Edited By ,Updated: 01 Jan, 2026 05:35 AM

सभी पाठकों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं। समय एक जीवंत ताने-बाने की तरह है, जहां अतीत, वर्तमान और भविष्य एक-दूसरे से निरंतर संवाद करते हैं। मेरा आज का कॉलम भी अनायास ही पिछले लेख की निरंतरता बन गया है-जहां 2025 की चर्चाएं, आशंकाएं और अपेक्षाएं नए...
सभी पाठकों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं। समय एक जीवंत ताने-बाने की तरह है, जहां अतीत, वर्तमान और भविष्य एक-दूसरे से निरंतर संवाद करते हैं। मेरा आज का कॉलम भी अनायास ही पिछले लेख की निरंतरता बन गया है-जहां 2025 की चर्चाएं, आशंकाएं और अपेक्षाएं नए वर्ष में प्रवेश कर रही हैं। पिछले सप्ताह प्रकाशित मेरे लेख पर व्यक्तिगत प्रतिक्रिया देते हुए मेरी एक आई.ए.एस. मित्र, जो मुख्य सचिव पद से सेवानिवृत्त हो चुकी हैं, ने अपने प्रशिक्षण काल की एक स्मृति मुझसे सांझी की। उनके मुताबिक, अकादमी के भीतर दिसम्बर के दिनों में ईसा मसीह के जन्म से संबंधित ‘क्रिसमस कैरल’ गाना एक सहज सांस्कृतिक गतिविधि थी। उनकी शिकायत थी कि मैंने विश्व ङ्क्षहदू परिषद के उस रुख का जिक्र नहीं किया, जिसमें वे क्रिसमस आयोजनों का विरोध करते हैं।
नि:संदेह, उनकी सद्भावना सराहनीय है लेकिन यह एक गहरे सांस्कृतिक असंतुलन की ओर भी इशारा करती है। मजहबी बंधनों से परे, जिस संस्थागत तत्परता और उत्साह का प्रदर्शन क्रिसमस पर होता है, क्या वही वातावरण कृष्ण जन्माष्टमी, रामनवमी, हनुमान जयंती या सिख गुरुओं के गुरुपर्वों पर भी देखने को मिलता है? क्या सरकारी या अर्ध-सरकारी संस्थानों में भजन या शबद कीर्तन भी उसी सहजता से होते हैं, जैसी क्रिसमस कैरल गाने में दिखाई देती है? अक्सर इसका उत्तर ‘नहीं’ में ही मिलता है। यही विरोधाभास भारत में पंथनिरपेक्षता की व्यवहारिक समझ की दरारों को उजागर करता है। इसकी जड़ें उस मानसिक औपनिवेशवाद में मिलती हैं, जिसमें अपनी पहचान, संस्कृति और परम्परा के प्रति उदासीनता और हीन-भावना रखने का चिंतन होता है। सच्चा ‘सह-अस्तित्व’ तभी संभव है, जब सभी परम्पराओं को एक जैसा सम्मान और स्थान मिले। हाल ही में देश के कुछ हिस्सों में क्रिसमस आयोजनों को निशाना बनाने की चिंताजनक घटनाएं सामने आईं। हिंदू परम्पराओं के नाम पर की गई कोई भी तोडफ़ोड़ या धमकी पूरी तरह निंदनीय है और यह उस कालजयी सभ्यता के मूल स्वभाव के विरुद्ध है, जिसमें सह-अस्तित्व और बहुलतावाद का दर्शन है।
समग्र हिंदू समाज के साथ ईसाई पादरियों के एक वर्ग और स्वयंभू वाम-उदारवादियों को भी आत्मचिंतन करना चाहिए। केवल इन्हीं घटनाओं को अंतर्राष्ट्रीय मंचों तक ले जाना, भारत के साथ ङ्क्षहदू समाज को असहिष्णु और उत्पीड़क बताना, चयनात्मक आक्रोश का उदाहरण है। जब अलग-थलग घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है और दुनिया के अन्य हिस्सों में मजहबी स्वतंत्रता पर कहीं अधिक गंभीर हमलों पर चुप्पी साध ली जाती है, तो इससे सौहार्द नहीं, बल्कि अविश्वास पैदा होता है। गत 25 दिसम्बर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली स्थित कैथेड्रल चर्च में आयोजित क्रिसमस से जुड़े कार्यक्रम में शामिल हुए। वहां प्रेम, शांति और करुणा पर उनका वक्तव्य भारत की सभ्यतागत परंपरा के अनुरूप है। हालिया वर्षों में ईस्टर, कैथोलिक बिशप सम्मेलन और प्रधानमंत्री आवास पर क्रिसमस कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी इस निरंतरता को दर्शाती है। जिस समावेशी भारतीय सभ्यता ने सदियों पहले अपने-अपने देशों में मजहबी यातनाओं के शिकार यहूदियों, पारसियों, सीरियाई ईसाइयों के साथ मुस्लिम व्यापारियों को शरण दी, वहां उस क्रिसमस के प्रति वैरभाव रखना, जिसकी प्रासंगिकता पर मध्यकाल तक सवाल उठ चुके हों, दुखद है। इसका एक और परिप्रेक्ष्य है, जिसे जानना भी आवश्यक है। हालिया वर्षों में बढ़ते जिहादी खतरों के कारण यूरोप के कई ईसाई-बहुल देशों-फ्रांस, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया सहित में क्रिसमस और नव वर्ष समारोह सीमित कर दिए गए या उन्हें कड़ी सुरक्षा में समेट दिया गया। भारत में, सदियों की जिहादी हिंसा और वैचारिक टकराव के बावजूद, ऐसी स्थिति नहीं है।
भारत में ईसाइयत का आगमन 3 चरणों में हुआ। दूसरा चरण हिंसक रहा, जोकि वर्ष 1498 में वास्को डी गामा के आगमन और पुर्तगाली साम्राज्यवाद के साथ शुरू हुआ। 16वीं शताब्दी के मध्य में फ्रांसिस जेवियर की क्रूरता और ‘गोवा इनक्विजिशन’ में मंदिरों का ध्वंस, जबरन मतांतरण और सामाजिक दमन हुआ। वैटिकन का निर्देश न मानने पर सीरियाई ईसाइयों को भी प्रताडि़त किया गया। इतिहासकारों के अनुसार, गोवा में जहां कभी मंदिर हुआ करते थे, वहां चर्च बना दिए गए, ङ्क्षहदू पुरोहितों को निष्कासित करके स्थानीय तीज-त्यौहारों पर रोक लगा दी गई। रोमन कैथोलिक चर्च ने कनाडा, फ्रांस और आयरलैंड जैसे देशों में अपने मजहब प्रेरित ऐतिहासिक दुराचारों और पादरियों द्वारा लाखों बच्चों-महिलाओं के यौन-शोषण पर सार्वजनिक रूप से कई बार माफी मांगी है। प्रश्न यह है कि क्या नैतिक मानदंड सभी पर समान रूप से लागू होंगे? जो विकृत समूह ङ्क्षहदू समाज से हर घटना पर सामूहिक माफी की मांग करता है, क्या वे वैटिकन और चर्च से भारत में मध्यकालीन और औपनिवेशिक अत्याचारों के लिए क्षमा-याचना और आज भी जारी आक्रामक मतांतरण उपक्रमों पर विराम की मांग करने को तैयार हैं?
किसी सभ्यता का भविष्य चयनात्मक आक्रोश से नहीं, बल्कि निष्पक्ष आत्ममंथन से सुरक्षित होता है। भारत का चिर-परिचित अनादिकालीन बहुलतावाद तभी अक्षुण्ण रहेगा, जब सभी ऐतिहासिक अपराधों की निंदा बिना पक्षपात के हो और उसे न्याय की कसौटी पर कसा जाए। क्या ऐसा संभव है?-बलबीर पुंज