मीडिया मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले का स्वागत

Edited By Updated: 18 Jun, 2026 03:18 AM

delhi high court s decision in media case welcomed

न्यूजक्लिक, जो एक खोजी डिजिटल न्यूज चैनल है और सरकार की आंखों में खटक रहा था, से संबंधित मामलों में दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा प्रवर्तन निदेशालय (ई.डी.) और दिल्ली पुलिस की कड़ी आलोचना ने स्वतंत्र मीडिया को जश्न मनाने का एक दुर्लभ अवसर दिया है।

न्यूजक्लिक, जो एक खोजी डिजिटल न्यूज चैनल है और सरकार की आंखों में खटक रहा था, से संबंधित मामलों में दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा प्रवर्तन निदेशालय (ई.डी.) और दिल्ली पुलिस की कड़ी आलोचना ने स्वतंत्र मीडिया को जश्न मनाने का एक दुर्लभ अवसर दिया है। डिजिटल प्लेटफॉर्म और इसके संस्थापक, वरिष्ठ पत्रकार प्रबीर पुरकायस्थ तथा अन्य वरिष्ठ प्रबंधन और पत्रकारों को 2020 में प्रवर्तन निदेशालय, दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा और आयकर विभाग जैसी एजैंसियों के माध्यम से सरकार की पूरी ताकत का सामना करना पड़ा। एजैंसी और कर्मचारियों पर कठोर गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, धन शोधन निवारण अधिनियम और अवैध विदेशी फंङ्क्षडग के तहत मामले दर्ज किए गए।

इन एजैंसियों ने उन परिसरों पर छापा मारा, जहां से डिजिटल प्लेटफॉर्म काम कर रहा था और सभी कर्मचारियों के पर्सनल कम्प्यूटर, लैपटॉप और मोबाइल फोन सहित सभी उपकरण जब्त कर लिए। उनके परिसरों की तलाशी ली गई और कई जब्तियां की गईं। छापे अगस्त 2020 में सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा अग्रेषित एक शिकायत के बाद मारे गए थे। दिल्ली पुलिस की आॢथक अपराध शाखा ने न्यूजक्लिक के खिलाफ अवैध विदेशी फंडिंग के आरोपों पर एक प्राथमिकी (एफ.आई.आर.) दर्ज की। इसके बाद, सितंबर 2020 में, ई.डी. ने धन शोधन निवारण अधिनियम (पी.एम.एल.ए.) के तहत न्यूज पोर्टल के खिलाफ मामला दर्ज किया। इसके बाद शुरू हुई कानूनी लड़ाइयों, जिसमें यू.ए.पी.ए. के तहत इसके संपादक की हिरासत के खिलाफ लड़ाई भी शामिल थी, के कारण वैबसाइट बंद हो गई और डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए काम कर रहे कई पत्रकारों को नौकरी से निकाल दिया गया। यहां तक कि कनिष्ठ कर्मचारियों को भी 6 साल तक भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ा, इससे पहले कि न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्ण द्वारा दिया गया फैसला एजैंसियों को शर्मिंदा कर दे।

उन्होंने न केवल ई.ओ.डब्ल्यू. द्वारा दर्ज प्राथमिकी को रद्द किया, बल्कि एजैंसियों को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि मामला आई.पी.सी. के तहत कोई संज्ञेय अपराध प्रकट नहीं करता, सिवाय ‘आपराधिक साजिश होने के केवल कोरे दावों के’। फैसला सुनाते हुए, न्यायमूर्ति कृष्ण ने कहा कि दिल्ली पुलिस की ई.ओ.डब्ल्यू. द्वारा पंजीकृत प्राथमिकी का जारी रहना ‘दुर्भावनापूर्ण’ था और ‘कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग’ के अलावा कुछ नहीं था। अदालत ने ई.डी. के धन शोधन मामले को भी यह देखते हुए रद्द कर दिया कि यह उन्हीं आरोपों पर आधारित था, जो दिल्ली पुलिस द्वारा दर्ज प्राथमिकी का आधार थे। तर्क स्पष्ट था। एक बार जब आधारभूत अपराध ही रद्द हो गया, तो पी.एम.एल.ए. के तहत ई.डी. द्वारा पंजीकृत मामला भी रद्द कर दिया गया। अदालत ने अपने शब्दों में कोई नरमी नहीं बरती और कहा कि ई.डी. की कार्रवाई ‘न केवल दुर्भावनापूर्ण थी, बल्कि याचिकाकत्र्ताओं की स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता पर एक मनमाना हमला और शक्तियों का दुरुपयोग भी थी’।

प्राथमिकी और पी.एम.एल.ए. के तहत मामले के दर्ज होने से लेकर हाल के हाई कोर्ट के फैसले तक के 6 वर्षों में, दिल्ली पुलिस और ई.डी. की कार्रवाई से सीधे प्रभावित लोगों ने महत्वपूर्ण तनाव सहा है। यह पैटर्न एक गहरी संस्थागत गिरावट को उजागर करता है। एक समय फल-फूल रहे, कानून का पालन करने वाले न्यूज पोर्टल को उसके अस्तित्व पर ही बिना किसी उकसावे के, निरंतर हमले का सामना करना पड़ा, जिसके कारण उसे अपने कामकाज को काफी कम करने और बाद में पूरी तरह से बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसे केवल एक आऊटलैट पर हमले के रूप में नहीं, बल्कि ‘फोर्थ एस्टेट’ (लोकतंत्र का चौथा स्तंभ), विशेष रूप से स्वतंत्र मीडिया, पर हमले के रूप में देखा जाना चाहिए। पत्रकारों को जनहित में काम करने से रोकने के लिए प्रवर्तन एजैंसियों द्वारा किए गए मनमाने, लक्षित उपाय एक दबाव का माहौल पैदा करते हैं, जो किसी भी लोकतंत्र के लिए हानिकारक है।

भारतीय पत्रकारों के पास विशेष संवैधानिक विशेषाधिकारों का अभाव है, अमरीका के विपरीत, जहां पहला संशोधन स्पष्ट रूप से प्रैस को सुरक्षा प्रदान करता है। भारत में, प्रैस की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(1)(ए) की व्यापक गारंटी से उत्पन्न होती है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुरक्षित करती है और लोकतंत्र का आधार है। वह स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है, अधिकारी कानून तोडऩे वाले मीडिया के खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं। यदि न्यूजक्लिक ने मानहानिकारक सामग्री प्रकाशित की या गोपनीयता कानूनों का उल्लंघन किया, तो उपाय मौजूद हैं -मानहानि कानून, आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, अदालतें और प्रैस काऊंसिल  लेकिन दावों के लिए सावधानीपूर्वक जांच और न्यायिक जांच के लिए उपयुक्त सबूतों की आवश्यकता होती है, न कि अंधेरे में तीर चलाने वाली एजैंसियों की।

विडंबना यह है कि स्वतंत्र मीडिया की आवाज को दबाने का काम, चाहे उदार प्रोत्साहन देकर या अपनी विभिन्न एजैंसियों के माध्यम से डंडा चलाकर, उन दलों और नेताओं द्वारा किया जा रहा है जो आपातकाल के काले दिनों के दौरान प्रैस की स्वतंत्रता के लिए लडऩे में सबसे आगे थे। यह देखा जाना बाकी है कि क्या कुछ अधिकारी या वे लोग, जिनसे इन अधिकारियों ने एक न्यूज चैनल को झूठे मामले में फंसाने के आदेश लिए थे, उन्हें उनके कृत्यों के लिए दंडित किया जाता है? उन्हें अनुकरणीय दंड दिया जाना चाहिए ताकि भविष्य में सत्ता का ऐसा घोर दुरुपयोग न हो। हालांकि, खेदजनक रूप से, ऐसा होने की संभावना बहुत कम है।-विपिन पब्बी

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