Edited By ,Updated: 22 Feb, 2026 05:18 AM

दशकों तक, चाबहार परियोजना ने पश्चिम एशिया और मध्य एशिया में भारत के प्रभाव के सबसे ठोस धुरी होने का वादा किया-एक ऐसा नागरिक प्रवेश द्वार, जो पाकिस्तान को दरकिनार कर सके, नई दिल्ली को स्थल-रुद्ध अफगानिस्तान से जोड़ सके और चीन की समुद्री पहुंच को...
दशकों तक, चाबहार परियोजना ने पश्चिम एशिया और मध्य एशिया में भारत के प्रभाव के सबसे ठोस धुरी होने का वादा किया-एक ऐसा नागरिक प्रवेश द्वार, जो पाकिस्तान को दरकिनार कर सके, नई दिल्ली को स्थल-रुद्ध अफगानिस्तान से जोड़ सके और चीन की समुद्री पहुंच को संतुलित करने के लिए एक व्यापक ‘नैकलेस ऑफ डायमंड्स’ रणनीति को सहारा दे सके। लेकिन भारत और ईरान के बीच जो एक व्यावहारिक सांझेदारी के रूप में शुरू हुआ था-जिसे अक्सर सभ्यतागत संबंधों और रणनीतिक अभिसरण द्वारा आकार दिए गए ‘हर मौसम के’ रिश्ते के रूप में वर्णित किया जाता था-वह अब तीव्र दबाव में है।
रणनीतिक विजन से अनिश्चित भविष्य तक : 2000 के दशक की शुरुआत में, भारत ने अफगानिस्तान और उससे आगे पहुंचने के लिए पाकिस्तान के आसपास के रास्तों की तलाश शुरू की। ओमान की खाड़ी पर ईरान की स्थिति के माध्यम से एक महत्वपूर्ण अवसर मिला। समय के साथ, भारत और ईरान ने चाबहार बंदरगाह पर शाहिद बेहिश्ती टर्मिनल के विकास के लिए एक सहकारी ढांचा विकसित किया। 2016 में एक बड़ा बदलाव आया, जब भारत ने ईरान और अफगानिस्तान के साथ एक समझौता किया-जिसका उद्देश्य बंदरगाह के साथ-साथ उससे जुड़े परिवहन मार्गों का निर्माण करना था। भारत की ओर से भारी धन का प्रवाह हुआ, जिसमें केवल बंदरगाह के उन्नयन के लिए लगभग 120 मिलियन डॉलर खर्च किए गए, साथ ही सीमा पार बुनियादी ढांचे के काम के लिए अधिक ऋण उपकरण भी दिए गए। बाहरी फर्मों की बजाय, ‘इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड’ जैसी भारतीय संस्थाओं ने टर्मिनल चलाने का जिम्मा संभाला। फिर भी, वे महत्वाकांक्षाएं आज संदेह के घने कोहरे में तैर रही हैं। अब जबकि अमरीकी प्रतिबंध और भी मजबूत होकर वापस आ गए हैं, भारत को ईरान के साथ व्यापार करने के बारे में कठिन विकल्पों का सामना करना पड़ रहा है, जहां जोखिम अब नाजुक राजनीति से टकरा रहे हैं।
आर्थिक पहलुओं से परे, रणनीतिक दृष्टिकोण से भी चाबहार भारत के लिए महत्वपूर्ण है। चीन ‘बैल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (बी.आर.आई.) और ‘स्ट्रिंग ऑफ पल्र्स’ के माध्यम से बंदरगाहों और बुनियादी ढांचे का निर्माण करके अपना प्रभाव बढ़ा रहा है-जिसमें दक्षिण चीन सागर से अरब सागर तक के मार्ग पर बंदरगाह शामिल हैं। इन घटनाक्रमों पर भारत की प्रतिक्रिया अपना स्वयं का ‘नैकलेस ऑफ डायमंड्स’ बनाना है जो भारत को रणनीतिक भागीदार और ओमान से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों तक हिंद महासागर के सभी क्षेत्रों में ‘पहुंच’ प्रदान करेगा। इस परिप्रेक्ष्य में, चाबहार पश्चिमी हिंद महासागर में भारत की उपस्थिति को प्रदर्शित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, साथ ही पाकिस्तान में ग्वादर के माध्यम से चीन की पहुंच को सीमित करने का प्रयास भी करता है।
प्रतिबंध, रणनीति और बजट का संकेत : हालांकि भारत ने पहले बंदरगाह पर काम जारी रखने के लिए सीमित छूट सुरक्षित कर ली थी, क्योंकि अफगानिस्तान में तालिबान शासन को मौन समर्थन देने में इसकी भूमिका थी। हालांकि, वर्तमान भू-राजनीतिक माहौल ने उन विकल्पों को संकुचित कर दिया है। रिपोर्टें बताती हैं कि चाबहार परियोजना के लिए छूट केवल 26 अप्रैल, 2026 तक ही वैध हो सकती है, जिससे भारत के लिए समय सीमित हो गया है। 2026-27 का केंद्रीय बजट इस तनाव का प्रतिनिधित्व करता प्रतीत होता है- चाबहार के लिए कोई आबंटन न होना संकोच और डरपोकपन का एक मजबूत संकेत भेजता है, जो एक महत्वपूर्ण क्षेत्र में जगह छोडऩे जैसा है जिसके भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर प्रभाव पड़ेंगे। चाबहार परियोजना से पीछे हटना या अपनी प्रतिबद्धता को ढीला करना भारत की दीर्घकालिक क्षेत्रीय रणनीति और एक भरोसेमंद भागीदार के रूप में उसकी प्रतिष्ठा, दोनों को कमजोर करता है।
चाबहार से पीछे हटने के गंभीर परिणाम होंगे। सबसे पहले, ईरानी और नजदीकी रणनीतिक स्थानों पर भारत की पकड़ कमजोर हो जाएगी। वित्तीय तनाव से जूझ रहे तेहरान के बीजिंग और मॉस्को पर अधिक निर्भर होने की संभावना बढ़ जाएगी-जहां पैसा और समर्थन आसानी से मिलता है-जिससे नई दिल्ली की भूमिका कम प्रभावी हो जाएगी। भारत अपनी किसी भी प्रमुख रणनीतिक संपत्ति को खोना बर्दाश्त नहीं कर सकता, क्योंकि भू-राजनीतिक परिदृश्य अत्यधिक प्रतिस्पर्धी है। चाबहार बंदरगाह भू-राजनीति के एक महत्वपूर्ण क्षेत्र से भारत के पीछे हटने का एक उदाहरण है।-मनीष तिवारी (वकील, सांसद एवं पूर्व मंत्री)