क्या भारत यूरोपीय संघ को वस्त्र निर्यात के मामले में बंगलादेश को पीछे छोड़ सकता है?

Edited By Updated: 22 Feb, 2026 05:28 AM

can india overtake bangladesh in textile exports to the eu

भारत का वस्त्र उद्योग वैश्विक निर्यात बाजारों में लगातार पिछड़ता जा रहा है। इसके विपरीत, बंगलादेश ने निर्यात के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। हाल ही में हस्ताक्षरित भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (एफ.टी.ए.) और बंगलादेश के अल्प...

भारत का वस्त्र उद्योग वैश्विक निर्यात बाजारों में लगातार पिछड़ता जा रहा है। इसके विपरीत, बंगलादेश ने निर्यात के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। हाल ही में हस्ताक्षरित भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (एफ.टी.ए.) और बंगलादेश के अल्प विकसित देश (एल.डी.सी.) का दर्जा समाप्त होने की संभावना को देखते हुए, यह भारत के वस्त्र उद्योग के लिए एक सुनहरा अवसर है।

वस्त्र मूल्य शृंखला के भीतर, यूरोपीय संघ को भारत का निर्यात मुख्य रूप से तैयार कपड़ों जैसे टी-शर्ट, शर्ट और ट्राऊजर की बजाय मध्यवर्ती उत्पादों (विशेष रूप से धागे और कपड़े) पर केंद्रित है। बंगलादेश का निर्यात विशेष रूप से 2 श्रेणियों के तैयार कपड़ों में भारत से कहीं अधिक है, बुने या क्रोशिया से बने वस्त्र (जैसे टी-शर्ट, जर्सी, पुलओवर, स्वैटर और काॢडगन) और बुने हुए वस्त्र (जैसे सूट, जैकेट, ट्राऊजर, ड्रैस और शर्ट)।

बुने हुए/क्रोशिया किए गए वस्त्रों के लिए यूरोपीय संघ के कुल आयात में भारत की हिस्सेदारी 2009 में लगभग 6.5 प्रतिशत से घटकर 2023 में लगभग 4.4 प्रतिशत रह गई। वहीं, बंगलादेश की हिस्सेदारी 2000 में मात्र 6 प्रतिशत से बढ़कर 2009 में 13 प्रतिशत और 2023 तक 26 प्रतिशत हो गई। बुने हुए वस्त्रों के व्यापार में भी इसी तरह का रुझान देखने को मिलता है। बुने हुए वस्त्रों के मामले में, यूरोपीय संघ को भारत के नाममात्र निर्यात मूल्य में निरपेक्ष रूप से गिरावट आई है, जो लगभग 3.5 अरब डॉलर के शिखर से गिरकर 2.9 अरब डॉलर हो गया है।

सभी उत्पादों में भारत की प्रति इकाई कीमत लगातार बंगलादेश से अधिक है। इससे निम्नलिखित संकेत मिल सकते हैं : पहला, भारत अधिक मूल्यवॢधत, बेहतर गुणवत्ता वाले वस्त्रों का निर्यात कर रहा होगा, जिससे वह अधिक कीमतें वसूलने में सक्षम है। हालांकि, इसकी कम बाजार हिस्सेदारी से पता चलता है कि आम बाजार में बिकने वाले परिधानों की तुलना में ऐसे उत्पादों की यूरोपीय संघ में मांग सीमित है, जिससे संकेत मिलता है कि केवल ‘प्रीमियम पोजीशनिंग’ (यदि संभव हो तो) से बिक्री में वृद्धि नहीं हो सकती। दूसरा, और अधिक संभावित कारण यह है कि ऊंची कीमतें संरचनात्मक कमियों को दर्शाती हैं-उच्च उत्पादन लागत, कम एकीकृत आपूॢत शृंखलाएं और रसद संबंधी अक्षमताएं।

इसके अलावा, भारतीय और बंगलादेशी उत्पादों पर लगने वाले शुल्क में भी काफी अंतर है। बंगलादेश, एक अल्पविकसित देश होने के नाते, यूरोपीय संघ में शुल्क-मुक्त और कोटा-मुक्त प्रवेश का लाभ उठाता रहा है। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह शून्य-टैरिफ पहुंच तब भी लागू होती है, जब वस्त्र यूरोपीय संघ की मानक ‘दोहरे परिवर्तन’ की आवश्यकता को पूरा नहीं करते। इसका मतलब यह है कि बंगलादेश दुनिया में कहीं से भी कपड़ा आयात कर सकता है, घरेलू स्तर पर कपड़े सिल सकता है और उन्हें शून्य शुल्क पर यूरोपीय संघ को निर्यात कर सकता है। भारत को इस तरह की तरजीही सुविधा प्राप्त न होने के कारण यूरोपीय संघ के मोस्ट फेवर्ड नेशन (एम.एफ.एन.) टैरिफ के तहत लगभग 12 प्रतिशत का भुगतान करना पड़ता है।

दो प्रमुख संरचनात्मक बदलाव निकट भविष्य में दिखाई देने वाले हैं। सबसे पहले, बंगलादेश 2029 में अपने ई.बी.ए. लाभ खोने वाला है। इसका अर्थ होगा यूरोपीय संघ में स्वत: शुल्क-मुक्त प्रवेश का अंत और परिधान निर्यात पर संभावित रूप से लगभग 12 प्रतिशत का एम.एफ.एन. (फाइनल फॉरेन नेटिव) टैरिफ लग सकता है। इसके बाद बंगलादेश यूरोपीय संघ की जनरलाइज्ड स्कीम ऑफ प्रैफरैंसेस प्लस (जी.एस.पी.) में प्रवेश करने का प्रयास करेगा, जो वस्त्रों सहित लगभग दो-तिहाई टैरिफ मदों पर शून्य टैरिफ प्रदान करता है। हालांकि, जी.एस.पी. में मूल के सख्त नियम (आर.ओ.ओ.) और सुरक्षा प्रावधान लागू होते हैं।

बंगलादेश कपड़ों के लिए अन्य देशों (भारत सहित) पर काफी हद तक निर्भर है, इसलिए इसका मतलब यह हो सकता है कि बंगलादेश के वस्त्र शुल्क मुक्त प्रवेश के लिए जी.एस.पी.-आर.ओ.ओ. की शर्तों को पूरा न करें। ऐतिहासिक रूप से, यूरोपीय संघ दोहरे परिवर्तन मानदंड पर अपने रुख पर कायम रहा है। यदि वह ऐसा करना जारी रखता है, तो बंगलादेश को गंभीर नुकसान होगा। यदि प्रतिस्पर्धा मूल्य-आधारित है, तो बंगलादेश अपना बाजार हिस्सा खो सकता है। दूसरी ओर, यदि बंगलादेश का प्राथमिक लाभ आपूर्ति शृंखला एकीकरण से आता है, तो वह उच्च शुल्कों के बावजूद भी अपना प्रभुत्व बनाए रख सकता है।

भारत-ई.यू. समझौते के तहत भारत को यूरोपीय संघ के कपड़ा बाजारों में शुल्क-मुक्त प्रवेश मिलेगा, बशर्ते 2 चरणों वाली प्रसंस्करण प्रक्रिया अनिवार्य हो। चूंकि भारत का कपड़ा उद्योग पहले से ही अपेक्षाकृत एकीकृत है (परिधान उत्पादन में प्रयुक्त अधिकांश धागे और कपड़े का निर्माण देश में ही होता है), इसलिए 2 चरणों वाली प्रसंस्करण प्रक्रिया भारतीय कपड़ा निर्यात के लिए कोई बाधा नहीं बनेगी। परिणामस्वरूप, भारतीय निर्यातक बिना किसी बड़े पुनर्गठन के मूल नियमों की कठोरता को पूरा करने के लिए अच्छी स्थिति में हैं। वियतनाम के परिधान निर्यात का हालिया अनुभव, जिसमें 2020 में यूरोपीय संघ-वियतनाम मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर के बाद उछाल देखा गया, भारत के लिए भविष्य में मौजूद अवसरों का संकेत है।-अर्नब चक्रवर्ती, अन्वेषा बसु

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