बच्चे के जन्म पर पिता को भी अवकाश मिले

Edited By Updated: 24 Mar, 2026 05:32 AM

fathers too should receive leave upon the birth of a child

हाल  ही में उच्चतम न्यायालय मातृत्व अवकाश से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। मामला गोद लेने के मामले में अवकाश का था। भारत में मातृत्व अवकाश 6 महीने का है। दुनिया में यह सबसे अधिक अवधि है। याचिका में 1961 के मैटॢनटी एक्ट की धारा 5(4) को चुनौती...

हाल  ही में उच्चतम न्यायालय मातृत्व अवकाश से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। मामला गोद लेने के मामले में अवकाश का था। भारत में मातृत्व अवकाश 6 महीने का है। दुनिया में यह सबसे अधिक अवधि है। याचिका में 1961 के मैटॢनटी एक्ट की धारा 5(4) को चुनौती दी गई थी। याचिका में कहा गया था कि गोद लेने की प्रक्रिया तक में 3 महीने से अधिक का समय लग जाता है। ऐसे में बच्चे की उम्र 3 महीने से अधिक बढ़ सकती है। ऐसे में यदि कामकाजी मां को छुट्टी ही नहीं मिलेगी, तो वह अपने शिशु की देखभाल कैसे करेगी?  ऐसी तमाम बातों का संज्ञान लेते हुए अदालत ने 2024 में सरकार से जवाब मांगा था। इसके अनुसार, यदि कोई महिला बच्चा गोद लेती है, तो उसे 12 सप्ताह की छुट्टी तभी मिलेगी, जब बच्चा 3 महीने से कम उम्र का हो। जबकि मातृत्व अवकाश के तहत महिला को  प्रसव से 6 हफ्ते पहले और 6 हफ्ते बाद तक की छुट्टी का प्रावधान है। ऐसे में गोद लेने वाली मां को ऐसी सुविधा से वंचित क्यों किया जाए, क्योंकि बच्चे की देखभाल उसे ही करनी होगी। यदि मां अकेली है तो कठिनाई और भी है।

गोद लेने वाली मां की छुट्टियों पर बात करते हुए अदालत ने यह भी कहा कि सरकार को पितृत्व अवकाश के लिए भी कानून बनाना चाहिए। बात भी सही है। यदि बच्चे को पालने की जिम्मेदारी माता-पिता दोनों की है, तो मां के साथ-साथ पिता को भी छुट्टी मिलनी ही चाहिए। ऐसा क्यों मान लिया गया है कि बच्चे की देखभाल में पिता की कोई भूमिका ही नहीं होती, इसलिए उसे छुट्टी की कोई जरूरत नहीं। अदालत ने इस मसले पर सुनवाई करते हुए यह भी कहा कि बच्चे को पालने में मां की भूमिका महत्वपूर्ण होती है लेकिन पिता की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता। अब वह जमाना भी नहीं रहा जब परिवार बड़े होते थे। बच्चे के जन्म या उसे गोद लेने के बाद उसे पालने की जिम्मेदारी सिर्फ माता-पिता की ही नहीं होती थी। घर के अन्य सदस्य, जैसे दादा-दादी, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, उनके बाल-बच्चे, यहां तक कि अड़ोसी-पड़ोसी भी, सभी शिशु को पालने में मदद करते थे। महानगरों में ऐसी मुश्किलें बहुत दिखाई देती हैं, जहां युवा दम्पति प्राय: अकेले रहते हैं। इसका एक कारण तो यह है कि वे अपने-अपने शहर, गांव  से दूर यहां रोटी कमाने आए हैं। इसके अलावा बहुत से परिवार किसी न किसी कारणवश अपने परिवार से अलग रहते हैं।

अब भी देश में इतनी संख्या में डे केयर सैंटर नहीं हैं, जिनके भरोसे बच्चों को पाला जा सके। इसके अलावा यह भी है कि बहुत से डे केयर सैंटर बहुत छोटे बच्चों को अपने यहां नहीं रखते। तब बच्चे की 24 घंटे देखभाल की जिम्मेदारी माता-पिता पर ही आ जाती है। यदि माता-पिता नौकरी करते हैं तो छुट्टी लेना भी टेढ़ी खीर होती है। फिर गोद लेने के बाद तमाम तरह की मुश्किलें खड़ी होती हैं। बच्चे को नए वातावरण में पालना, उसे सुरक्षा देना, उसकी सही देखभाल करना आदि बहुत-सी बातें ऐसी हैं, जिन्हें माता-पिता को मिलकर उठाना पड़ता है। 
जिस दफ्तर में लम्बे समय तक काम किया, उसमें दो-तीन लड़कियां ऐसी थीं, जो सिंगल थीं लेकिन उन्होंने बच्चों को गोद लिया हुआ था। वे अक्सर अपनी मुश्किलों के बारे में बताया करतीं। कई बार इस बात पर परेशान भी होतीं कि कहीं बच्चा गोद लेकर कोई गलती तो नहीं की, क्योंकि दफ्तर की मारामारी को झेलने के बाद बच्चे की देखभाल करना, वह भी सिर्फ अपने बल पर, एक कठिन काम था।  इनमें से सभी ने लड़कियां गोद ली थीं। 

लड़कियों के मामले में अपने समाज में एक बड़ा सच तो यह है ही कि वे ज्यादा असुरक्षित हैं। ऐसे में ये स्त्रियां छुट्टी होने के बाद, बिना रुके घर की तरफ भागती थीं।  यदि कोई जरूरी मीटिंग हो गई तो इनकी चिंता का कोई ठिकाना नहीं रहता था, क्योंकि किसी को डे केयर सैंटर के बंद होने का डर रहता, तो किसी को घरेलू सहायिका के चले जाने का। आपको याद होगा कि एक जमाने में अविवाहित लड़कियां बच्चा गोद नहीं ले सकती थीं, बाद में अदालत के हस्तक्षेप के बाद ही इस कानून में सुधार किया गया। 

एक परिवार ऐसा भी था, जहां पति-पत्नी दोनों एक ही जगह काम करते थे। बच्चा गोद लिया, तो छुट्टी के कारण, पत्नी तो घर में थी, लेकिन पिता को दफ्तर आना पड़ता। क्योंकि एक डिपार्टमैंट होने के कारण, दोनों को एक साथ छुट्टी नहीं मिल सकती थी। यदि पितृत्व अवकाश होता, तो कानूनी तौर पर ऐसा नहीं किया जा सकता था, छुट्टी देनी ही पड़ती। दोनों ही बच्चे की देखभाल कर सकते थे। काम बांट सकते थे। लंच के समय नया पिता बना यह युवक अक्सर बाजार की तरफ भागता दिखता, ताकि बच्चे के लिए बताई गई जरूरी चीजें खरीद सके। फिर बच्चे को गोद लेने के बाद यदि वह बीमार पड़ जाए, अस्पताल ले जाना पड़े और पिता घर में न हो, तो और अधिक मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।-क्षमा शर्मा
 

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