ऋण कूटनीति से विश्व को ‘निगल’ रहा चीन

Edited By ,Updated: 29 Jun, 2020 03:28 AM

china swallows the world due to debt diplomacy

पिछले 15-20 वर्षों में चीन का बहुत ज्यादा उदय हुआ है। इसका आर्थिक जादू ऋण तथा धन के बल पर चला है। बहुत ज्यादा निवेश कर इसने अपनी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ किया है और वैश्विक राजनीति के पटल पर अपनी पैठ बनाई है। यह ध्यान देने वाली बात है कि कुछ अनुमानों...

पिछले 15-20 वर्षों में चीन का बहुत ज्यादा उदय हुआ है। इसका आर्थिक जादू ऋण तथा धन के बल पर चला है। बहुत ज्यादा निवेश कर इसने अपनी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ किया है और वैश्विक राजनीति के पटल पर अपनी पैठ बनाई है। यह ध्यान देने वाली बात है कि कुछ अनुमानों के अनुसार आज चीन का कुल ऋण इसके सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) का 300 प्रतिशत है और वैश्विक ऋण का 15 प्रतिशत अनुमानित 40 ट्रिलियन अमरीकी डालर बैठता है। चीनी पहलू की एक और कहानी जिसे नकारा नहीं जा सकता। यह अन्य देशों में चीनी निवेश से संबंधित है। एक ऐसी रणनीति जो आर्थिक नीति से ज्यादा विदेश नीति द्वारा संचालित प्रतीत होती है। 

अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीच्यूट  एंड हैरीटेज फाऊंडेशन द्वारा तैयार किए डाटा के अनुसार पिछले 15 वर्षों में यह निवेश विशालकाय 2 ट्रिलियन अमरीकी डालर का है। 2 ट्रिलियन अमरीकी डालर साधारण तौर पर 2004 तथा 2019 के बीच भारत की कुल जी.डी.पी.के आकार में बढ़ौतरी के बराबर है। 2 ट्रिलियन अमरीकी डालर निवेश में, 1.2 ट्रिलियन डालर अमरीकी डालर पूंजी में निवेश हुआ तथा 829 बिलियन अमरीकी डालर निर्माण अनुबंधों के तौर पर चीन को प्राप्त हुआ जिन्हें कि विभिन्न देशों से प्राप्त किया गया। आम भाषा में ज्यादा विकसित देशों में निवेश का मुख्य स्रोत इक्विटी निवेश रहा जबकि निर्माण अनुबंध विकासशील देशों में फैला। 

यह दिलचस्प बात है कि चीन के  ऐसे निर्माण अनुबंध में सभी उच्च इस्लामिक तथा बहुल इस्लामिक देश थे। संचित रूप में यह देश 34 प्रतिशत निवेश का हिस्सा रहे हैं जिससे 282 बिलियन अमरीकी डालर प्राप्त हुआ। यह अनुबंध चीन के हक में रहे क्योंकि सभी मामलों में ऐसे अनुबंध चीनी कम्पनियों के पास थे। यह प्रतीत होता है कि इन अनुबंधों को चीनी कम्पनियों द्वारा मेजबान देशों में संचालित किया गया। इनमें चीनी संयंत्र तथा ज्यादातर चीनी श्रमबल शामिल है। चीन ने इन प्रोजैक्टों के लिए सभी लाभों, वेतन, करों तथा अन्य फायदों को संचालित किया। इन प्रोजैक्टों के लिए भुगतान को मेजबान देशों की बाहरी बैलेंस शीटों में रखा गया। 

मिसाल के तौर पर 2004 तथा 2019 के बीच 10 उच्च देशों के सम्मिलित बाहरी ऋण 5 गुणा बढ़ गए। इन बातों ने पाकिस्तान जैसे आर्थिक तौर पर कमजोर देश को दिवालिया होने के कगार पर खड़ा कर दिया है।  ऐसा भी पाया गया कि जो देश इन प्रोजैक्टों से संबंधित ऋणों को देने में असमर्थ रहे, उन देशों ने चीन के आगे अपनी राष्ट्रीय  सम्पदाओं को खो दिया। मिसाल के तौर पर श्रीलंका (कुल निवेश 13.8 बिलियन अमरीकी डालर का जिसमें 10.2 बिलियन अमरीकी डालर निर्माण अनुबंधों के माध्यम से आए) ने अपने महत्वपूर्ण हमबनटोटा बंदरगाह को 2017 में चीन के लिए खो दिया। 

2019 में ऐसी रिपोर्टें आईं कि कीनिया प्रतिष्ठित ममबासा बंदरगाह को चीन के हाथों खो देगा जोकि ऋण न उतारने पर उसे मुआवजे के तौर पर ऐसा करना पड़ सकता है। ऐसी ही रिपोर्टें इक्वाडोर से भी उभर कर आई हैं जिसमें कहा गया है कि  ऐसे ही कारणों से अमेजन वर्षावनों का एक-तिहाई हिस्सा चीनी हाथों में चला जाएगा। पाकिस्तान ने चीन के आगे घुटने टेके हुए हैं। वह बैल्टवे प्रोजैक्टों के लिए 90 बिलियन अमरीकी डालर का चीनी देनदार है। पाकिस्तान को इन सब भुगतानों को 2037-38 से पहले चुकाना है। 

पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक कंगाली की राह पर है और हमें नहीं लगता कि वह इतनी बड़ी भारी-भरकम राशि का भुगतान इन सालों तक कर पाएगा। अब यह देखना महत्वपूर्ण है कि वह कौन-कौन सी महत्वपूर्ण संपदा चीन के हाथों में सौंप देगा और इसका भारतीय रक्षा तथा वाणिज्य हितों पर क्या असर पड़ेगा। अपनी इसी ऋण कूटनीति के माध्यम से चीन ने इस्लामिक देशों को अपनी पकड़ में ले लिया है। आखिर ऐसे देश चीन की कथित ज्यादतियों जोकि मुस्लिम जनसंख्या के खिलाफ हैं, को लेकर क्यों चुप्पी साधे हैं। चीन धीरे-धीरे पूरे विश्व को अपनी इस ऋण कूटनीति के चलते निगल रहा है।-अनिरुद्ध लिमये

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