक्शन मशीन (सुव्यवस्थित चुनावी मशीन) होने का श्रेय पाने के हकदार हैं। वे अपनी रणनीति बहुत पहले से तैयार करते हैं और चुनाव जीतने के लिए जो भी आवश्यक हो, वह करते हैं। हालांकि, इस प्रक्रिया में असम के सरमा जैसे इसके कुछ नेता अति कर देते हैं। चुनावी बयानबाजी के मामले में पार्टी को संयम बरतने की जरूरत है।
कुल मिलाकर, जहां भाजपा अपने प्रदर्शन में सुधार के लिए उत्सुक होगी, वहीं ‘इंडियन नैशनल डिवैल्पमैंटल इंक्लूसिव एलायंस’ (इंडिया) के लिए दाव अधिक ऊंचे हैं, क्योंकि यदि गठबंधन सहयोगी अच्छा प्रदर्शन नहीं करते हैं, तो उसके पास खोने के लिए बहुत कुछ है।-विपिन पब्बी