क्या हम महर्षि दयानंद के दिखाए हुए मार्ग पर चल पाए?

Edited By Updated: 12 Feb, 2026 05:16 AM

were we able to follow the path shown by maharishi dayanand

150 साल की अंग्रेजों की गुलामी और उनसे छुटकारा पाने का कड़ा संघर्ष। बहुत मुश्किल से हमारे पुरखों ने आजादी की नींव रखी, नींव की इन्हीं मजबूत ईंटों में से एक थे, आर्य समाज के संस्थापक, वेदों के पुरोधा, जगदगुरु महर्षि दयानंद सरस्वती जी। अपने अज्ञातवास...

150 साल की अंग्रेजों की गुलामी और उनसे छुटकारा पाने का कड़ा संघर्ष। बहुत मुश्किल से हमारे पुरखों ने आजादी की नींव रखी, नींव की इन्हीं मजबूत ईंटों में से एक थे, आर्य समाज के संस्थापक, वेदों के पुरोधा, जगदगुरु महर्षि दयानंद सरस्वती जी। अपने अज्ञातवास में अंग्रेजों की राजनीतिक धूर्तता और भारत के सामाजिक-आर्थिक पतन का करारा जवाब उन्होंने दिया लेकिन आज यदि हम पूछें कि महर्षि दयानंद सरस्वती जी की समाज को क्या देन है, तो कुछ रटे-रटाए उत्तर मिलेंगे- उन्होंने हमें यज्ञ करना सिखाया, वेदों की ओर लौटने का संदेश दिया, चारों वेदों का भाष्य करके हमें सौंप दिया, पुरानी रूढिय़ों, आडंबरों और खोखले विचारों के खोल से निकालकर नएपन को अपनाने का संदेश दिया, वर्ण-आश्रम बताए, आर्य-अनार्य में अंतर समझाया। 

लेकिन एक प्रश्न मानस में उथल-पुथल मचाता है कि महॢष दयानंद जी ने हमें ये सब क्यों बताया? निश्चित रूप से हमें उत्तम नागरिक बनाने के लिए और हममें आर्यत्व की भावना भरने के लिए। लेकिन जरा रुकिए और मनन कीजिए, क्या हम वास्तव में स्वामी दयानंद सरस्वती जी के दिखाए हुए मार्ग पर चल पाए? क्या हम अपनी नई पीढिय़ों को अच्छे नागरिक बना सके? क्या उन्हें वे संस्कार सिखा सके, जिनकी राह महर्षि दयानंद ने हमें दिखाई थी? प्रश्न यह भी उठता है कि  हमारी संतानें आज किधर जा रही हैं? हम आर्यसमाजी तो बने, लेकिन क्या हम ईमानदार और जिम्मेदार आर्यसमाजी बन पाए? गुरु की गरिमा को चोट पहुंचाते हुए, पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण में अपनी संस्कृति को पैरों तले रौंदते हुए हम किस तरह की तरक्की की बात आज कर रहे हैं?

ताक पर रखे गए रिश्ते हमारी युवा पीढ़ी के दिशाविहीन हो जाने की कहानी कह रहे हैं। पिछले दिनों किसी कोरियन ऐप के आकर्षण में बंधी 3 सगी बहनों द्वारा आत्महत्या कोई एक अकेला उदाहरण नहीं है। ऐसी हजारों घटनाएं रोज हमारे समाचार पत्रों की सुर्खियां बनती हैं। अपने माता-पिता की इच्छाओं और आत्मबोध से बेखबर नई पीढ़ी जरा-सी भी असफलता पाते ही हत्या और आत्महत्या जैसी प्रवृत्तियों को अपना रही है तो नि:संदेह प्रश्न उठता है कि क्या सचमुच ऐसी ही आर्य संतानें बनाने का सपना महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने देखा था?  हर वर्ष महर्षि दयानंद जी का जन्म दिवस मना लेना, आर्य समाज में धूमधाम से प्रचार-प्रसार का ढिंढोरा पीटना और  एक-दूसरे की प्रशंसा करते हुए आपस में सम्मान की रेवडिय़ां बांट लेना क्या काफी है? क्या ऐसी छिटपुट गतिविधियों से हम देव दयानंद के बलिदान का अंश भर भी ऋण चुका पा रहे हैं? उनका सपना यदि जय-जयकार पाने का ही होता तो वह वेदों की मूल प्रतियों की खोज न करते, सत्रह बार विषपान न करते, इससे अधिक ख्याति तो ऊखीमठ के पंडितों द्वारा दिए गए महंत की गद्दी के प्रलोभन को स्वीकार करके भी मिल जाती।

सुविधा संपन्न के लिए जय-जयकार पाना कोई कठिन काम नहीं है। लेकिन उनका लक्ष्य तो मानव जाति को ऊंचाई पर देखने का था। क्या हम उनके इस लक्ष्य को पूरा करने की ओर अग्रसर हैं? व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर  देश और समाज के सच्चे प्रहरी बनने का कर्तव्य हम कब निभाएंगे? आइए! मनन करें कि ऋषिऋण और गुरुऋण चुकाने में कहां-कहां चूक हो रही है? शिक्षण संस्थाओं के माध्यम से ऐसे सांचों का निर्माण करना नितांत आवश्यक है, जो समाज को नई दिशा दे सकें, जो हमारी संतानों में अपनी वैदिक संस्कृति और हमारे गरिमामयी इतिहास के प्रति गौरव का भाव जगा सकें। केवल एक या दो संस्थाओं के प्रयासों से सब कुछ संभव नहीं हो सकता। सभी शिक्षण संस्थानों को, शिक्षकों को, अभिभावकों को और नवयुवाओं को समाज के जागरूक सदस्य बनना होगा और आर्य अर्थात श्रेष्ठ की परिभाषा को नए सिरे से गढऩा होगा, तभी महर्षि दयानंद जी के सपनों का ओजस्वी, तेजस्वी और श्रेष्ठ भारत रचा जा सकेगा। उठिए, जागिए और ‘संगच्छध्वं, संवदध्वं’ के नारे के साथ पुन: देश का नवनिर्माण करें।-कैप्टन विजय स्याल 
 

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