चिट्टा, ड्रग्स और युवा : संकट को अब और छिपाया नहीं जा सकता

Edited By Updated: 06 Jan, 2026 04:31 AM

chitta drugs and youth the crisis can no longer be hidden

मैं अभी हिमाचल से वापस आई हूं और युवाओं में नशे के दुरुपयोग के कारण होने वाली मौतों की संख्या देखकर स्तब्ध हूं। भारत के बड़े हिस्सों में, विशेष रूप से उत्तरी बैल्ट में, नशे के कारण आत्महत्या, ओवरडोज और अपराध बढ़ रहे हैं। हमारे सामाजिक ताने-बाने को...

मैं अभी हिमाचल से वापस आई हूं और युवाओं में नशे के दुरुपयोग के कारण होने वाली मौतों की संख्या देखकर स्तब्ध हूं। भारत के बड़े हिस्सों में, विशेष रूप से उत्तरी बैल्ट में, नशे के कारण आत्महत्या, ओवरडोज और अपराध बढ़ रहे हैं। हमारे सामाजिक ताने-बाने को खा रही सबसे विनाशकारी ताकतों में से एक, चिट्टा और युवाओं में नशीली दवाओं के दुरुपयोग के इर्द-गिर्द एक खतरनाक सन्नाटा छाया हुआ है। चिट्टा अब केवल सीमावर्ती राज्यों या विशिष्ट इलाकों तक सीमित नहीं है। गांवों से शहरों, स्कूल जाने वाले किशोरों से लेकर कॉलेज के छात्रों और बेरोजगार युवाओं तक इसकी पहुंच खतरनाक रूप से बढ़ गई है। चिट्टा चुपचाप शरीर में प्रवेश करता है, स्वास्थ्य को नष्ट करता है, परिवार की बचत को लील जाता है और युवाओं से उनकी महत्वाकांक्षा, अनुशासन और उम्मीद छीन लेता है। नशीली दवाओं के दुरुपयोग से संबंधित किसी न किसी कारण से हर दिन युवा लड़के-लड़कियां मर रहे हैं।

युवाओं में नशे का सेवन वास्तविकता में, एक ‘पलायन’ है, बेरोजगारी, शैक्षणिक दबाव, टूटे हुए घरों, अकेलेपन, अवास्तविक उम्मीदों और सामाजिक तुलना से बचने का एक रास्ता। कई युवा अपने बेचे गए सपनों और उनसे छीनी गई हकीकतों के बीच फंसा हुआ महसूस करते हैं। ड्रग्स उन्हें अस्थायी राहत, नियंत्रण का एक झूठा एहसास और किसी समूह से जुडऩे का बोध कराते हैं। लेकिन यह राहत अल्पकालिक होती है, जबकि इसके बाद के प्रभाव स्थायी होते हैं। शारीरिक रूप से, लत शरीर को कमजोर करती है, अंगों को नुकसान पहुंचाती है और जीवन को छोटा कर देती है। मानसिक रूप से यह अवसाद, चिंता, आक्रामकता और चरम मामलों में आत्महत्या की ओर ले जाती है। सामाजिक रूप से, नशे के आदी लोगों को हाशिए पर धकेल दिया जाता है। अपराध बढ़ते हैं, परिवार बिखर जाते हैं और समुदाय विश्वास खो देते हैं। आॢथक रूप से, घर बर्बाद हो जाते हैं क्योंकि शिक्षा, स्वास्थ्य या खेती के लिए रखा गया पैसा नशे और बार-बार इलाज के प्रयासों में बह जाता है।

फिर भी, प्रत्यक्ष क्षति के बावजूद, प्रतिक्रिया अपर्याप्त बनी हुई है। इसका एक प्रमुख कारण सरकारों, राजनेताओं और नौकरशाही द्वारा समस्या के पैमाने को स्वीकार करने में अनिच्छा है। आंकड़ों को कम बताया जाता है। सर्वेक्षणों में देरी की जाती है। डाटा को चुनिंदा तरीके से प्रस्तुत किया जाता है। आंकड़े छिपाने से लत कम नहीं होती, यह केवल प्रतिक्रिया को कमजोर करता है। सटीक डाटा के बिना, नीति केवल अनुमान बनकर रह जाती है। संसाधनों का गलत आबंटन होता है। पुनर्वास केंद्र अपर्याप्त बने हुए हैं। सरकार की भूमिका केवल गिरफ्तारियों और जब्ती तक सीमित नहीं होनी चाहिए। नशा पहले एक स्वास्थ्य और सामाजिक मुद्दा है तथा बाद में कानून-व्यवस्था का। सरकारों को जागरूकता अभियानों में भारी निवेश करना चाहिए, जो युवाओं की भाषा में बात करें, न कि केवल सरकारी नारों में। स्कूलों और कॉलेजों में नशीली दवाओं के दुरुपयोग, मानसिक स्वास्थ्य और मुकाबला करने के कौशल पर संरचित, अनिवार्य कार्यक्रम होने चाहिएं। नशामुक्ति केंद्र विनियमित, किफायती और सुलभ होने चाहिएं। उपचार केवल ‘विषहरण’ के साथ समाप्त नहीं होना चाहिए, पुनरावृत्ति को रोकने के लिए परामर्श, कौशल विकास, नौकरी की नियुक्ति और दीर्घकालिक अनुवर्ती कार्रवाई महत्वपूर्ण हैं। ठीक हुआ व्यक्ति उद्देश्य या समर्थन के बिना हमेशा वापस नशे में गिरने के जोखिम में रहता है। 

राजनेताओं को भी राजनीतिक पतन के अपने डर को त्यागना चाहिए। समस्या को स्वीकार करना नेतृत्व को कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत बनाता है। जो नेता ईमानदारी से बात करेंगे, पारदर्शिता से धन आबंटित करेंगे और नागरिक समाज को शामिल करेंगे, वे विश्वास अर्जित करेंगे, खोएंगे नहीं। नौकरशाही को भी फाइल वर्क और सांख्यिकी से आगे बढऩा होगा।  हालांकि, समाज को खुद अपने पाखंड का सामना करना होगा। सुधार में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक ‘कलंक’ है। परिवार शर्म के डर से नशे के आदी सदस्यों को छिपाते हैं। पड़ोसी फुसफुसाते हैं, मजाक उड़ाते हैं या अलग-थलग कर देते हैं। विवाह की संभावनाएं बर्बाद हो जाती हैं। यह सामाजिक दंड अक्सर नशेडिय़ों को नशों के सेवन से बाहर निकालने की बजाय और गहरा धकेल देता है। नशे की लत को कलंक के रूप में नहीं, बल्कि सामूहिक समर्थन की आवश्यकता वाले संकट के रूप में देखा जाना चाहिए। 

धार्मिक संस्थानों, सामुदायिक नेताओं और पंचायतों की इसमें शक्तिशाली भूमिका है। उनके शब्दों का वजन होता है। यदि वे ङ्क्षनदा की बजाय करुणा और चुप्पी की बजाय जागरूकता को बढ़ावा देते हैं, तो प्रभाव परिवर्तनकारी हो सकता है। पूर्व-नशेड़ी, जो सफलतापूर्वक ठीक हो चुके हैं, उन्हें अपनी यात्रा खुलकर सांझी करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। उनकी कहानियां मिथकों को तोड़ती हैं, आशा जगाती हैं और डर को कम करती हैं। मीडिया को भी जिम्मेदारी से काम करना चाहिए। सनसनीखेज सुर्खियां और नैतिक निर्णय बहुत कम लाभ पहुंचाते हैं।

भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी होने पर गर्व करता है। लेकिन अगर युवा नशे की भेंट चढ़ गए तो यह जनसांख्यिकीय लाभ जल्दी ही जनसांख्यिकीय आपदा में बदल सकता है। चिट्टा और ड्रग्स केवल व्यक्तियों को नष्ट नहीं कर रहे, वे राष्ट्र की भविष्य की कार्यशक्ति, नेतृत्व और सामाजिक स्थिरता को खत्म कर रहे हैं। वे एक पूरी पीढ़ी को समाप्त कर रहे हैं। यह संकट ईमानदारी, सहानुभूति और तात्कालिकता की मांग करता है। केवल जब सत्य इंकार की जगह लेगा और करुणा कलंक की जगह, तभी हम उस पीढ़ी को बचाने की उम्मीद कर सकते हैं, जो चुपचाप ओझल होती जा रही है।-देवी एम. चेरियन

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