Edited By ,Updated: 18 Mar, 2026 05:22 AM

जब 2025 में मुंबई के रहने वाले पार्थ नागदा के पिता को दिल की बीमारी के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया, तो उन्हें खर्च की ङ्क्षचता नहीं थी, क्योंकि उनके फैमिली फ्लोटर प्लान में उनके माता-पिता भी शामिल थे। लेकिन, उनकी हैल्थ इंश्योरैंस कंपनी ने उनका...
जब 2025 में मुंबई के रहने वाले पार्थ नागदा के पिता को दिल की बीमारी के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया, तो उन्हें खर्च की ङ्क्षचता नहीं थी, क्योंकि उनके फैमिली फ्लोटर प्लान में उनके माता-पिता भी शामिल थे। लेकिन, उनकी हैल्थ इंश्योरैंस कंपनी ने उनका क्लेम यह कहकर रिजैक्ट कर दिया कि उन्होंने पहले से मौजूद किडनी की क्रोनिक बीमारी (सी.के.डी.) के बारे में जानकारी नहीं दी थी। नागदा बताते हैं, ‘‘मेरे पिता को तब तक किडनी से जुड़ी कोई समस्या नहीं थी। अस्पताल में भर्ती होते समय नेफ्रोलॉजिस्ट ने बस उनके क्रिएटिनिन लैवल (जो किडनी के काम करने का एक संकेत है) के ज्यादा होने की बात कही थी।’’ बाद में उन्हें पता चला कि डिस्चार्ज के समय ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर ने गलती से डिस्चार्ज समरी में ‘सी.के.डी.’ लिख दिया था, जिसकी वजह से उनका क्लेम रिजैक्ट हो गया।
नागदा का केस संभालने वाले इंश्योरैंस कंसल्टैंट मयंक गोसर बताते हैं, ‘‘नेफ्रोलॉजिस्ट के नोट्स में ‘सी.के.डी.’ के आगे सिर्फ एक सवालिया निशान था, जो इस बात का संकेत था कि उन्हें इस बारे में पक्का पता नहीं था लेकिन रैजिडैंट डॉक्टर ने इसे पक्के तौर पर लिख दिया। पहले से सी.के.डी. की कोई हिस्ट्री न होने के बावजूद, उनका क्लेम रिजैक्ट हो गया।’’ आखिर में, नागदा और गोसर ने सोशल मीडिया का सहारा लिया। गोसर आगे बताते हैं, ‘‘तब जाकर इंश्योरैंस कंपनी ने इस मामले पर ध्यान दिया और क्लेम को दोबारा खोला गया और अंतत: क्लेम पास हो गया।’’
नागदा की तरह ही, मनीष श्रीवास्तव को भी अपनी पत्नी की डिस्चार्ज समरी में गलत जानकारी लिखे होने की वजह से परेशानी उठानी पड़ी। श्रीवास्तव बताते हैं, ‘‘उनकी पत्नी के घुटने में सूजन थी और उन्हें बुखार था, जिसके लिए उनका इलाज दिल्ली के एक अस्पताल में हुआ। मैंने अपनी कॉर्पोरेट पॉलिसी के तहत क्लेम फाइल किया और उसका पेमैंट भी हो गया। लेकिन, अस्पताल ने आगे के इलाज और कुछ जांच करवाने की सलाह दी, जिसके लिए हमने लखनऊ जाने का फैसला किया।’’ श्रीवास्तव बताते हैं, ‘‘जब मैंने लखनऊ के अस्पताल में हुए आगे के इलाज के लिए रीइम्बर्समैंट क्लेम फाइल किया, तो इंश्योरैंस कंपनी ने उनकी हैल्थ हिस्ट्री में ‘एच.टी.एन’ (हाई ब्लड प्रैशर) लिखा हुआ देखा, और यह कहकर उनका क्लेम रिजैक्ट कर दिया कि उन्होंने पहले से मौजूद हाई ब्लड प्रैशर की बीमारी के बारे में जानकारी नहीं दी थी। जबकि, उन्हें यह बीमारी कभी थी ही नहीं।’’
अस्पताल से एक चिट्ठी मिलने के बावजूद, जिसमें टाइपिंग की गलती की बात मानी गई थी, इंश्योरैंस कंपनी ने क्लेम देने से मना कर दिया। आखिरकार, शिकायत निवारण विभाग को एक औपचारिक चिट्ठी भेजने और कई बार फॉलो-अप करने के बाद, उन्होंने क्लेम का कुछ हिस्सा दे दिया। ऐसी गलतियां तब होती हैं, जब अस्पताल में काम करने वाले डॉक्टर कुछ जानकारियां गलत बता देते हैं। इंश्योरेंस एक्सपर्ट का कहना है कि मरीज-पॉलिसीहोल्डर अक्सर अपनी डिस्चार्ज समरी को ध्यान से नहीं देखते, क्योंकि मैडिकल की तकनीकी भाषा समझना आसान नहीं होता, जिसका असर क्लेम के निपटारे पर पड़ सकता है।
अस्पताल में भर्ती होने की चैकलिस्ट : अस्पताल में भर्ती होते समय, साथ आए लोगों और अगर मुमकिन हो तो मरीजों को भी, ज्यादा सावधान रहना चाहिए। बेशक डॉट ऑर्ग के को-फाऊंडर महावीर चोपड़ा कहते हैं, ‘‘डॉक्टर शुरू में कुछ रिकॉर्ड बनाते हैं, जिनमें भर्ती के समय मिली जानकारियों का ब्योरा होता है। आप इन रिकॉर्ड की कॉपी मांगकर उन्हें देख सकते हैं, ताकि गलतियां पकड़ में आ जाएं और उन्हें समय पर ठीक किया जा सके।’’ सबसे अच्छा यही होगा कि कोई ऐसा व्यक्ति, जिसे मरीज की मैडिकल हिस्ट्री के बारे में पता हो, वह डॉक्टरों को सारी जानकारियां दे। चोपड़ा आगे कहते हैं, ‘‘अपनी सभी मैडिकल फाइलें साथ रखना सबसे सही तरीका है। इससे गलतियों या मैडिकल हिस्ट्री को गलत तरीके से बताने का खतरा कम हो जाता है।’’
अपनी तरफ से, पॉलिसीधारकों को पॉलिसी खरीदते समय अपनी मौजूदा स्वास्थ्य स्थितियों के बारे में पूरी तरह से ईमानदार रहना चाहिए। आखिर, सबसे अच्छा इलाज पाने के लिए उन्हें डॉक्टरों को अपनी मैडिकल हिस्ट्री बतानी ही होगी। नहीं तो, छुपाई गई स्वास्थ्य जानकारी आपके क्लेम में दिक्कत खड़ी कर सकती है। आपको अपनी पिछली डायग्नोस्टिक रिपोर्ट का रिकॉर्ड भी रखना चाहिए।-प्रीति कुलकर्णी