‘डिजिटल लोरी’ के साए में सुबकता बचपन

Edited By Updated: 17 Jun, 2026 04:50 AM

childhood sobs under the shadow of  digital lullaby

कभी बच्चे की पहली दुनिया मां की गोद हुआ करती थी। उसकी पहली पाठशाला घर का आंगन, उसका पहला मनोरंजन मिट्टी, उसकी नन्ही दुनिया की पहली-पहली कहानी दादी और नानी की आवाज में होती थी, उसका पहला खिलौना कोई लकड़ी का घोड़ा या कपड़े की गुडिय़ा होती थी। लेकिन आज...

कभी बच्चे की पहली दुनिया मां की गोद हुआ करती थी। उसकी पहली पाठशाला घर का आंगन, उसका पहला मनोरंजन मिट्टी, उसकी नन्ही दुनिया की पहली-पहली कहानी दादी और नानी की आवाज में होती थी, उसका पहला खिलौना कोई लकड़ी का घोड़ा या कपड़े की गुडिय़ा होती थी। लेकिन आज तस्वीर बदल गई है। अब बच्चे की पहली दुनिया एक चमकती हुई स्क्रीन है, पहली लोरी यूट्यूब का वीडियो, पहला दोस्त कोई कार्टून चरित्र और पहला खिलौना स्मार्टफोन बन गया है। यह केवल बदलते समय के साथ तकनीक के विस्तार की कहानी नहीं, बचपन के धीरे-धीरे सिकुड़ते जाने की कहानी है।

हाल ही में पी.जी.आई.एम.ई.आर., चंडीगढ़ की टीम द्वारा किए गए अध्ययन ने इस संकट को आंकड़ों की भाषा में सामने रखा है। शोध के अनुसार देश के लगभग 68 प्रतिशत बच्चे भोजन करते समय मोबाइल या किसी स्क्रीन को देखते हैं। यह विषय विचारणीय इसलिए है क्योंकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) की 2019 की गाइडलाइन स्पष्ट रूप से कहती है कि 2 वर्ष से कम आयु के बच्चों को स्क्रीन से दूर रखा जाना चाहिए, जबकि 2 से 5 वर्ष तक के बच्चों के लिए स्क्रीन समय 1 घंटे से अधिक नहीं होना चाहिए। डब्ल्यू.एच.ओ. का मानना है कि छोटे बच्चों के लिए सक्रिय शारीरिक गतिविधियों वाले खेल, पर्याप्त नींद और मानवीय संवाद किसी भी डिजिटल माध्यम से कहीं अधिक सार्थक एवं उपयोगी हैं। जबकि वर्तमान परिदृश्य बेहद चिंताजनक है। मोबाइल फोन अब घरों में केवल संचार का माध्यम नहीं रह गया, बल्कि वह बच्चों को शांत रखने, उन्हें खाना खिलाने और व्यस्त रखने का सबसे आसान माध्यम बन चुका है।

यह वैज्ञानिक तथ्य है कि मानव मस्तिष्क के विकास का सबसे महत्वपूर्ण समय जन्म से 5 वर्ष तक का होता है। इसी अवधि में भाषा, भावनाएं, सामाजिक कौशल, कल्पनाशक्ति और सीखने की क्षमता की नींव रखी जाती है। जब किसी बालक की उम्र की इस अवधि का अधिकांश समय  स्क्रीन के सामने बीतता है, तो उसका प्रभाव केवल उसकी आंखों पर नहीं, बल्कि उसके पूरे व्यक्तित्व और मानसिक विकास पर पड़ता है। आज बच्चे का मुंह खुलवाने के लिए मोबाइल स्क्रीन की आवश्यकता पड़ती है। बच्चा खाते समय कार्टून देख रहा होता है। ऐसे में उसे यह एहसास नहीं होता कि उसने कितना खाया, क्या खाया और उसका स्वाद कैसा था क्योंकि वह तो भोजन का आनंद ले ही नहीं रहा, उसका पूरा ध्यान  कार्टून पर है। चिकित्सकों के अनुसार ऐसी आदतें आगे चलकर अस्वस्थ खान-पान, मोटापे और व्यवहार संबंधी समस्याओं का कारण बन सकती हैं।

पी.जी.आई.एम.ई.आर. के इसी अध्ययन में यह भी पाया गया कि जब बच्चों का स्क्रीन टाइम 73 प्रतिशत कम किया गया, तो उनकी खेल गतिविधियों में 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई। यह आंकड़ा अत्यंत उत्साहित करने वाला है, क्योंकि यह बताता है कि समस्या बच्चों में नहीं है। बच्चा आज भी खुली हवा में दौडऩा चाहता है। वह आज भी मिट्टी में खेलना चाहता है। वह आज भी तितलियों के पीछे भागना चाहता है। वह आज भी मित्र बनाना चाहता है।

दरअसल, बात सिर्फ बच्चों के बचपन छिन जाने की नहीं है। कनाडा में लगभग 900 बच्चों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि छोटे बच्चों में प्रत्येक अतिरिक्त 30 मिनट स्क्रीन उपयोग के साथ उनमें भाषा के विकास में विलंब का जोखिम लगभग 49 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। विभिन्न शोधों में यह बात सामने आई है कि बच्चों के बढ़ते स्क्रीन टाइम के साथ उनमें ध्यान केंद्रित करने की क्षमता अर्थात कंसंट्रेशन में कमी आ जाती है। आखिर जो बच्चा स्क्रीन पर हर 2 या 3 सैकेंड में बदलती रील या तस्वीर का आदी हो चुका है, वह अधिक समय तक किसी एक विषय पर अपना ध्यान कैसे केंद्रित रख पाएगा? इसके अतिरिक्त भाषा विकास में विलंब, नींद की गुणवत्ता में गिरावट, चिड़चिड़ापन और आक्रामक व्यवहार, सामाजिक कौशलों में कमी और सबसे महत्वपूर्ण, शारीरिक गतिविधियों में गिरावट जैसी परिस्थितियां भी उत्पन्न हो सकती हैं।

असली समस्या बच्चे नहीं, जब माता-पिता स्वयं भोजन के दौरान फोन देखते हों, परिवार के सदस्य एक ही कमरे में बैठकर अलग-अलग स्क्रीन में खोए हों और बातचीत की जगह सोशल मीडिया ने ले ली हो, तब बच्चे से डिजिटल अनुशासन की अपेक्षा करना आत्मवंचना है। बच्चे उपदेश नहीं सुनते, वे व्यवहार की नकल करते हैं। आज पार्कों में बच्चों की संख्या घट रही है। किताबों की जगह वीडियो ले रहे हैं। संवाद की जगह नोटिफिकेशन ले रहे हैं और अनुभव की जगह स्क्रीन-आधारित उत्तेजना ले रही है। 

इसका समाधान तकनीक का विरोध नहीं, बल्कि उसके साथ संतुलन है। पहले विचार, फिर व्यवहार और अंतत: अपनी जीवनशैली में थोड़ा सा बदलाव हमारे बच्चों का बचपन बचा सकता है। भोजन के समय पूर्णत: स्क्रीन-मुक्त वातावरण। सोने से कम से कम एक घंटा पहले मोबाइल और टैबलेट बंद। प्रतिदिन कम से कम 1 घंटा खुली और ताजा हवा में कोई भी शारीरिक गतिविधि। बच्चों के साथ पुस्तक पढऩे और बातचीत का समय। माता-पिता द्वारा स्वयं डिजिटल अनुशासन का पालन। ये कदम छोटे हैं लेकिन इसके प्रभाव दूरगामी होते हैं।-डा. नीलम महेंद्र 
 

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