Edited By ,Updated: 10 Apr, 2026 04:51 AM

खुद को विश्व शांति और स्थिरता का ठेकेदार समझने वालों को संघर्षविराम की जरूरत समझने में 40 दिन लग गए। इस अवधि में दिखाई पड़े तबाही के मंजरों के मद्देनजर कोई भी समझदार व्यक्ति संघर्ष विराम का स्वागत ही करेगा लेकिन फिर भी यह सवाल अनुत्तरित है कि आखिर...
खुद को विश्व शांति और स्थिरता का ठेकेदार समझने वालों को संघर्षविराम की जरूरत समझने में 40 दिन लग गए। इस अवधि में दिखाई पड़े तबाही के मंजरों के मद्देनजर कोई भी समझदार व्यक्ति संघर्ष विराम का स्वागत ही करेगा लेकिन फिर भी यह सवाल अनुत्तरित है कि आखिर इस युद्ध से हासिल क्या हुआ? 15 दिनों के लिए घोषित संघर्ष विराम के बीच अमरीका और ईरान के प्रतिनिधि पाकिस्तान में उन शर्तों पर बातचीत करेंगे, जिन पर सहमति के बाद इस युद्ध का अंत हो जाएगा।
पहले भी 26 फरवरी को जेनेवा में हुई बातचीत में कई मुद्दों पर सहमति बन गई थी लेकिन वार्ता के अगले दौर से पहले ही ईरान पर हमले शुरू हो गए। जाहिर है, ईरान की ओर से भी जवाबी हमले होने ही थे। परिणामस्वरूप न सिर्फ ये 3 देश, बल्कि खाड़ी के सभी देश जंग के बीच तबाही झेलते रहे, जिसकी मार ऊर्जा संकट और महंगाई के रूप में शेष विश्व को भी झेलनी पड़ी। समझना मुश्किल नहीं होना चाहिए कि अगर संबंधित पक्षों ने पहले ही संघर्ष की बजाय संवाद के जरिए समाधान खोजा होता तो इस तबाही से बचा जा सकता था। युद्ध के बीच अपनी-अपनी जीत के दावे करते हुए भी ईरान और अमरीका का अचानक संघर्ष विराम पर सहमत हो जाना बताता है कि जमीनी हकीकत क्या रही होगी।
अपने दूसरे राष्ट्रपति काल के पहले ही साल में 8 संघर्षविराम करवाने का दावा करते हुए शांति का नोबेल मांगने वाले अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प इन 40 दिनों में ‘बर्बादी के बादशाह’ ज्यादा नजर आए। सत्ता परिवर्तन के घोषित उद्देश्य के साथ किसी दूसरे देश पर हमले कम-से-कम लोकतांत्रिक सोच तो नहीं मानी जा सकती लेकिन विश्व का सबसे पुराना लोकतंत्र माने जाने वाले अमरीका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने ऐसा कर दिखाया। तर्क दिया जा सकता है कि जो व्यक्ति सेना भेज कर वेनेजुएला से उसके राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को सपत्नीक उठवा चुका हो, उसके लोकतांत्रिक होने की गलतफहमी नहीं पालनी चाहिए। तर्क निराधार नहीं है, पर सच यह भी है कि अगर वेनेजुएला प्रकरण में अन्य देशों ने अपनी वैश्विक जिम्मेदारी का अहसास करते हुए कड़ी प्रतिक्रिया की होती तो शायद पश्चिम एशिया को 40 दिन की यह युद्ध विभीषिका नहीं झेलनी पड़ती, जिसकी तपिश दूरदराज के देशों ने भी महसूस की। दरअसल दूसरे राष्ट्रपति काल की शुरुआत से ही ट्रम्प प्रवासियों और टैरिफ जैसे मुद्दों पर वैश्विक व्यवस्था को ही चुनौती देते नजर आ रहे हैं लेकिन ज्यादातर देश अपने-अपने हितों से संचालित होकर खेलते रहे।
लंबे खिंचते युद्ध से तबाही और उसकी तपिश महसूस कर इस बार अमरीका के उन परंपरागत मित्र देशों ने भी उसका साथ देने से इंकार कर दिया, जिन्हें ट्रम्प अपने साथ ही मान कर चलते रहे। अमरीका के साम्राज्यवादी और भोगवादी चरित्र के बावजूद वहां के नागरिकों ने भी सड़कों पर उतर कर ट्रम्प के इस युद्धोन्माद का विरोध करने का साहस दिखाया। इसी साल होने वाले मध्यावधि चुनावों के मद्देनजर विरोधी डैमोक्रेट्स को कारगर मुद्दा मिल गया, तो रिपब्लिकन्स भी अपने राष्ट्रपति की हरकतों के राजनीतिक खतरे महसूस करने लगे। कहना नहीं होगा कि इन चौतरफा दबावों के बीच संघर्ष की राह तलाशते हुए भी ट्रम्प अपने अहंकारी कारोबारी चरित्र से बाज नहीं आए। सप्ताहांत में युद्ध समाप्ति की भविष्यवाणी से बाजार में गिरावट तथा फिर सप्ताह के शुरू में युद्धोन्माद और भड़का कर ट्रम्प द्वारा अपने करीबियों को शेयर बाजार से मुनाफा कमाने के किस्से अमरीकी मीडिया में आम हैं। कभी ट्रम्प स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से अमरीका को बेपरवाह बता कर अन्य देशों पर उसे खुलवाने के लिए दबाव बनाते दिखे, तो कभी 48 घंटे में उसे न खोलने पर ईरान को पाषाण युग में पहुंचाने की धमकी देते। कभी चार दिन का अल्टीमेटम देकर उसे 10 दिन तक बढ़ा दिया, तो फिर ईरानी सभ्यता की ही समाप्ति के लिए 48 घंटे का अल्टीमेटम दे दिया।
जाहिर है, किसी जिम्मेदार लोकतांत्रिक देश के राष्ट्रपति से ऐसा आचरण अपेक्षित नहीं लेकिन यही हमारे समय का सच है। अनेक बार हमले के लक्ष्य हासिल कर लेने और ईरान का सैन्य ही नहीं, शासकीय ढांचा भी नष्ट करने के दावे करने वाले ट्रम्प अगर अब 40 दिनों बाद 15 दिनों के संघर्ष विराम पर सहमत हो गए तो उसकी सफलता को ले कर आश्वस्त होना आसान नहीं। ध्यान रहे कि पिछले साल भी ऐसा संघर्षविराम हुआ था और इस साल भी संवाद के जरिए समाधान की कोशिशों के बीच ईरान पर हमला बोला गया। इस संघर्षविराम की सफलता पर संदेह के अन्य 2 बड़े कारण शर्तें और मध्यस्थता कराने वाला देश है।
आदत के मुताबिक ट्रम्प ने अपनी जीत का दावा करते हुए भी ईरान की शर्तों का खंडन नहीं किया है। हां, इसराईल अवश्य लेबनान में संघर्षविराम लागू करने से इंकार कर रहा है, जबकि मध्यस्थता कर रहा पाकिस्तान कह रहा है कि संघर्षविराम के दायरे में लेबनान भी है। बेशक कर्ज के जाल में फंसा खस्ता अर्थव्यवस्था वाला पाकिस्तान अर्से से मध्य पूर्व की इस आपदा में अपने लिए अवसर तलाश रहा था लेकिन मध्यस्थता के लिए सबसे जरूरी चीज होती है मध्यस्थ की अपनी विश्वसनीयता, जो पाकिस्तान के पास दूर-दूर तक नहीं बची। तब क्या ईरानी सभ्यता की समाप्ति के अल्टीमेटम की समाप्ति से मात्र डेढ़ घंटे पहले हुए इस संघर्षविराम में पाकिस्तान सिर्फ मुखौटा है और असली भूमिका चीन ने निभाई है? ध्यान रहे कि ट्रम्प को जल्द ही चीन की यात्रा पर जाना है।-राज कुमार सिंह